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वर्ल्ड एड्स डे के दिन यानी हर साल 1 दिसंबर को देश और दुनियाभर की सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इस बीमारी को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। एड्स जैसी बीमारी के संक्रमण के खतरों की जानकारी और इससे बचाव तभी संभव है जब जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ समाज की मानसिकता में भी बदलाव आए। भारत के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) की साल 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं में एचआईवी के प्रसार की संभावना 0.19 फ़ीसद और पुरुषों में 0.25 फ़ीसद पाई गई। वहीं, साल 2017 तक भारत में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या 21.40 लाख के आसपास पाई गई थी। एचआईवी एक वायरस है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर बनाता है। इस कारण शरीर की क्षमता किसी भी संक्रमण से लड़ने लायक़ नहीं रहती। यह स्थिति एचआईवी एड्स की बीमारी कहलाती है। इस संक्रमण के लक्षण कई चरणों में नज़र आते हैं। संक्रमण का आख़िरी चरण एड्स है। यह शरीर के लिए बहुत ही घातक स्थिति है। दवाइयों और अच्छी देखभाल के साथ एक एचआईवी पॉज़िटिव इंसान लंबे समय तक स्वास्थ्य की दृष्टि से एक बेहतर जीवन बिता सकता है।

कई सरकारी विज्ञापनों में एड्स से जुड़े इस मिथक को तोड़ने की कोशिश की है कि यह साथ खाने, बैठने, छूने, एक ही टॉयलेट के इस्तेमाल से नहीं फैलता। यह वायरस संक्रमित इंसान के ऊपर इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की सुई या टैटू बनाने वाले नीडल के दोबारा किसी स्वस्थ इंसान पर इस्तेमाल किए जाने, संक्रमित व्यक्ति का खून चढ़ाने, असुरक्षित यौन संबंध बनाने के कारण फैलता है। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में एड्स से संक्रमित लोगों में से 80 फीसद लोगों को असुक्षित यौन संबंध बनाने के कारण यह संक्रमण हुआ है। वायरस की प्रबलता सबसे ज्यादा वीर्य यानी कि स्पर्म में है और फिर खून में। इसलिए एचआईवी संक्रमण फैलने के सबसे बड़े खतरों में से एक है असुरक्षित यौन संबंध बनाना।

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मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत

भारतीय समाज में आम लोगों की मानसिकता सेक्स को लेकर बड़ी ही संकुचित रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में सेक्स और सुरक्षित सेक्स के बारे में न तो घर पर बताया जाता है ना ही स्कूलों में। सेक्स एजुकेशन के नाम पर महिला और पुरूष शरीर के अंगों के नाम याद करवा दिए जाते हैं। यही कारण है कि अधिकतर पुरूष अपने निज़ी स्पेस में कंडोम के इतेमाल को जरूरी नहीं समझते। वे कई मिथकों को सच मानकर चलते हैं। जैसे, कंडोम के बिना सेक्स में उन्हें यौन सुख कम अनुभव होगा। महिलाएं सेक्स के दौरान अपनी पसंद या अपनी शर्त अपने साथी के सामने नहीं रखने पाती हैं। सभ्य समाज में सेक्स को लेकर कम जानकारी होना एक अच्छी औरत के इमेज़ में आता है। ग्रामीण भारत की बात करें तो ज्यादातर मर्द कमाने के किये घर से दूर मजदूरी, ट्रक चलाने, रिक्शा चलाने या अन्य ऐसे काम करते हैं।

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भारतीय समाज में आम लोगों की मानसिकता सेक्स को लेकर बड़ी ही संकुचित रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में सेक्स और सुरक्षित सेक्स के बारे में न तो घर पर बताया जाता है ना ही स्कूलों में। सेक्स एजुकेशन के नाम पर महिला और पुरूष शरीर के अंगों के नाम याद करवा दिए जाते हैं।

‘इंडियन जर्नल ऑफ सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिज़ीज़ और एड्स’ के एक आर्टिकल के अनुसार साल 1991 और 1992 की नवंबर में 100 ट्रक चालकों के साथ एक सर्वे किया गया। उनकी उम्र 20 से 40 के बीच थी। 78 फ़ीसद चालकों ने कई महिला यौन साथियों के होने की बात स्वीकारी जिनमें से अधिकतर सेक्स वर्कर्स थी। इस सर्वे में हाइवे पर काम करने वाली 21 सेक्स वर्कर्स को भी शामिल किया गया था। सभी ने न्यूनतम एक रात में एक असुरक्षित यौन संबंध बनने की बात स्वीकारी। ट्रक चालक जब काम करके महीनों बाद घर लौटते हैं तब इनसे यह संक्रमण इनकी पत्नी तक भी पहुंचता है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में मुफ़्त कॉन्डम बांटा जाता है, ग्रामीण औरतें कॉन्डम के इस्तेमाल को लेकर ना खुद बहुत सजग हैं, ना ही पति से इसे इतेमाल करने की मांग कर पाती हैं। 

