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केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) 2010 में संशोधन कर भारत में पहले से ही धीमी गति से चल रहे सिविल सोसायटी (नागरिक समाज) को और भी अधिक धीमा कर दिया है। सरकार के तय किए गए नए विनियमन विदेशी संस्थानों से संबंध रखने वाले सिविल सोसायटी, गैर-सरकारी संगठनों पर मुश्किल शर्तें लाद रहा है। ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि हमारे देश में मौजूद सभी गैर-सरकारी संगठन विदेशों से मिलने वाले फंड का गलत ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सामान्य सी बात है कि सभी एनजीओ बाहरी आर्थिक सहायता पर किसी न किसी रूप में निर्भर रहते हैं।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) सबसे पहले कांग्रेस के शासनकाल में साल 1976 में लाया गया था जिसका मुख्य उद्देश्य राजनितिक गतिविधियों में विदेशी सहायता को रोकना था ताकि घरेलू राजनीति में विदेशी संस्थाओं की दखलअंदाज़ी को रोका जा सके। साल 2010 में यूपीए सरकार ने इस एक्ट में और भी संशोधन किए। साल 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट सामने आई जिसमें यह खुलासा किया गया कि कई अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे ग्रीन पीस, कोर्ड एड और एमनेस्टी इंटरनेशनल आदि के कामों की वजह से भारत के सकल घरेलु उत्पाद में हर साल 2 से 3 फीसद की कमी झेलनी पड़ती है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सरकार को भी इन संस्थाओं पर शिकंजा कसने का एक मौका मिला गया। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने अब तक करीब 20 हज़ार लाइसेंस को रद्द कर दिया।

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वहीं हाल ही में पेश किए गए प्रावधानों की बात करें तो केंद्र सरकार के इस विधेयक में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन करने का प्रावधान किया गया है। इस विधेयक में लोक सेवकों के विदेशी अंशदान पर पाबंदी लगाने का प्रावधान किया गया है। लोक सेवक में वे सभी व्यक्ति शामिल हैं, जो सरकार की सेवा या वेतन पर हैं या जिन्हें किसी लोक सेवा के लिये सरकार से मेहनताना मिलता है। बिल में आधार को NGOs या विदेशी योगदान लेने वाले लोगों और संगठनों के सभी पदाधिकारियों, निदेशकों और अन्य प्रमुख अधिकारियों के लिए एक अनिवार्य पहचान दस्तावेज़ बनाने का प्रस्ताव किया गया है।

विधेयक के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, संगठन या पंजीकृत संस्था विदेशी सहायता प्राप्त करने के बाद किसी अन्य संगठन को उस विदेशी अंशदान का हस्तांतरण नहीं कर सकता। अधिनियम के अंतर्गत हर व्यक्ति, जिसे वैध प्रमाणपत्र मिला है, को प्रमाणपत्र की समाप्ति से पहले छह महीने के अंदर-अंदर उसका नवीनीकरण कराना चाहिए। अब यह प्रावधान किया गया है कि प्रमाण-पत्र के नवीनीकरण से पहले सरकार जांच के माध्यम से यह सुनिश्चित करेगी कि आवेदन करने वाला व्यक्ति काल्पनिक है या नहीं, उस व्यक्ति पर सांप्रदायिक तनाव भड़काने या धर्मांतरण मामले में शामिल होने के लिये मुकदमा नहीं चलाया गया है या उसे इनका दोषी नहीं पाया गया है, और तीसरा उसे विदेशी अंशदान के गलत प्रयोग का दोषी नहीं पाया गया है।

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विधेयक में यह निर्धारित किया गया है कि विदेशी अंशदान केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया नई दिल्ली की उस शाखा में ही लिया जाएगा, जिसे केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी। एक्ट के मुताबिक, किसी NGO से मिलने वाले विदेशी अंशदान की 50 फीसद से अधिक राशि का प्रयोग प्रशासनिक खर्चे के लिए नहीं कर सकते हैं और साथ ही विधेयक में संशोधन कर इस सीमा को 20 फीसद कर दिया गया है।

यह प्रावधान लाने के बाद सबसे पहले एक्शन एमनेस्टी इंटरनेशनल पर लिया गया क्योंकि अभी कुछ समय पहले इस संस्था ने प्रशासन पर आरोप लगाते हुए पुलिस पर दंगो में क्रूरता बरतने का दोषी करार दिया था और इसलिए इस संस्था का कहना है कि इसके कारण बदले की भावना में बहकर सरकार ने यह सख्त कदम उठाया है और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने संस्था के सभी खातों को फ़्रीज़ कर दिया। लेकिन सरकार की ओर से आये बयान के अनुसार एमनेस्टी इंटरनेशनल को सिर्फ एक बार फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट के तहत मंज़ूरी मिली थी और वो भी 20 साल पहले. इसके बाद संस्था के बार-बार किए गए आवेदनों के बावजूद सरकार ने FCRA की मंज़ूरी नहीं दी, क्योंकि क़ानून के मुताबिक़ वो इन मंज़ूरियों के लिए अयोग्य है।” अब एमनेस्टी इंडिया ने भारत में अपने काम को रोक दिया है। एमनेस्टी का कहना है कि सरकार के दबाव के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।

केंद्र सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाई से भारत में काम कर रही कई गैर-सरकाी संस्थाओं के कामों में रुकावट आ सकती है क्योंकि ऐसी बहुत सी संस्थाएं है जो पर्यावरण, मानव विकास, बाल श्रम, महिला अधिकारों और दूसरे ज़रूरी मुद्दों पर ज़मीनी स्तर पर काम में लगी हुई हैं और ये सभी नियम इनके कामों में रुकावच डालने का एक प्रयास है साथ ही एक लोकतांत्रिक समाज में ऐसे कठोर प्रतिबंध कहीं न कहीं अधिकारों का हनन ही नज़र आते हैं।

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तस्वीर साभार : Trending News

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

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