आज राष्ट्रीय महिला किसान दिवस के मौके पर हम जानेंगे एक ऐसी डेयरी महिला किसान के बारे में जिनकी कहानी यह बताती है कि कैसे विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी अगर हिम्मत ना खोई जाए तो उम्मीद की एक रौशनी कहीं ना कहीं नज़र आ ही जाती है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के कुंवरापुर गांव की रहने वाली सुधा पांडे साल 1988 में शादी के बाद कई आर्थिक मुश्किलों से गुजरीं। पांच लोगों के परिवार में तीन बच्चे शामिल थे, जिनसे जुड़ा खर्च पूरा करने की ज़िम्मेदारी उन पर ही थी। घर चलाने के लिए सुधा को बहुत कुछ सूझा लेकिन कामयाबी हाथ नहीं आई। बच्चों को उनकी निशुल्क पढ़ाई के लिए महर्षि आश्रम तो भेज दिया पर सुधा को इस तंगी से निपटने के लिए अब कुछ सोचना ही था। नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) की सहायता से सुधा ने दस भैसों को कर्ज़ पर खरीदा और फिर दूध बेचने का व्यापार शुरू किया। सुधा पांडे ने भी यह नहीं सोचा होगा की उनके शुरू किया गए इस काम से ना सिर्फ वो अपनी आर्थिक मुसीबतों को पछाड़ने वाली थीं बल्कि वो इससे अपने गांव की और भी दूसरी महिलाओं के भविष्य को संवारने वाली थी।
खैर यह सिलसिला शुरू हुआ और धीरे-धीरे सुधा के साथ इसमें दूसरी महिलाएं भी जुड़ने लगीं। साल 2010 में सुधा ने ऐसी महिलाओं का ही एक समूह बनाने का सोचा। एक ग्रामीण इलाके में शुरू में तो महिलाओं के लिए ये सब काफी मुश्किल रहा लेकिन बाद में सुधा इन महिलाओं को साथ समूह में काम करने के लिए मनाने में सफल रहीं। कुछ ही सालों में सुधा के साथ गांव की दूसरी कई महिलाएं जुड़ गईं। अब इन महिलाओं के पास भी रोज़गार था।
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डेयरी क्षेत्र में पिछले 15 वर्षों से लगातार काम कर रही हैं सुधा
आज सुधा एक डेयरी किसान के रूप में पिछले 15 सालों से लगातार काम कर रही हैं। डेयरी क्षेत्र में अपनी कामयाबी के लिए सुधा को उत्तर प्रदेश सरकार अब तक चार बार गोकुल पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है। सुधा की अब अपने गांव में एक अलग पहचान है। ये आज दूसरी महिलाओं को भी डेयरी संचालन सीखा रही हैं। सुधा जानती हैं कि बेहतर ढंग से डेयरी व्यवसाय के लिए पशुओं को सही देखभाल और वातावरण देना होता है।
अपने डेयरी में भी सुधा पांडे पशुओं के लिए बिना किसी मिलावट का चारा खुद घर पर तैयार करती हैं। कम ज़मीन पर ज्यादा फसल उगाना भी सुधा से सीखा सकता है। पूर्व कृषि मंत्री राधामोहन सिंह सुधा को कृषि क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित भी कर चुके हैं। डेयरी चलाने में सुधा के पति और उनके बेटे भी उनकी मदद करते हैं। आज सुधा खुद एक आत्मनिर्भर महिला होने के साथ-साथ अपनी तरह ही अपने इलाके की दूसरी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना रही हैं।
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सुधा की अब अपने गांव में एक अलग पहचान है। ये आज दूसरी महिलाओं को भी डेयरी संचालन सीखा रही हैं। सुधा जानती हैं कि बेहतर ढंग से डेयरी व्यवसाय के लिए पशुओं को सही देखभाल और वातावरण देना होता है।
भारत में महिला किसानों की स्थिति
भारत में अगर महिला किसानों की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक देश का करीब 70 फीसदी कृषि कार्य महिलाएं करती हैं लेकिन सिर्फ 10 फीसद खेती की जमीन को ही वे अपना कह सकती हैं। इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कई महिला किसानों के पास अपने नाम पर जमीन नहीं है। जहां 73.2 फीसद ग्रामीण महिला श्रमिक कृषि में लगी हुई हैं, वहां सिर्फ 12.8 फीसद महिलाओं के पास जमीन का मालिकाना हक है। महाराष्ट्र में, 88.46 फ़ीसद ग्रामीण महिलाएं कृषि में कार्यरत हैं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। 2015 की कृषि जनगणना के अनुसार, पश्चिमी महाराष्ट्र के नासिक जिले में, महिलाओं के पास केवल 15.6 फीसदी कृषि भूमि का स्वामित्व है, यानी कुल खेती वाले क्षेत्र में 14 फीसदी की हिस्सेदारी है।
अगर फ्लैशबैक में जाकर अगर कहानी का सार देखें तो डेयरी फार्मिंग से अपने और साथ ही अपने इलाके की सभी महिलाओं की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने वाली सुधा पांडे का अतीत कई उतार चढ़ाव से भरा रहा। कुंवरापुर गांव में पहले पति के भाई द्वारा जमीन हड़प ली गई और फिर कोर्ट-कचहरी की तारीख पर तारीख लेकिन सुधा को ऐसी ज़िंदगी नहीं चाहिए थीI अपने तीन बच्चों की परवरिश के लिए जरदोजी और कढ़ाई सिलाई में हाथ आज़माया लेकिन बात नहीं बनी। पर वो कहते हैं ना लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है, फिर क्या नाबार्ड की सहायता से दस भैसों को ऋण पर खरीदा और दूध को बेचने का व्यापार शुरू हुआ। अब रोज़ इनके यहां आस-पास के गांव की पचास से अधिक महिलाएं दूध लेने आ जाती हैं। आज सुधा की अपनी 13 बीघा जमीन और उनको दिया गया गोकुल पुरस्कार, सुधा की संघर्षमय कहानी के मीठे फल बन चुके हैं और उम्मीद है इनकी फेहरिस्त अभी और भी लम्बी होगी।
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तस्वीर साभार : the better india
About the author(s)
Eshwari is working with Feminism in India (Hindi) as a content creator. She has completed her postgraduate diploma in broadcast journalism. Earlier she has worked with Gaon Connection, Design Boxed and The Better India.