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कुछ जागरूक महिलाएं अपने यौन जीवन को स्वस्थ रखने के लिए कॉन्डम को अपना रही हैं। हालांकि उनकी संख्या बेहद कम है और महानगरों और मेट्रो शहरों तक सीमित है। छोटे शहरों में ऐसा करती हुई लड़कियों और औरतों के चरित्र पर उंगली उठाने में मेडिकल दुकान वाले से लेकर दुकान पर खड़े दूसरे ग्राहक समेत सभी तैयार खड़े रहते हैं। अविवाहित सेक्स को समाज में ‘शर्म’ की तरह देखा जाता है। यही कारण है कि खुलेआम कॉन्डम ख़रीदने वालों को भी बुरी नज़र से देखा जाता है। औरतों के लिए खुलेआम दुकान से कॉन्डम खरीद लेना शादी के बाद भी ‘तौबा तौबा’ ही बना रहता है। टीवी में कॉन्डम के विज्ञापन आते ही बच्चों के सामने माता-पिता का झेंपना, चैनल बदल लेना एक आम व्यवहार है, ताकि बच्चा उत्सुकतावश सवाल न पूछ दें। घर-परिवार अपने किशोरों, किशोरियों को इस महवपूर्ण जानकारी से दूर रखते हैं। 

साल 2018 जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के दौरान कहा था कि विक्टोरिया युग की नैतिकता, निषेध, असुरक्षित यौन संबंध आदि से एड्स जैसे यौन संचालित बीमारियों का प्रसार हुआ है। यह बात धारा 377 पर सुनवाई के दौरान कही गई थी। धारा 377 समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखता था। उसी साल सितंबर में धारा 377 गैरकानूनी घोषित हुई थी। नैतिकता के नाम पर प्रेम-विरोधी चरमपंथी विचारों वाले संगठनों और लोगों द्वारा समलैंगिकता को एड्स के संक्रमण का कारण कहे जाने के जवाब में न्यायालय ने आगे यह भी कहा था कि समलैंगिक संबंधों को दोष दिया जाना गलत है। न्यायालय ने सेक्सवर्क और समलैंगिक संबंधों पर प्रतिबंध को सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियों के प्रसार की वजहों में से एक बताया। विक्टोरिया युग की नैतिकता के कारण केवल स्वास्थ की चिंताएं बढ़ेंगी।

इसी सुनवाई के दौरान सेक्स वर्क पर न्यायालय ने कहा था कि अगर इसे लाइसेंस देते हैं तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है। भारत में सेक्स वर्कर्स कॉन्डम का प्रयोग बहुत ही कम करती हैं। हालांकि कई एनजीओ उनके यौन स्वास्थ के लिए कॉन्डम बांटते हैं लेकिन पुरूष ग्राहकों इसका इस्तेमाल करने आनाकानी दिखाते हैं। इस स्थिति में सेक्सवर्कर कुछ नहीं कर पाती।वे झंझट मोल लेने से डरती हैं क्योंकि अक्सर उनके प्रति स्थानीय पुलिस का रवैया भी अच्छा नहीं होता है। एक अच्छी ख़बर भी है। भारत में सेक्सवर्क के सबसे बड़े इलाक़े सोनागाछी में यौनकर्मी महिलाओं की जागरूकता एड्स के खिलाफ उनकी लड़ाई में कारगर साबित हुई थी। ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ के अनुसार इस प्रोजेक्ट में यौनकर्मियों के लिए एक प्रायोगिक परियोजना शुरू की जाने की बात थी जो साल 2015 में देश में अपने तरह की पहली कोशिश थी। बहुत सुधार तो नहीं लेकिन देश के अन्य हिस्सों में जहां सेक्सवर्क होता है उसकी तुलना में सोनागाछी की महिलाएं एड्स के प्रति संगठित होकर जागरूकता लाने की प्रतीक बनी।

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एड्स के बारे में जागरूकता महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अहम है। अगर मां को एचआईवी संक्रमण है तो समय पर सावधानी बरतने से बच्चे को संक्रमण से बचाया जा सकता है। समय रहते उपचार होने पर इस वायरस का बच्चे में आने का ख़तरा एक फ़ीसद से भी कम किया जा सकता है। बड़े शहरों की नहीं यह बात बिहार के समस्तीपुर जिले की है। साल 2016 से 2019 तक कुल मिलाकर 113 एड्स पीड़ित महिलाओं ने स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया। इन्होंने बच्चे के जन्म से पहले एचआईवी टेस्ट करवाया था, रिपोर्ट आते ही इन गर्भवती महिलाओं का इलाज़ जिले के सदर अस्पताल में शुरू कर दिया गया था।

हर बार एड्स रोगियों के प्रति चिकित्सकों का व्यवहार ऐसा नहीं होता। संक्रमित सुई का इतेमाल, रोगियों को नज़रंदाज़ किया जाना इस बीमारी से जुड़ी चिकित्सा के क्षेत्र में देखी गयी कुछ ऐसी समस्याएं हैं। सही समय पर जानकारी एड्स जैसी बीमारी के लिए बहुत जरूरी है। इसलिए सामाजिक सोच के बदलने के साथ साथ जानकारियों का संचार बेहद जरूरी है। सरकारी संस्थानों द्वारा समाज के हर आर्थिक, सामाजिक तबकों विशेषकर यौनकर्मियों के बीच यौन स्वास्थ्य को लेकर बनाये कार्यक्रम सही सामाजिक प्रक्रिया के साथ ले जाया जाना जरूरी है। किसी भी तरह के यौन संबंध को कुंठित सोच के बोझ से असुरक्षित करने की जगह संबंध बना रहे व्यक्तियों को जिम्मेदार व्यवहार बरतना चाहिए। यौन साथी और अपने यौन स्वास्थ्य के प्रति सजगता बरतना जीवन शैली का जरूरी अंग है।

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तस्वीर साभार : Indian Express

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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