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“ये क्या कर दिया है बालों का, यही एक लड़की है, रीमा, पूनम, प्रीति को देखिए, लड़की होने का मतलब ही है, लंबे बाल, बालों से ही लड़की की सुंदरता है, इसने बाल ही काट दिए। लड़कियों को लड़कियों की तरह ही रहना चाहिए, अब मत काटने देना,दिल्ली जाकर बिगड़ गई है।”

छुट्टियों में घर आने पर मुझे अपनी चाची की तरफ से सबसे पहले यही सुनने को मिला। असल में, इस देश की मुख्यधारा की वैचारिकी में लड़कियों के लिए लंबे बाल उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना की गोरा रंग। यहां का समाज लड़कियों के गोरे रंग के साथ लंबे बालों को लेकर भी ‘ऑब्सेस्ड’ है। लड़की होने के जितने पैमाने तय किए गए हैं, उसमें शरीर और बाहरी संरचना की श्रेणी में लंबे बालों का विशेष महत्व है। हमेशा से समाज महिलाओं को निर्देशित करता आ रहा है कि उन्हें लंबे बाल रखने चाहिए। लंबे बाल ही सुंदरता के प्रतीक हैं।

महिला के शरीर पर नियंत्रण रखने और उसे अपने हिसाब से संचालित करने की समाज की इस सोच के केंद्र में पितृसत्ता ही निहित है। लंबे बालों को ही सुंदरता और स्त्रीत्व की परिभाषा से जोड़ दिया गया है और यह सोच न केवल पुरुषों बल्कि स्त्रियों के ज़हन में भी बैठ गई है। इसीलिए घर की महिलाएं शुरू से ही खींचकर लड़कियों के बाल बांधने लगती हैं ताकि 17-18 साल की उम्र से पहले ही उनके बाल लंबे और घने हो जाएं। वहीं लड़कों को छोटे और समय-समय पर बाल कटवाते रहने का निर्देश दिया जाता है। लड़कों के बाल थोड़े से भी बड़े हो जाएं तो उनके पौरुष पर सवाल खड़े करते हुए ‘लड़की हो क्या’ जैसे सवाल पूछे जाते हैं और कई बार तो ट्रांस समुदाय से जोड़कर मज़ाक बना दिया जाता है। लड़का ट्रांस समुदाय से खुद को जोड़े जाने को अपनी मर्दानगी के ख़िलाफ़ चुनौती की तरह महसूस करता है और इस तरह बाल बढ़ाना उसकी आदत से ख़त्म हो जाता है।

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पुरुषों का समाज और उसकी सुंदरता की परिभाषा

प्राचीन साम्यवादी दौर में महिलाओं और पुरुषों में कोई अंतर नहीं था। दोनों ही अपने लिए शिकार करते और भोजन जुटाते थे। स्त्री का अपने शरीर पर नियंत्रण था और एवोल्यूशन (क्रमागत विकास) की प्रक्रिया में मानव का विकास जिस तरह हो रहा था, उसमें स्त्री पुरूष भेद नहीं था। सामाजिक समझ विकसित होने पर धीरे-धीरे स्त्रियों को घरों तक सीमित कर दिया गया, जिससे बाहरी क्षेत्र में उनका हस्तक्षेप खत्म हो गया। शरीर का उस प्रकार से इस्तेमाल न होने से शारीरिक शक्ति क्षीण हुई, जिससे महिला के कमज़ोर होने की अवधारणा पेश की गई और पुरुष उसका रक्षक बन बैठा। महिला उसकी संपत्ति बन गई और इस तरह से उसने उसके संपूर्ण शरीर पर नियंत्रण पा लिया। शरीर पर नियंत्रण के बाद औरतों की सुंदरता की परिभाषा गढ़ी गई। भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था और बाद में उपनिवेशवाद ने रंग के आधार पर भेदभाव किया। आज भी रंग को लेकर भारतीय समाज सहज नहीं हो पाया है। इसी तरह, लंबे बाल को लेकर समाज में कोई विशेष चर्चा भी नहीं होती, एक सर्वमान्य बात की तरह यह सिद्ध कर दिया गया है कि औरत वह है, जिसके काले, लंबे घने बाल हो।

समाज लड़कियों के गोरे रंग के साथ लंबे बालों को लेकर भी ‘ऑब्सेस्ड’ है। लड़की होने के जितने पैमाने तय किए गए हैं, उसमें शरीर और बाहरी संरचना की श्रेणी में लंबे बालों का विशेष महत्व है।

