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“तुम एक ‘माचो’ मर्द हो, मर्द को दर्द नहीं होता,मर्द रोते नहीं हैं” ये सब मर्दों के बारे में समाज की बनाई हुई ऐसी अवधारणाएं हैं जो पुरुषों को यह बताती हैं कि जो ताकतवर है वह ‘आदर्श पुरुष’ है। जब मैंने मर्दानगी के समानांतर हिंदी शब्द को खोजने की कोशिश की तो गूगल ने इसका अनुवाद किया-‘बहादुरता’। पितृसत्ता में मर्दानगी एक ऐसी अवधारणा है जो पुरुषों को सख्त/बहादुर बने रहने के लिए मजबूर करती है। भारतीय समाज में ‘आदर्श पुरुष’ की छवि कुछ इस प्रकार बनाई गई है कि पुरुष तभी पुरुष है, जब वह आक्रामक और हिंसक है। समाज में पुरुष की भूमिका ऐसी बांधी गई है कि पुरुष महिलाओं को अपने से कमज़ोर समझने और नियंत्रित करने के लिए बाध्य हैं। पितृसत्ता की वजह से हिंसा, नियंत्रण, शक्ति, सत्ता, नेतृत्व को पुरुष होने का मानक बना दिया गया है। नेतृत्व की क्षमता और प्रभुत्व का समावेश पुरुषों के लिए समस्या बन गए हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि परिवार से लेकर मीडिया सब पुरुषों की इसी ‘मर्दानगी’ वाली छवि को सेलिब्रेट कर रहे हैं।

मर्दानगी एक ऐसी अवधारणा है जो पुरुष को हिंसा करने पर मज़बूर करती है जबकि बायोलॉजिकली कोई भी पुरुष हिंसक नहीं होता है। जन्म लेने से बड़े होने के साथ-साथ समाज और परिवार पुरुष की रुचियों और व्यवहार को निर्धारित करते चलते हैं। जैसे लड़के का बचपन से हिंसक लड़ाई पर आधारित सीरियल या सीरीज को पसंद किया जाना, बंदूक लेकर लड़ाई करना, तेज़ आवाज़ में बात करना, पिता या घर के अन्य बड़े सदस्य के साथ बाहर सामान लेने जाना, क्रिकेट खेलना और देखना, अपने से कम शक्तिशाली बच्चे या लड़किओं को परेशान करना या मारना । लड़के अगर शर्मीले और शांत स्वभाव के होते हैं तो स्कूल या आसपास के बच्चों द्वारा परेशान किया जाता है या परिवार वाले उसे कठोर बनने पर मजबूर करते हैं क्योंकि इस समाज द्वारा निर्धारित मर्दानगी की परिभाषा में लड़कों का शर्मीला और शांत होना फिट नहीं बैठता।

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जिस प्रकार महिलाओं का समाजीकरण बचपन से ही किया जाता है और उनको निर्देशित किया जाता है कि वे अपने रंग, रूप, बाल, चाल, कपड़े, गुण, क्राफ्ट, केयर और पाक-कला की तरफ ध्यान दें। ठीक उसी प्रकार पुरुषों को महत्वाकांक्षी, सत्तावादी, मजबूत, कम भावुक होने के लिए मजबूर किया जाता है। यह बात बिलकुल साफ़ है कि जन्म से पहले ही तय कर दिया जाता है कि लड़का होगा तो वह कैसे रहेगा-कैसे नहीं, क्या पहनेगा – क्या नहीं, कैसा व्यवहार करेगा – कैसा नहीं। उसके लिए क्या अच्छा है -क्या नहीं। लड़की है तो वह क्या करेगी-क्या नहीं, उसको क्या करना चाहिए- क्या नहीं, उसके लिए क्या अच्छा है -क्या नहीं। समाज में उपस्थित यह ध्रुवीकरण पूरे समाज से ट्रांसजेंडर्स समुदाय की अभिव्यक्ति को नकार देता है। यह ध्रुवीकरण समाज की बनाई हुई एक संरचना और संस्था है। इस संरचना और संस्था का ही नाम है- पितृसत्ता।

मर्दानगी एक ऐसी अवधारणा है जो पुरुष को हिंसा करने पर मज़बूर करती है जबकि बायोलॉजिकली कोई भी पुरुष हिंसक नहीं होता है।

