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आप जब यह लेख पढ़ रहे हैं तो अपने आस-पास ज़रा नज़र उठा कर देखिए, बहुत मुमकिन है कि आपको कोई ऐसा दृश्य दिख जाए जिसमें कोई पति अपनी पत्नी को पीट रहा हो, किसी लड़की को गालियां दी जा रही हो, कोई औरत हो जो दहेज़ के लिए सताई गई हो। हो सकता है सड़क पर जा रही किसी लड़की को पड़ोस का लड़का घूर रहा हो या अपने दोस्तों के साथ मिलकर सीटी मार रहा हो। मुमकिन है कि ये सारी घटनाएं एक ही समय पर अलग-अलग जगह घटित हो रही हो मगर यह अपने मूल रूप में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह घटनाएं ‘लिंग आधारित हिंसा’ के बड़े-बड़े उदाहरणों में से एक हैं। लिंग आधारित हिंसा या लैंगिक हिंसा से तात्पर्य सीधे तौर पर उस हिंसा से है जिसके कारणों के मूल में किसी भी व्यक्ति की लैंगिक पहचान होती है। इसे आसन भाषा में समझने के लिए यह कहा जा सकता है कि किसी व्यक्ति पर उसकी लैंगिक पहचान मसलन उसके महिला या ट्रांसजेंडर होने के कारण कोई हिंसा की जाती है तो उसे लैंगिक हिंसा कहते हैं। यह हिंसा किसी भी रूप में जैसे शारीरिक, मानसिक, मौखिक आदि हो सकती है।

सिमोन द बोउआर की किताब ‘द सेकेंड सेक्स’ का एक वाक्य बेहद प्रसिद्द है, “कोई भी औरत पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है।” दरअसल धर्म और परंपरा एक साथ मिलकर एक पूरे तंत्र का निर्माण करते हैं जहां पुरुष सर्वश्रेष्ठ स्थान पर होता है। यही परंपराएं महिलाओं और अन्य लिंग के लोगों का शोषण करने का अधिकार पुरुष प्रधान समाज को दे देती हैं जिसका परिणाम लैंगिक हिंसा के रूप में सामने आता है।

लैंगिक हिंसा के प्रकार

लैंगिक हिंसा कई प्रकार से हमारे आस-पास घटित होती है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि एक महिला अपने जन्म से लेकर उम्र के हर पड़ाव में अलग-अलग प्रकार से लैंगिक हिंसा का सामना करती है।

कन्या भ्रूण हत्या : हमारा समाज महिलाओं को लेकर चिंताजनक रूप से पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है। एक ओर जहां एक स्त्री को जीवन के हर मोड़ पर अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ती है। वहीं, दूसरी ओर वह एक मां के रूप में अपनी होने वाली बच्ची के जीवन के अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ती है। इस प्रकार कन्या भ्रूण हत्या एक ऐसी लिंग आधारित हिंसा है जिससे एक साथ 2 महिलाएं गुज़रती हैं।  

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कन्या भ्रूण हत्या से तात्पर्य कन्या भ्रूण को गर्भ में ही अवैज्ञानिक या सांस्कृतिक कारणों से मार दिया जाना है। यह एक गंभीर अपराध है जिसका कारण सीधे तौर पर भ्रूण का महिला होना है। आंकड़ों पर जाएं तो एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2013-2017 के बीच विश्व भर में लिंग चयन के कारण 142 मिलियन लड़कियां गायब हुई जिनमें से लगभग 46 मिलियन (4.6 करोड़) लड़कियां भारत में लापता हैं। भारत में पांच साल से कम उम्र की हर नौ में से एक लड़की की मृत्यु होती है जो कि सबसे ज्यादा है। यहां प्रति 1000 लड़कियों पर 13.5 प्रति लड़कियों की मौत प्रसव से पहले ही हो जाती है।

किसी व्यक्ति पर उसकी लैंगिक पहचान मसलन उसके महिला या ट्रांसजेंडर होने के कारण कोई हिंसा की जाती है तो उसे लैंगिक हिंसा कहते हैं। यह हिंसा किसी भी रूप में जैसे शारीरिक, मानसिक, मौखिक आदि हो सकती है।

भारत में प्रचलित पितृसत्तात्मक धारणाओं के चलते लड़कों को घर के दीपक की संज्ञा देते हुए उन्हें वंश को आगे बढ़ने वाला बताया जाता है। जबकी लड़की को पराये घर का माना जाता है। लड़कियों के प्रति यही पूर्वाग्रह एक व्यक्ति को कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इसके साथ ही भारत में प्रचलित दहेज़ प्रथा भी इसका एक मुख्य कारण है क्योंकि यह लड़की को निम्नवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के लिए एक महंगा ‘सौदा’ बना देती हैं। ऐसा नहीं है कि भारत ने इसके खिलाफ़ कोई कानून नहीं बना रखा है. सन 1994 में बना प्री कन्सेप्शन एंड प्रीनेटल (प्रोहिबिशन ऑफ़ सेक्स सिलेक्शन) एक्ट न सिर्फ भ्रूण की पहचान उजागर करने को गैर क़ानूनी ठहराता है साथ ही वह ऐसी मशीनों की बिक्री पर रोक भी लगाता है जिससे भ्रूण के लिंग की पहचान की जा सके।

