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लव जिहाद जिसके बारे में इसी साल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक आरटीआई के तहत संसद को जवाब दिया था कि ‘लव जिहाद’ जैसी किसी चीज़ का कोई अस्तित्व ही नहीं है। साथ ही किसी भी केंद्रीय एजेंसी ने लव जिहाद का कोई केस दर्ज होने की पुष्टि नहीं की है। हालांकि केंद्र सरकार ने भले यह कहा हो कि लव जिहाद का कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन बीजेपी जिस विचारधारा से जन्मी है वह विचारधारा लव जिहाद के अस्तित्व को पूरी तरह मानती है। अगर ऐसा न होता तो क्यों संसद में यह जवाब देने के कुछ महीनों बाद ही उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश जहां बीजेपी सत्ता में काबिज है, वहां लव जिहाद के ख़िलाफ़ कानून न लाने की बात करती। उत्तर प्रदेश में कथित लव जिहाद के खिलाफ कानून आने के कुछ दिनों के अंदर ही लोगों की गिरफ्तारियां भी शुरू हो गई। किसी अन्य कानून के क्रियान्वयन में सरकार इतनी तेज़ी दिखाती है। 

मौजूदा राजनीतिक माहौल की कट्टरता और समाज में फैली सांप्रदायिकता के बीच अंतर-धार्मिक और अंतरजातीय शादी के ख़िलाफ़ समाज में पहले से मौजूद पूर्वाग्रह और मज़बूत हुए हैं। समाज में पहले से व्याप्त जातिगत भेदभाव और सांप्रदायिकता की खाई गहरी हुई है। हमारा समाज इस हद तक सांप्रदायिक हो गया है कि उसे तनिष्क के विज्ञापन में दिखाए 2 अलग-अलग धर्मों के परिवारों के रिश्ता भी हज़म नहीं होता। जो समाज आभाषी दुनिया के कंटेट से इतना आहत हो सकता है वह हकीकत में कितना सांप्रदायिक हो चुका होगा इसका अंदाज़ा हमें लव जिहाद के ख़िलाफ़ बन रहे कानून से ही लग जाना चाहिए।

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पहले यह राजनीतिक ध्रुवीकरण लोगों के फ्रिज़ में यह जांचने के लिए घुसा कि अंदर रखा मांस किस जानवर का है, हम क्या खाते हैं। अब वह ये जांचने के मिशन में जुट चुका है कि कौन किससे मोहब्बत कर रहा है। हमें क्या पहनना है, क्या खाना, कैसे जीना है, किस से मोहब्बत करनी है, ये सब कंट्रोल करने के लिए अब एक सामाजिक रूढ़िवादी सोच के साथ-साथ एक राजनीतिक विचारधारा भी मौजूद है। भले ही संविधान कुछ भी कहता हो।

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जिस देश की एकता कि मिसाल दी जाती थी उस देश की एक बड़ी आबादी अब अपने सांप्रदायिक चेहरे के साथ बड़ी शान से कहती है कि इस देश का हिंदू यानी बहुसंख्यक खतरे में है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हमारा देश कभी सांप्रदायिक नहीं था पर उस सांप्रदायिकता को मौजूदा राजनीति ने खाद-पानी देकर बेहद मज़बूत कर दिया है। साथ ही साथ इस नफ़रत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी कुछ कट्टर संगठनों पर डाल दी गई है जो फिलहाल अब ये जांचने में व्यस्त हैं कि आप किससे मोहब्बत कर रहे हैं और किससे शादी। इस नफ़रती और सांप्रदायिक माहौल से सोशल मीडिया भी कहां अछूता रह गया है। सोशल मीडिया तो सांप्रदायिकता को और तेज़ी से फैलाने का एक ज़रिया बन गया है। बढ़ती नफ़रत और सांप्रदायिकता के बीच मोहब्बत का संदेश देती छोटी-छोटी कोशिशें भी जारी हैं। 

ऐसी ही एक कोशिश का नाम है- इंडिया लव प्रॉजेक्ट (India Love Project)। यह प्रॉजेक्ट एक इंस्टाग्राम पेज के रूप में मौजूद है। इस पेज के बायो में लिखा है- मोहब्बत और शादी जो धर्म, जाति, जेंडर और नस्ल की जंज़ीरों में कैद नहीं है। India Love Project के संस्थापक प्रिया रमानी, समर हलर्नकर और निलोफ़र वेकंटरमन हैं। तनिष्क के विज्ञापन पर हुए विवाद के बाद ही इस पेज की नींव रखी गई थी। इस पेज पर आपको कई ऐसी मोहब्बत की कहानियां मिल जाएंगी जहां 2 लोगों ने जाति, धर्म और जेंडर की बंदिशों से इतर अपने साथी का चुनाव और उनके साथ रहने का फैसला किया। इस पेज के ज़रिये लोग अपनी कहानियां लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इस पेज पर फीचर की गई ऐसी ही कुछ कहानियों पर हम नज़र डालते हैं। 

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हमारे समाज में शादियों का, रिश्ते जोड़ने का हमेशा से एक तय खांचा रहा है जिसे हम अरेंज्ड मैरेज कहते हैं। जाति, वर्ग,जेंडर,नस्ल आदि के आधार पर होनेवाले भेदभाव को खत्म करने के रास्ते में अरेंज़्ड मैरेज एक बहुत बड़ी चुनौती है।

