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कोरोना वायरस महामारी ने साल 2020 में कुछ समय के लिए पूरी दुनिया को रोक दिया था। इस वायरस के कारण तमाम देशों ने अपनी सीमाएं सील कर दी थी, आसमान हवाई जहाज़ से ख़ाली था और पटरियों पर जंगली जानवर स्वतंत्रता से घूम सकते थे। इसी दौरान भारत में भी यातायात से लेकर उद्योग तक सब कुछ बंद हो गया था। यही वह समय था, जब हमने कल्याणकारी राज्य के शासन में पैदल हज़ारों किलोमीटर का रास्ता नापते मजदूरों व उनके घाव पर नमक के रूप में शोषणकारी श्रम कानूनों को देखा था। मज़दूर, उनके कितने ही परिवारवाले भले ही घर न पहुंचे हो लेकिन आगामी चुनाव के लिए राज्य के शासनकर्ता सत्ता हथियाने के लिए दोबारा मैदान में उतर चुके थे। इन सब के दौरान ग्रामीण जीवन की गति अलग थी। कोरोना के दौरान शहरों में लोग घरों में बंद थे, सोशल मीडिया पर डालगोना कॉफ़ी से लेकर नए-नए एक्सपेरिमेंट्स करने में जुटे थे, लेकिन गांव में वही पुरानी जीवनशैली थी– सुबह उठना, जानवरों की देखभाल करना, खेतों में जाना, अनाज देखना और फ़सल पकने के बाद वाली तैयारी को लेकर सपने बुनना।

भारत में मार्च के आख़िरी दिनों में लॉकडाउन लग गया था। यह रबी की फसलों के कटाई का समय होता है। यह समय साल भर के कर्ज को चुकता करने का होता है। अचानक आए इस वॉयरस ने किसानों के सपनों को ध्वस्त कर दिया। सब्जियों के दाम गिर गए। फसलों के कटने के कोई उल्लास नहीं रह गया क्योंकि मंडियां बन्द थी। यहां एक बात समझनी ज़रूरी है, जब भी किसान शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, हमारे दिमाग में बैलों के सामने डलिया में बीज लिए पुरूष की छवि उभरती है। यह सच्चाई नहीं है बल्कि ‘सामाजिक कंस्ट्रक्ट’ का परिणाम है। किसान शब्द को पुरुष से प्रतिस्थापित कर दिया गया है और कृषि कार्य में आधे से अधिक श्रम को लगाकर अनाज उगाने वाली महिलाओं को नकार दिया जाता है। सब्जियों से लेकर फलों और अनाजों के उत्पादन में महिलाएं बड़ी भूमिका निभाती हैं।

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लैंगिक भेदभाव के कारण भारत की महिला किसानों की आवाज़ अनसुनी कर दी जाती है, वे पितृसत्तात्मक परंपराओं के कारण जमीनी स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्ष करती हैं। कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पत्नी, बहू और मां की भूमिका यानी घरेलू कामकाज करने के साथ-साथ चलती है इसके बावजूद भी इस क्षेत्र में लिंग आधारित भेदभाव कई तरीकों से जारी है। उदाहरण के तौर पर महिलाओं को भारतीय नीतियों में किसानों के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है, जिससे उन्हें बैंक, बीमा, सहकारी समितियों और सरकारी विभागों के संस्थागत समर्थन से वंचित किया जाता है। यह सब कुछ आम दिनों की समस्याएं हैं जो लगातार बनी हुई हैं लेकिन महामारी के चलते लगे लॉकडाउन ने स्थिति को और अधिक दयनीय बना दिया। 

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भारत में अधिकतर कृषक आबादी छोटे और मंझोले किसानों की है। नव-उदारवादी युग में बढ़ती महंगाई और ग़ैर-कृषि नीतियों के चलते किसानों की आय उनकी ज़रूरतों को पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं होती, ऐसे में ग्रामीण घरों के अधिकतर पुरुष महानगरों का रुख करते हैं, जहां वे फैक्ट्रियों, कंपनियों में मज़दूरी करते हैं और उनके घरों की महिलाएं खेतों में काम करती हैं। बीते दशक से पलायन के ये आंकड़े बढ़े हैं। पुरुष बाहर से कमाकर पूंजी जमा करता है और पत्नी खेती सहित अन्य घरेलू जिम्मेदारी देखती है। इस साल बाहरी आमदनी पूरी तरह से बंद हो गयी और फलों व सब्जियों की कीमतें गिर गईं। इससे ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। पुरुष बाहर से लौट आए और अल्पहीनता व बेरोजगारी से उपजे उनके फ्रस्टेशन का शिकार औरतें बनीं।

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कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पत्नी, बहू और मां की भूमिका यानी घरेलू कामकाज करने के साथ-साथ चलती है इसके बावजूद भी इस क्षेत्र में लिंग आधारित भेदभाव कई तरीकों से जारी है।