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यौन शोषण : इनसाईक्लोपीडिया वेबसाइट ब्रिटानिका के अनुसार रेप या बलात्कार से आशय किसी भी व्यक्ति की सहमती के बिना उसके साथ ‘सेक्शुअल इंटरकोर्स’ करने से है। दैहिक शोषण का यह प्रकार महिलाओं के साथ होने वाले सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। आंकड़ों के अनुसार भारत में होने वाले यौन शोषण के 100 में से केवल एक मामला ही पुलिस स्टेशन में दर्ज हो पाता है। इससे पता चलता है कि भारत में यौन शोषण के अधिकतर मामले कानून की परिधि से बाहर ही रह जाते हैं।

विश्व भर में महिलाएं अपने घर, ऑफिस और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सहित विभिन्न जगहों में यौन शोषण का सामना करती हैं। वेबसाइट इंडियास्पेंड के अनुसार साल 2014 से 2017 के बीच कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण में 54 फीसद तक इजाफ़ा हुआ है। साल 2018 में अमेरिका के बाद भारत में प्रसिद्द हुए #metoo आंदोलन के बीच साल 2020 के पहले सात महीने यानी जुलाई तक यौन शोषण के 533 मामले दर्ज हुए हैं। यहां ध्यान देने वाली यह है कि इन आंकड़ों में हमारे घरों में आये दिन होने वाला मैरिटल रेप यानि शादी के बाद पत्नी के साथ बिना उसकी अनुमति के संबंध बनाना शामिल नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय कानून इसे अपराध नहीं मानता। इस प्रकार हमारा कानून शादी के ज़रिये एक पुरुष को अपनी पत्नी का बलात्कार करने की अनुमति दे देता है।

दरअसल यौन शोषण की भी जड़ें हमारे समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे में मौजूद हैं। एक आदमी किसी औरत का शोषण इसलिए करता है क्योंकि उसके ज़हन में सोशल कंडिशनिंग के ज़रिये यह बात भरी गई है कि औरत पुरुष से कमज़ोर होती है। हमने एक तंत्र विकसित कर रखा है जहां महिला को दोयम दर्जा प्राप्त है। बलात्कार इसी तंत्र से निकला अभिशाप है।

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एसिड अटैक : अक्सर यह देखने को मिलता है कि किसी लड़की द्वारा लड़के के प्रेम प्रस्ताव को नकारने का परिणाम उसे एसिड अटैक के रूप में झेलना पड़ता है। हमारे समाज में महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखा जाता है। अमूमन पुरुष महिला की देह की ओर ही आकर्षित होता है। उसके लिए उसका चेहरा और जननांग विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। एक महिला जब किसी पुरुष को अपने प्रेमी के रूप में स्वीकारने से मना करती है तो बचपन से खुद को श्रेष्ठ मानने वाली पुरुष जाति के अभिमान को ठेस पहुंचती है। इसी सोच का परिणाम यह होता है कि वह महिला के जिस चेहरे को देख कर उसकी ओर आकर्षित होता है उसी पर तेज़ाब डालकर उसे विकृत कर डालता है।

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगते हुए बिना पहचान पत्र देखे इसे किसी भी व्यक्ति को बेचना गैरकानूनी कर दिया था। इसके अतिरिक्त भारतीय दंड संहिता की धारा 326 (ए) के तहत, एक व्यक्ति को एसिड से किसी व्यक्ति को जलाने का दोषी जाने पर उसे 10 साल की न्यूनतम कारावास, आजीवन कारावास और जुर्माने हो सकता है। आरोपी को जुर्माना पीड़िता के इलाज के लिए देना होता है। धारा 326 (बी) में पांच से सात साल की जेल की सजा का प्रवाधान है। 

इन सबके अतिरिक्त हमारे आस-पास और भी कई अन्य रूपों में लिंग आधारित हिंसा होती है। यह हिंसा उस पितृसत्तात्मक माहौल का परिणाम है जिसका निर्माण हमारे परिवार से होना शुरू होता है। बेटे का बे-रोकटोक बाहर घूमना मगर बेटी पर शाम ढलने से पहले घर आ जाने की अनिवार्यता थोप देना यूं तो बहुत सामान्य बात लग सकती है मगर उपरोक्त सभी अपराधों को करने की हिम्मत इसी मान्यताओं में निहित होती है। एक पूरे तंत्र के ज़रिये हमें यह सिखाने की कोशिश की जाती है कि महिला पुरुषों से कमतर और कमज़ोर होती हैं। इसलिए जन्म से ही एक पुरुष अपनी लैंगिक पहचान को लेकर जो गर्व पालता है उसे किसी भी रूप में जब ठेस पहुंचती है तो वो अपने आस-पास उससे संबंधित किसी महिला पर हमला करता है और इस तरह लिंग आधारित हिंसा आकार लेती है।     

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