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मीडिया की भूमिका

मीडिया आम लोगों की चेतना निर्धारित करता है। किसी मुद्दे पर लोग कैसे सोचेंगे और किसी भी स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया करेंगे, यह आजकल मीडिया द्वारा निर्धारित किया जाता है। भारत में मनुस्मृति जैसे ग्रन्थ लिखे गए जिन्होंने समाज की वैचारिकी तय की। आज के दौर में सिनेमा, टीवी से लेकर विज्ञापनों ने महिला शरीर और सुंदरता को लेकर रूढ़ीवादी और पितृसत्तात्मक पैमाने गढ़े हैं जिसका सीधा प्रभाव समाज पर पड़ता है। फिल्मों में नायिकाओं के बाल लंबे ही होते हैं। कोई भी रोमांटिक सीन नायिका के सीधे-लंबे, रेश्मी बालों के उड़े बिना पूरा नहीं होता। गानों में काले लंबे बालों की कितनी की उपमाएं दी जाती हैं। शायद ही किसी फ़िल्म की मुख्य मायिका के बाल छोटे हो। 90 के दौर की फिल्मों में अक़्सर ही उन महिलाओं के छोटे बाल होते थे, जो क्रूर और घमंडी होती थी। इस तरह से यह निर्धारित करने का प्रयास किया गया कि छोटे बालों वाली महिलाएं पतिव्रता नहीं होती और कोमलता, जो कि स्त्री का ‘अनिवार्य’ गुण है, उनमें नहीं पाया जाता। इसलिए छोटे बालों वाली स्त्री को यह संस्कारी समाज खारिज़ करता है। शैम्पू और कंडीशनर के विज्ञापन लंबे घने बालों के राग अलापते हुए ही चल रहे हैं। टीवी में आदर्श बहुओं के लंबे घने काले बाल होते हैं, जिनपर हमेशा पल्लू से ढके रहने का अतिरिक्त सांस्कारिक दबाव होता है। इस तरह से, मीडिया घर-घर तक लंबे बाल और सुंदरता के मेल को पहुंचाते हुए पूंजीवाद और पितृसत्ता दोनों को पोषित कर रहा है।

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लंबे बाल, जिन्हें बांधा जाना चाहिए

भारतीय समाज विरोधाभास से भरा हुआ है। यहां लंबे बाल रखने चाहिए, यह तो निर्देशित किया जाता है, लेकिन लंबे बालों को बांधना भी अनिवार्य है। खुले बालों के साथ घूमती लड़की के चरित्र पर सवाल किया जाता है। ग्रन्थों के माध्यम से भी घरेलूपन होने की परिभाषा बालों के आधार पर तय की गई है। पार्वती और गौरी जिनके बाल गूंथे हुए और सुलझे हों, वे स्त्रीत्व और घरेलूपन से जोड़कर देखी जाती है। वहीं काली और दुर्गा के खुले, उलझे केश उनके जंगलीपन को दर्शाते हैं। स्त्री केवल अपने पति और बच्चे की रक्षा के लिए काली और दुर्गा बनती है, यानी वह हमेशा स्वीकार किया जाने वाला स्वरूप नहीं है। इसीलिए शुरू से ही बाल बांधने की ट्रेनिंग दी जाती है। स्कूल भी जहां लड़कियों के लिए चोटी गूंथकर आने का नियम बनाते हैं, वहीं लड़कों को छोटे बाल करके आना अनिवार्य होता है। कॉर्यस्थलों पर महिलाओं को बाल बांधकर परिष्कृत तरीके से आने का नियम बनाते हैं। यह स्त्री की उन्मुक्तता को सीमित करना हुआ। समाज यह तय करता है कि एक औरत कब कैसे रहेगी और उसके रहने का कौन सा तरीका ‘परिष्कृत और सिविक’ है।

हालांकि धीरे-धीरे औरतें अपनी ‘चॉइस’ के आधार पर निर्णय ले रही हैं और समाज के पैमानों को नकार रही हैं। केवल किसी ख़ास कारण से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से महिलाएं छोटे बाल रख रही हैं। अब उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि ‘उनसे कोई शादी करेगा या नहीं’ क्योंकि उनका उद्देश्य शादी करना नहीं है और ‘सेटल’ होने का अर्थ शादी करने से आगे बढ़ चुका है। औरतें ख़ुद अपने सेटल होने की परिभाषा तय कर रही हैं। उन्होंने सुंदर होने की रूढ़ीवादि परिभाषाओं को त्यागकर अपनी नई अवधारणाएं गढ़नी शुरू कर दी हैं। अब काले-घने-लंबे बालों की अवधारणा ‘कर्ल्स आर ब्यूटीफुल’ जैसे ट्रेंड से टूट रही है। लड़कियां पारंपरिक रंगों को छोड़कर अब लाल,नीले रंगों से बालों को डाई कर रही हैं। अपने शरीर पर हक़ जताने का यह उनका तरीका है। ‘टॉमबॉय’ लुक की अवधारणा को ध्वस्त करते हुए लड़कियां यह स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं कि छोटे या बड़े बाल लड़की या लड़की होने की पहचान नहीं है, यानी बाल ‘जेंडर न्यूट्रल’ हैं। छोटे बाल वाली लड़की ‘टॉमबॉय’ नहीं है, न हैं लंबे बालों वाला लड़का ‘गर्ली’। यह बदलाव धीरे-धीरे ही सही भारतीय समाज में आ रहा है।

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तस्वीर साभार : huffingtonpost








गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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