घरेलू हिंसा और महिलाएं

नेशनल कमीशन फ़ॉर वीमेंस द्वारा दिए गए आंकड़ें के अनुसार 24 मार्च 2020 में प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के लगभग 14 दिनों बाद घरेलू हिंसा की घटनाओं में तक़रीबन 100 प्रतिशत इज़ाफ़ा हुआ। ‘द हिन्दू’ ने छपी एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च से लेकर मई महीने के बीच में लगभग 1477 घरेलू हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं, ये घटनाएं पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिलाओं ने दर्ज कराई होंगी। हालांकि, इस दौरान भी घरेलू हिंसा की शिकार हुई लगभग 86 प्रतिशत महिलाओं ने कोई मदद नहीं ली। ये आंकड़ें बताते हैं कि ऐसे इलाके जहां शिक्षा की कमी है और महिलाएं सामाजिक दायरों में जकड़ी हुई हैं, वे इन सारी समस्याओं से जूझने के लिए बाध्य हो जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में पुरुष द्वारा मार-पीट को सामान्य घटना मानकर नकार दिया जाता है। मैं ख़ुद गांव से हूं और इस सच्चाई से अवगत हूँ। सुबह घरेलू काम करके औरतें खेतों में काम करती हैं और किसी भी समय उनका पति उन्हें पीट सकता है। इस दौरान शारीरिक प्रताड़ना के अलावा महिलाएं मानसिक प्रताड़ना भी झेलती हैं।

स्टैटिस्टिका डॉट कॉम पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2020 में 26 से 32 साल की महिलाओं के बीच कराए गए सर्वे में क़रीब 54 प्रतिशत का मानसिक स्वास्थ्य नकारात्मक ढंग से प्रभावित हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों से इस तरह के आंकड़ें निकालना मुश्किल है, क्योंकि लोग अशिक्षित हैं और उनमें जागरूकता की कमी है, इस संदर्भ में 2015-16 में नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में मनोचिकित्सकों की मौजूदगी बेहद कम है। हालांकि, भले ही स्पष्ट आंकड़े मौजूद न हो लेकिन व्यवहारीय स्तर पर गतिविधियों को देखते हुए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य कोरोना के समय मे बहुत अधिक प्रभावित हुआ होगा।

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क्या है महिला किसानों की स्थिति

अब धीरे-धीरे लगभग सब कुछ खुल चुका है। मज़दूर वापस फैक्टरियों में लौट आए हैं। अनेक ज़रूरी वस्तुओं की कीमतें तेज़ी से बढ़ गई हैं। जो सब्जियां किसान 5 या 10 रुपए में भी बेच नहीं पा रहे थे, वे चौगुनी कीमत पर दुकानदार उन्हें बेच रहा है। धान की प्रति किलो कीमतें बीज के मूल्य से भी नीचे आ चुकी हैं। महिला किसानों से अब भी उनके होने पर सवाल पूछा जा रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत का प्रमुख किसान आंदोलनों में उनकी मौजूदगी को लेकर सवाल उठा रहा है। पोस्ट कोविड दौर में भी गांवों में वे अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रही हैं, जहां सबसे पहले उठकर चूल्हा-चौका करने के बाद जानवरों को चारा लगाती हैं और जनवरी की ठंड में आधी रात को जमा देने वाली सर्दी में खेत सींचती हैं, उन्हें अब भी उम्मीद है। वे इतना सबकुछ सहकर भी कुछ अच्छा होने की उम्मीद नहीं त्यागतीं!

गांव से होने के नाते और कोविड-19 लॉकडाउन में सात महीने गांव में रहकर मैंने इस दौरान के ग्रामीण जीवन को क़रीब से देखा। सरकार ने लोगों को मिलने-जुलने से रोक दिया था, मज़दूर नहीं मिल रहे थे, किसान फ़सल को खेत मे झरते देख रहा था। लाचारी में औरतें, बूढ़े, बच्चे सब खेत में लग गए थे, गेहूं काटने से लेकर भूसा भरने तक सब कुछ में औरतों ने घरेलू काम करते हुए अपनी बराबर की हिस्सेदारी दी। अब फिर से खेतों में गेहूं बो दिए गए हैं। बहुत सारे किसान अब सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकारी तंत्र और मीडिया की मिली-भगत के कारण दूर-दराज़ के उनके बहुत से सहयोगी ख़ासकर औरतें तमाम सच्चाइयों और सूचनाओं से कटी हुई हैं। अगर उत्तर प्रदेश के किसी गांव की महिला टीवी पर हरियाणा और पंजाब की महिलाओं को आंदोलन करते देखती तो निश्चित तौर पर वह अपनी भूमिका को लेकर सवाल करती, बहुत कुछ सोचती, लेकिन यह सब कुछ उस तक पहुंचने नहीं दिया जा रहा है। हालांकि, अब गांव की औरतें इस शोषण व भेदभाव को देख-जान रही हैं, वे आत्म निर्भर होने के लिए प्रयासरत भी हैं और लॉकडाउन में अपनी आर्थिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए उन्होंने अनेक छिटपुट काम जैसे- सिलाई-कढ़ाई भी शुरू कर दिए थे और इस तरह छोटे-छोटे कदमों से वे ऐतिहासिक साज़िश से निपटने के लिए अपनी बेटियों को तैयार कर रही हैं, शिक्षित कर रही हैं–इससे एक विश्वास उपजता है कि धीरे-धीरे यह ढर्रा बदलेगा और किसान शब्द कहने पर केवल पुरुष छवि नहीं उभरेगी। 

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तस्वीर साभार : Indian Express

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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