पितृसत्ता के तहत महिलाओं में फेमिनिटी और पुरुषों में मर्दानगी को प्राकृतिक या बायोलॉजिकल मान लिया गया है। जबकि हम देखें तो हर व्यक्ति अपने आप में अलग है, बस समाज इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। समाज ने असमानता को प्राकृतिक मान लिया है। जबकि समाज चाहे तो स्वयं की बनाई हुई संरचना को बदल सकता है जैसे के अभी कोरोना काल में कई पुरुषों ने खाना बनाना और घर का काम करना शुरू कर दिया है। इसका मतलब है कि पुरुष चाहें तो खाना बना सकते हैं, पुरुष शर्मीले हो सकते हैं, रो सकते हैं और महिलाएं निर्भीक हो सकती हैं, कम भावनात्मक हो सकती हैं।

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पितृसत्ता ने महिलाओं के साथ पुरुषों के जीवन को भी नियमित किया है। पितृसत्ता ने यह तय किया है कि पुरुष को जितनी जल्दी हो सके अपने पैरों पर खड़े होकर पैसे कमाने हैं, परिवार की आर्थिक मांगें पूरी करने में सक्षम होना है। सालों से पुरुषों पर आर्थिक दबाव इतना अधिक है कि वंचित-शोषित समुदायों से तालुक्क रखने वाले पुरुष सामाजिक कारणों से उच्च शिक्षा तक जाने के बारे में कम ही सोच पाते हैं। यदि पुरुष गरीब परिवार अथवा वंचित वर्ग से हैं तब तो उच्च शिक्षा उनके लिए एक सपना जैसा ही है। पारिवारिक जिम्मेदारी के चलते अधिकतर पुरुष शिक्षा का जीवन से एक ही सम्बन्ध देख पाते हैं –‘उत्पादन के लिए शिक्षा’ । पुरुष शिक्षा को अच्छी आय और काम करने के अवसर के साथ शिक्षा को जीवन में बेहतर सोच, समझ, आज़ादी और ख़ुशी से जोड़कर शायद नहीं देख पाते। सच तो यह है कि पुरुषों को जीवन में बहुत से आयाम के विषय में सोचने का समय/ अवसर ही नहीं मिलता।

पितृसत्ता और मर्दानगी की एक तय परिभाषा के कारण अधिकांश पुरुष जीवन को एक रेस की तरह जीते हैं, उनको बताया जाता है कि उनका लक्ष्य है -कम से कम समय में अधिक से अधिक कमाने में सक्षम होना। पुरुषों की कमाई और आर्थिक स्थिति को उनकी शादी से जोड़ दिया जाता है। बात कुछ ऐसी है कि जितनी अच्छी आय पाने वाला लड़का होगा उतनी सुन्दर, पढ़ी-लिखी और अमीर लड़की से विवाह के लिए रिश्ता आएगा। इस प्रकार हमारा समाज रिश्तों का आर्थिक आधार बना रहा है। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि शिक्षा और व्यक्ति ‘प्रोडक्ट’ हैं। हम बेहतर से बेहतर उत्पाद खरीदने की होड़ में लगे हैं। हम खुद अपनी कीमत लगा रहे हैं और सब कुछ बाजार है। पर क्या हम इस बाजार से निकल समतामूलक समाज की बात कर पाएंगे, क्या हम यह तय कर पाएंगे कि हमको कैसा इंसान बनना है और क्यों? क्या हम अपने ही बनाए हुए ढांचों पर सवाल कर पाएंगे? क्या हम उन सब व्यवस्थाओं को समझ पाएंगे, जो हमारी खुद की ही बनाई हुई हैं? क्या हम उन संरचनाओं को तोड़ पाएंगे जो हमसे हमारे जीने और अपने को अभिव्यक्ति करने की आज़ादी छीन रही हैं? यदि हां, तो आशा है कि हम एक बेहतर समाज बना पाएंगे।

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तस्वीर साभार : epicreads

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4 COMMENTS

  1. बहुत सही लिखा है। लेखक को बहुत बधाई।

  2. A lot of good points, lekin purusho ki financial ability ko basis banakar hi shaadiyan ho rahi hain, aur zyadatar jab aap mahilaon ko shaadi ke liye approach karte hain, aapki kamai ek bahot badi wajah hoti hai, aapke acceptance ya rejection ki.
    Achhi baat hai ke ye baat highlight ho rahi hai, lekin is soch ki supply isi liye hai, kyunki iski demand hai mahilao aur unke pariwaro ki taraf se

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