ऐसी ही एक कहानी है गायत्री और तौशीफ़ की। गायत्री और तौशीफ़ बताते हैं कि उन्हें दुख होता है अपने आस-पास इंटरफेथ शादियों के ख़िलाफ़ इतनी नफरत और असहिषुण्ता देखकर। उनका ये भी कहना है कि एक खुशनुमा जीवन जीने के लिए उन्हें किसी का कहा मानने की ज़रूरत नहीं है बल्कि अपनी बेटी को धर्म, जाति, नस्ल और हर चीज़ से परे होकर प्यार करना सिखाने की ज़रूरत है।

साभार: India Love Project

दूसरी कहानी है मसूद अख़्तर और राम श्याम की। उनकी कहानी की शुरुआत में लिखा है कि वे दोंनो ही बाबरी के पहले और बाबरी के बाद के भारत से के प्रभाव से जुड़े हुए हैं। अख़्तर मुंबई में हुई दंगों में बचे जबकि रामा बंगाल की एक हिंदू परिवार में पली-बढ़ी हैं। वे कहते हैं कि इंटरफेथ शादियां दो संस्कृतियों के मिलन से कहीं ज़्यादा है। ये वास्तविक हैं जहां मोहब्बत और संघर्ष होता है। वे यह भी कहते हैं कि वे अपने और दूसरों के लिए पसंद करने के अपने मौलिक अधिकार को बनाए रखना चाहेंगे।

साभार: India Love Project

वहीं एक कहानी है तंज़िला इकबाल और मोहित कुमार की। इन दोंनों ने अपने घर से भागकर पटना हाईकोर्ट जाकर शादी करना चाही लेकिन इनके परिवार वालों को पता चल गया और इन्हें जबरदस्ती इनके परिवार वाले वापस ले आए। तंज़िला के परिवार ने उसकी सगाई तय कर दी लेकिन अपनी सगाई से सिर्फ 1 हफ्ते पहले ये दोबारा भाग निकले अपनी आज़ादी की ओर। आज तक दोनों के परिवार वालों ने उन्हें अपनाया नहीं है।

साभार: India Love Project

अरेंज़्ड मैरेज की अवधारणा को चुनौती देती ये कहानियां

हमारे समाज में शादियों का, रिश्ते जोड़ने का हमेशा से एक तय खांचा रहा है जिसे हम अरेंज्ड मैरेज कहते हैं। जाति, वर्ग,जेंडर,नस्ल आदि के आधार पर होनेवाले भेदभाव को खत्म करने के रास्ते में अरेंज़्ड मैरेज एक बहुत बड़ी चुनौती है। वैसे तो शादी की पूरी संस्था ही महिलाओं की आज़ादी को कैद करने की भूमिका निभाती है पर वह समाज जहां शादी एक नफ़ा-नुकसान का मसला हो, उस समाज में शादी की नींव पर चोट करने की शुरुआत बिल्कुल ज़ीरो से करनी होगी। अरेंज्ड मैरिज क्यों समाज में व्याप्त गैर-बराबरी की भावना को और मज़बूत करता है इसे समझना बेहद आसान है। अरेंज्ड मैरेज की नींव कहां रखी जाती है। इसकी शुरुआत सबसे पहले रिश्ता अपनी जाति, अपने धर्म में खोजने से होती है। अपना वंश, अपनी जाति, अपना समुदाय, अपना धर्म। इस अपने को ही स्थापित करने की वह प्रबल भावना है जो न सिर्फ सामाजिक, आर्थिक बल्कि राजनीतिक भी है। अगर इसका राजनीतिक पक्ष न होता तो सत्तारूढ़ बीजेपी कभी लव-जिहाद जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है उसके ख़िलाफ़ कानून न लेकर आती।

समाज सुधारक और जाति व्यवस्था की नींव पर चोट पहुंचाने वाले पेरियार का मानना था कि शादी को एक पवित्र संस्था मानना ही अपने आप में एक फ्रॉड है। वह शादी की ब्राह्मणवादी संस्था के धुर विरोधी थे। वह कहते थे अगर शादी एक पवित्र बंधन है जो टूट नहीं सकती तो इसमें इतनी परेशानियां और मुश्किलें क्यों आती हैं? शादी की यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था एक औरत को हमेशा और आज भी मर्दों की निगरानी के अंदर ही रखने की वकालत करती है। इसलिए उन्होंने सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज यानी आत्मसम्मान विवाह की शुरुआत की। अरेंज्ड मैरेज की अवधारणा में जाति और धर्म इस कदर हावी हैं कि इसे चुनौती देने वाले लोगों की जान तक ले ली जाती है कभी झूठी शान और इज़्ज़त के नाम पर तो कभी दहेज के लालच में। लेकिन हमारा समाज कहता है ये तो घिसी-पिटी पुरानी बातें हैं जो बार-बार नारीवादी दोहराते हैं। एक पल को यह भी सुनने को मिलता है अरेंज्ड मैरेज में ये सब तो होता ही है। ये बातें सामान्य तो बिल्कुल नहीं हैं, हमने इसे सामान्य बना दिया है। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, लैंगिक समानता की चुनौतियां, जातिगत हिंसा, भेदभाव, रंगभेद, मानवाधिकार हनन जैसे मुद्दों पर बातें कभी पुरानी नहीं होती। इन मुद्दों पर बहस हर दिन ज़रूरी है, इन विचारों को हर दिन चुनौती देने की ज़रूरत है और इन कहानियों को सामने लाने की ज़रूरत है जो अपनी मर्ज़ी से अपना साथी चुनने का समर्थन करते हैं।

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तस्वीर साभार : Yahoo News

Ritika is a reporter at the core. She knows what it means to be a woman reporter, within the organization and outside. This young enthusiast has been awarded the prestigious Laadli Media Awards and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing. Ritika is biased.

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