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साल 2020 भारत ही नहीं पूरे विश्व के लिए बेहद मुश्किल भरा साल रहा। कोरोना वायरस के चलते दुनिया के लगभग सभी बड़े-बड़े देश लॉकडाउन में थे और हर जगह किसी भी तरह की आवाजाही पर रोक थी। इस लॉकडाउन के दौरान महिलाओं का शारीरिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हुआ। इस दौरान न सिर्फ पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट्स उपलब्ध नहीं थे, बल्कि अबॉर्शन सेवाएं भी बाधित रही। साथ ही गर्भवती महिलाओं को सही इलाज मिलने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कोरोना वायरस के चलते दुनियाभर के अस्पताल वायरस की चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर रहे थे। ऐसे में महिलाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी मूलभूत सुविधाओं का लाभ ले पाना मुमकिन नहीं था। कोविड मरीजों की भरमार के चलते लोगों में भी अस्पताल जाने को लेकर एक डर था, और अस्पताल भी कोविड के अलावा किसी अन्य मरीज़ को तुरंत भर्ती कर लेने में हिचक रहे थे।

Ipas Development Foundation (IDF) के द्वारा करवाई गई एक स्टडी के अनुसार देश की लगभग 18 लाख से अधिक महिलाएं कोरोना के दौरान हुए लॉकडाउन के कारण अबॉर्शन सेवा का लाभ नहीं उठा पाईं। यह स्टडी कोरोना के कारण देश भर में 25 मार्च 2020 से हुए लॉकडाउन के दौरान महिलाओं तक अबॉर्शन की सुविधा की पहुंच का आंकलन करती है। स्टडी के मुताबिक इन महिलाओं को यह नुकसान पब्लिक और प्राइवेट दोनों ही क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं में हुई। कई रिपोर्टों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान अस्पतालों में बच्चों की डिलीवरी में भारी गिरावट आई।

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द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक मसीना हॉस्पिटल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ.मंजिरी काबा ने द संडे गार्डियन को बताया, “कोविड मरीजों की संख्या में भारी वृद्धि के कारण स्टाफ़ और इन्फास्ट्रक्चर अपर्याप्त साबित हो रहे थे। इसलिए कई गर्भवती औरतों को वापस भेजना पड़ा। इन महिलाओं को बच्चों की डिलीवरी के लिए छोटे नर्सिंग होम्स और सरकारी या म्युनिसिपल अस्पतालों का रुख करना पड़ा। कहने की ज़रूरत नहीं कि अस्पतालों में प्रसव दर लगभग 50% तक गिर गई है। बल्कि शुरुआत के कुछ महीनों में कोई भी डिलीवरी नहीं हुई। वायरस के डर के कारण, कई महिलाओं ने घर ही पर किसी की मदद से या बिनी किसी की देखरेख में बच्चा जनना सही समझा। ऐसा करते हुए उन्होंने न सिर्फ खुद का स्वास्थ्य बल्कि बच्चे का भी स्वास्थ्य और सुरक्षा दांव पर रखी।” 

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कई स्टडीज़ में ऐसा भी पाया गया कि लॉकडाउन के कारण महिलाओं के साथ घरेलू और यौन हिंसा के मामले बहुत बढ़ गए। ऐसे में अनचाही प्रेगनेंसी के भी कई मामले सामने आए। बढ़ती पारिवारिक हिंसा और जिम्मेदारियों के कारण महिलाओं के स्वास्थ्य पर यकीनन गहरा असर देखने को मिला। एनजीओ फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज़ इंडिया के सीईओ चंद्रशेखर वी.एस ने द प्रिंट से बात करते हुए बताया, “लॉकडाउन के दौरान गर्भसमापन सेवाओं तक पहुंचने में आने वाली शारीरिक बाधाएं लॉकडाउन द्वारा उत्पन्न सबसे गंभीर मुद्दों में से एक थी।” उनका कहना था कि आमतौर पर वैसे भी इन सुविधाओं की कमी है और लॉकडाउन के समय स्थिति और ख़राब हो गई

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ऐसा सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी देखने को मिला। स्वास्थ्य संबंधित विषयों के बारे में नवीनतम जानकारियां उपलब्ध कराने वाली अंतरराष्ट्रीय पत्रिका- Acta Obstetricia et Gynecologica Scandinavica में छपी एक स्टडी बताती है कि लॉकडाउन के दौरान स्पेन की गर्भवती महिलाओं में डिप्रेशन और गहरी चिंता के कई लक्षण देखने को मिले। यह स्टडी विश्व स्तर पर फैली महामारी के दौरान महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करती है। खराब मानसिक स्वास्थ्य के कारण गर्भवती महिलाओं में डिप्रेशन और बढती चिंता जैसे लक्षण दिख सकते हैं जो बच्चे पर बुरा असर डाल सकता है।

“लॉकडाउन के दौरान गर्भसमापन सेवाओं तक पहुंचने में आने वाली शारीरिक बाधाएं लॉकडाउन द्वारा उत्पन्न सबसे गंभीर मुद्दों में से एक थी।”

भारत में आम तौर पर पीरियड पॉवर्टी का असर रहता ही है। पीरियड पॉवर्टी यानि पीरियड के दौरान इस्तेमाल होने वाले सामान जैसे पैड्स, टैमपन्स आदि की उपलब्धि में कमी होना। लॉकडाउन का पीरियड पॉवर्टी पर भी बुरा असर पड़ा। सभी कारखानों और दुकानों के बंद होने के कारण पीरियड्स के दौरान महिलाओं को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा। प्लान इंटरनेशनल नामक संगठन ने पाया कि लॉकडाउन में महिलाओं के लिए अपने पीरियड्स संभालना एक बेहद मुश्किल भरा काम रहा। उन्होंने 30 देशों के पेशेवर स्वास्थ्यकर्मियों का सर्वे किया जिसमें 73% लोगों का कहना था कि आपूर्ति चेन के बाधित होने के कारण पीरियड्स प्रॉडक्ट्स का लोगों तक पहुंचना एक गंभीर समस्या बन गया। लगभग 58% लोगों का कहना था कि लॉकडाउन में पीरियड उत्पादों की कीमत में बढ़त के कारण पहले से मौजूद पीरियड पॉवर्टी की स्थिति और खराब हो गई।

प्लान इंटरनेशनल यूके के चीफ एग्जीक्यूटिव- रोज़ काल्डवेल का कहना है कि अब पीरियड्स प्रोडक्ट्स के बढ़ते दामों के कारण लड़कियों और महिलाओं को पीरियड उत्पादों की कमी झेलनी पड़ रही है जिस कारण उन्हें अपने पास पहले से मौजूद उत्पादों से ही काम चलाना पड़ रहा है। यह स्थिति उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है और उनमें इन्फेक्शन का खतरा बढ़ सकता है।” फ़ोर्ब्स की रिपोर्ट यह भी बताती है कि IMF के वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक और वर्ल्ड बैंक के के डाटा के अनुसार, “कोविड-19 के कारण 1998 के बाद पहली बार ग्लोबल पॉवर्टी में बढ़त देखने को मिल सकती है।” इस वित्तीय दबाव और गरीबी के डर के चलते पहले से मौजूद पीरियड पावर्टी में इजाफा हो सकता है।

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तस्वीर साभार: Telegraph India

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