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रचना प्रियदर्शिनी

बापू, गांधी, महात्मा, मोहनदास करमचंद गांधी या फिर साबरमती के संत के व्यक्तित्व से तो हम सभी परिचित हैं। बचपन से लेकर अब तक हमने उनके बारे में काफी कुछ पढ़ा और सुना है। लेकिन साबरमती के इस संत को ‘महान’ बनानेवाली शख्सियत के बारे में शायद हम में से बहुत कम ही लोग जानते होंगे। वह शख्सियत थीं- बा यानी महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी। कस्तूरबा गांधी का मूल नाम कस्तूर था। शादी के बाद वह कस्तूर गांधी बनी और बच्चों की पैदाइश के बाद कस्तूर’बा’। गुजराती भाषा में ‘बा’ का अर्थ होता है-मां। वह अपने हर रूप में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। लेखक गिरिराज किशोर द्वारा राजकमल प्रकाशन के तहत लिखी गई पुस्तक कस्तूरबा गांधी को विस्तान से जानने की दिशा में एक बेहतर प्रयास है।

महात्मा गांधी की पत्नी के रूप में अपना पूरा जीवन बिताने बावजूद कस्तूरबा गांधी ने एक स्त्री के रूप में अपने व्यक्तित्व को हमेशा ही स्वतंत्र रखा। उदाहरण के रूप में शादी के बाद मोनिया यानी मोहनदास ने जब अपने एक मित्र के बहकावे में आकर कस्तूर पर अपनी मनमर्जी की पाबंदी लगानी चाही, तब कस्तूर ने उसके सामने ऐसे-ऐसे तर्क रखे कि मोनिया को जल्दी ही यह बात समझ में आ गई कि कस्तूर को बिना आश्वस्त किए उससे अपनी बात मनवाना आसान नहीं है। कस्तूर पढ़ी-लिखी नहीं थी, क्योंकि उस जमाने में औरतों के पढ़ने-लिखने को सम्मानजनक नहीं समझा जाता था, लेकिन कस्तूर को जिंदगी का व्यवहारिक ज्ञान कहीं अधिक था।

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हालांकि, 13 साल की छोटी सी उम्र में एक भरे-पूरे संयुक्त परिवार में ब्याह होने के बावजूद भी कस्तूरबा ने कभी भी अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। जो बात उन्हें सही लगती थी, उसे सही कहने और जो बात गलत लगती थी, उसे गलत कहने से वह कभी भी पीछे नहीं हटती थी। न ही वह किसी बात को लोकलाज के डर से आसानी से स्वीकार करती थलेती थी। वह महात्मा गांधी के साथ तर्कपूर्ण वाद-विवाद और उनसे सहमत होने के बाद ही उसका अनुसरण करने का फैसला लेती थी। हालांकि कस्तूरबा के बारे में अब तक हम जो कुछ भी जानते हैं या जान पाए हैं, वे सब सुनी-सुनाई या फिर उन्हें करीब से जाननेवाले लोगों के जरिये सुनकर ही जान पाए हैं। अब इसमें कितना सच है और कितनी कल्पना, इसे मापने का कोई पैमाना नहीं।

कस्तूर पढ़ी-लिखी नहीं थी, क्योंकि उस जमाने में औरतों के पढ़ने-लिखने को सम्मानजनक नहीं समझा जाता था, लेकिन कस्तूर को जिंदगी का व्यवहारिक ज्ञान कहीं अधिक था। उन्हें बखूबी आता था।

बा महिलाओं के समान हक की पैरवीकार थीं। अक्सर यह सोचती कि औरतों के साथ ही ऐसा क्यों होता है कि वे जहां की तहां खड़ी रह जाती हैं, जबकि आदमी फर्राटा भर कर कहीं का कहीं निकल जाता है। बावजूद इसके वह मोहनदास से कभी किसी बात के लिए शिकायत नहीं करती थी। उन्होंने मोहनदास की अनुपस्थिति को धीरज के साथ एक मौन प्रतिभागी के रूप में स्वीकार किया था और अपने आत्मविश्वास के बल पर अपने मन की समस्त शंकाओं का शमन कर लिया था। उनकी यही मूल प्रवृत्ति उनकी शक्ति थी। वह अपने लिए कभी परेशान नहीं होती थी। जब कभी अकेले होने पर भी उसके ऊपर कभी कोई मुसीबत आई, तो उसने बड़े ही साहस के साथ उका सामना किया था। अपनी गरिमा, कर्म के प्रति समर्पण और करुणा भरे हृदय की वजह से ही वह जाति-धर्म से परे सभी आश्रमवासियों का सम्मान पाने में सफल हुई थी।

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गांधीजी ने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में बड़ी बेबाकी से यह स्वीकार किया है कि उन्होंने जीवन में कई ऐसे निर्णय लिए, जिसकी वजह से कस्तूरबा की व्यक्तिगत और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची। बावजूद इसके उन्होंने कभी भी बापू का साथ नहीं छोड़ा। न ही अपने सिद्धांतों से समझौता किया। गांधी जी के अनुसार, वह कस्तूरबा की इच्छाशक्ति देख कर दंग रह जाते थे जब वह कहती थी कि ”अगर जेल तुम्हारा पीहर है, तो यह मेरा नया ससुराल है।” 

बा, बापू के जीवन में क्या अहमियत रखती थी, इसे उन्हीं के शब्दों में बेहतर समझा जा सकता है। बा की मृत्य पर महात्मा गांधी ने कहा था, “अगर बा का साथ न होता तो मैं इतना ऊंचा उठ ही नहीं सकता था। यह बा ही थी, जिसने मेरा पूरा साथ दिया, नहीं तो भगवान जाने क्या होता? मेरी पत्नी मेरे अंतर को जिस प्रकार हिलाकर रख देती थी, उस प्रकार दुनिया की कोई स्त्री नहीं हिला सकती, वह मेरा अनमोल रत्न थी।” उनकी इस स्वीकारोक्ति से यह पता चलता है कि बा का पूरा जीवन आत्मविश्वास और धैर्य से भरा था, जो महात्मा गांधी के निर्णयों को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता था।

बा की शख्सियत, उनके व्यक्तित्व की विशालता और उनके मनोभावों को शब्दों में ढालने में यह पुस्तक काफी हद तक सफल रही है। हालांकि बा निरक्षर थी और उस दौर में स्त्री शिक्षा या स्त्री मनोभावों को समझने का प्रयास नगण्य था। ऐसे में किसी व्यक्ति की भावनाओं का शब्दश चित्रण करने या उसकी आत्माभिव्यक्ति की सफल प्रस्तुति के लिहाज से देखा जाए, तो पुस्तक में कुछ अधूरापन जरूर प्रतीत होता है।

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(यह लेख रचना प्रियदर्शिनी ने लिखा है जो पेशे से एक पत्रकार हैं।)

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