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नोबेल प्राइज विजेताओं में साहित्य की दुनिया में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वालों में इस साल एक महिला शामिल है जिनका नाम है लुईस ग्लिक। इनके बारे में नोबेल सम्मान देने वाली स्वीडिश अकादमी ने कहा “ग्लिक की कविताएं ऐसी हैं जिनमें कोई ग़लती हो ही नहीं सकती और उनकी कविताओं की सादगी भरी सुंदरता उनके व्यक्तिगत अस्तित्व को भी सार्वभौमिक बनाती है।” बता दें कि लुइस ग्लिक कविता के लिए नोबेल पाने वाली पहली अमेरिकी महिला भी हैं। एक बेमिसाल कवियित्री लुइस ग्लिक जिन्हें दुख और अकेलेपन के भावों को बड़ी ही सरलता से कविता के रूप में पेश करने की महारत हासिल है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उनके जीवन के अनुभव ही कुछ ऐसे रहें है जिसके कारण वे साल दर साल परिपक्वता की सीढ़ी चढ़ती चली गई और यह मुकाम हासिल किया।

नोबेल पुरस्कार से पहले भी ग्लिक को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है जिनमें साल 1993 में पुलित्जर पुरस्कार उनकी रचना ‘द वाइल्ड आइरिश’ के लिए नेशनल ह्यूमैनिटीज मेडल और अन्य पुरस्कारों में नेशनल बुक अवार्ड, नेशनल बुक क्रिटिक्स सर्कल अवार्ड और बोलिंगेन अवार्ड शामिल है। इतना ही नहीं वे साल 2003 से साल 2004 के बीच वह अमेरिका की ‘पोएट लारिएट’ भी रहीं हैं।

दुनियाभर में अपनी सादगी भरी कविताओं के लिए जानी जाने वाली ग्लिक का जन्म 22 अप्रैल 1943 को न्यूयॉर्क में हुआ था। वे डेनियल ग्लिक और वीटराइस ग्लिक की तीन बेटियों में सबसे बड़ी बेटी हैं। उनकी मां रूसी यहूदी हैं, जबकि उनके पिता का संबंधघ हंगरी से था। ग्लिक के पिता एक लेखक बनना चाहते थे, लेकिन किसी कारणवश उन्हें खुद का काम शुरू करना पड़ा। उनकी मां वेलस्ली कॉलेज से ग्रेजुएट थी। लुइस ग्लिक ने अपने माता-पिता से यूनानी पौराणिक कहानियां सुनकर अपना बचपन गुज़ारा। ग्लिक ने बहुत छोटी सी उम्र में कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। समय के साथ उनकी लेखनी में निखार आता गया फिर यही निखार उनकी तरक्की का कारण बना।

लुइस ने अपने बचपन और किशोरावस्था के बाद भी कई तरह के बड़े संकटों का उन्होंने सामना किया जिसने उन्हें भीतर से झकझोर कर रख दिया। बड़ी बहन की मौत, पिता की मौत और फिर पति से तलाक जैसी घटनाओं ने उनकी कलम में दुख और अकेलेपन की स्याही भरी फिर यही स्याही उन्हें बुलंदियों पर ले गई।

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किशोरावस्था में लुइस ग्लिक को ‘एनोरेक्सिया नर्वोसा’ नामक एक बीमारी ने घेर लिया जो कई सालों तक उनके जीवन में एक बाधा बनी रही इस बीमारी ने उनकी पढ़ाई और सामान्य व्यवहार में कई अड़चनें पैदा की। उन्होंने एक मौके पर अपने हालत को कुछ इस तरह बयां किया, ‘उस वक़्त मैं समझ रही थी कि किसी मोड़ पर मैं मरने वाली हूं, मैं बहुत अच्छे से यह जानती थी कि मैं मरना नहीं चाहती हूं।’ जीने की इसी चाह ने ग्लिक को आगे बढ़ने का एक हौसला दिया शायद यही वजह रही कि उनकी कवितायेँ दुःख और अकेलेपन को बखूबी बयां करती हैं जिसमें लोग कहीं न कहीं अपने जीवन की परेशानियों को जोड़कर उसे पढ़ना पसंद करते है। बrमारी से लड़ते हुए जब किसी भी तरह उनकी पढ़ाई संभव न हो पाई तो उन्होंने सारा लॉरेंस कॉलेज में काव्य लेखन की क्लास लेना शुरू कर दिया। इसी समय ग्लिक की मुलाक़ात लिओनी एडम्स और स्टेनली कुनित्ज से हुई। इस बारे में वह कहती हैं कि उन्हें एक कवियित्री के रूप में आकार लेने में इन दोनों ने काफी मदद की।

लुइस ने अपने बचपन और किशोरावस्था के बाद भी कई तरह के बड़े संकटों का उन्होंने सामना किया जिसने उन्हें भीतर से झकझोर कर रख दिया। बड़ी बहन की मौत, पिता की मौत और फिर पति से तलाक जैसी घटनाओं ने उनकी कलम में दुख और अकेलेपन की स्याही भरी फिर यही स्याही उन्हें बुलंदियों पर ले गई। लुईस की कविताएं अधिकतर बाल्यावस्था, पारिवारिक जीवन, माता-पिता और भाई-बहनों के साथ गहरे संबंधों पर आधारित रहीं हैं। उन्हें एक आत्मकथात्मक कवयित्री के रूप में जाना जाता है। अवसाद, भावनाओं और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी लुईस की वो कल्पनाएं जीवन की सच्चाई पर केंद्रित रहती है जो पढ़ने वाले को दुख और अकेलेपन के सफर पर ले जाती हैं जिस सफर में रिश्तों के कई पड़ाव भी हैं और जिंदगी से जुड़े उतार-चढ़ाव भी।

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नोबेल साहित्य समिति के अध्यक्ष एंडर्स ओल्सन ने इस मौके पर कहा कि ग्लिक के 12 कविता संग्रहों में शब्दों का चयन और स्पष्टता सभी को अपनी ओर खींचती हैं। नोबेल एकेडमी ने कहा कि न्यूयॉर्क में जन्मी ग्लिक ने 1968 में अपनी पहली रचना ‘फर्स्टबॉर्न’ लिखी और वह जल्द ही अमेरिकी समकालीन साहित्य के प्रसिद्ध कवियों में गिनी जाने लगी। इसके बाद उनकी लिखी रचनाओं ‘डिसेंडिंग फिगर’ और ‘द ट्राइंफ ऑफ एकिलेस’ , ‘द हाउस आफ मार्शलैंड’ और ‘एवर्नो’ को भी काफी लोकप्रियता मिली। पिता की मृत्यु के बाद उनके संग्रह ‘अरारात’ को अमेरिका की सबसे दुखभरी रचनाओं में से एक माना जाता है। फिलहाल 77 वर्षीय ग्लिक येल यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

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तस्वीर साभार : slate




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