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जब हम इतिहास में दर्ज़ जरूरी नामों को पढ़ते हैं, उन नामों की प्रासंगिकता उनके जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं पर निर्भर करती है। लंबे समय तक इतिहास के जरूरी नामों, तारीख़ों, घटनाओं की फेहरिस्त से महिलाओं का नाम नदारद रहा। क्या महिलाएं ऐतिहासिक तौर पर महवपूर्ण घटनाओं में अपनी भागीदारी नहीं दे रही थी? क्या महिलाएं समाज में सांख्यिक रूप से पुरुषों के मुक़ाबले इतनी कम थी कि उनके बारे में ना के बराबर बात होना तर्कसंगत है। इससे समझने के लिए उनके इतिहास बनने के सफ़र को शुरुआत से समझना होगा।

इतिहास और इतिहास बनाए जाने में अंतर

हम इतिहास किसे कहते हैं? मानव जाति की उपत्ति के बाद से जो घटनाएं दर्ज़ की गई, साथ ही अलग-अलग समय में उनकी उचित व्यख्या की गई, वही इतिहास माना जाता है। वे घटनाएं जिनका कोई अभिलेखन यानी रिकॉर्ड नहीं है उनके लिए ‘इतिहास’ शब्द का प्रयोग नहीं किया जाएगा। महिलाएं संख्या में पुरुषों के बराबर या कई जगहों या सभ्यताओं में उनसे ज्यादा रही हैं। अभी के समय भी बात करें तो ‘आवर वर्ल्ड इन डेटा’ के अनुसार दक्षिणी और पूर्वी एशिया के इलाकों में, ख़ासकर भारत और चीन में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले कम हैं क्योंकि इन देशों में कन्या भ्रूण हत्या के अलावा कई ऐसी आपराधिक घटनाएं देखी जाती हैं जो इस लिंग अनुपात के लिए ज़िम्मेदार माना जा सकता है। वहीं, मिडल ईस्ट में कई ऐसे देश आज भी हैं जहां औरतों की संख्या आज भी पुरुषों से अधिक है, जैसे ओमान, यूऐई। पूर्वी यूरोप में भी जनगणना आंकड़ें ऐसा ही कुछ दर्शाते हैं लेकिन पुराने समय ऐसे बेहद कम इलाके थे जहां महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बेहद कम हो। समाज और सभ्यता के बनने में उनकी बराबरी की भागीदारी थी। 

इतिहास भूत की घटनाएं होती हैं, इसलिए वर्तमान में इतिहास पढ़ते हुए इतिहास के बनने की प्रक्रिया यानी उसे दर्ज़ की जाने की व्यवस्था के बारे में जानना जरूरी हो जाता है। मेसोपोटामिया की सभ्यता द्वारा लिखने-पढ़ने के लिए लिपि प्रणाली का विकास किए जाने से लेकर आज के समय तक की घटनाएं इतिहास का रूप ले रही हैं। सुमेरियन सभ्यता के राजाओं से लेकर बाद के कई इतिहासकार, दरबारी, पंडित, प्रशिक्षित शिक्षण क्षेत्र के पेशवर, बुद्धिजीवी लोगों ने तमाम घटनाओं को दर्ज़ किए जाने लायक महवपूर्ण घटनाओं को चुना। उनके बारे में विस्तार से लिखा ताकि आने वाले समय में जब कोई उसे पढ़े तो उसका अर्थ और संदर्भ जान पाए। लंबे समय तक इतिहास दर्ज़ करने वाले या कहें इतिहास ‘बनाने’ वाले लोग पुरूष रहे हैं। इसलिए उन्होंने उन घटनाओं को प्राथमिकता दी जो पुरुषों के मुताबिक जरूरी थी, जिन्हें पुरूष समाज ने सामूहिक रूप से अनुभव किया था। इसे इतिहास बुलाया गया और तो और इसे सार्वभौमिक भी कहा गया। देखने वाली बात है कि यह दर्ज़ इतिहास घटनाओं को पुरुषों के नज़रिए से या कहें मेल गेज़ के मुताबिक गढ़ा गया। औरतें व्यक्तिगत और सामूहिक तौर जो उसी समय काल में कार्य कर रही थीं, उस समय काल को लेकर जो कुछ अनुभव कर रही थीं उसे इतिहास में दर्ज नहीं किया गया बल्कि उसे इतिहास की घटनाओं की व्याख्या के दौरान उपेक्षित रखा गया।

लंबे समय तक इतिहास दर्ज़ करने वाले या कहें इतिहास ‘बनाने’ वाले लोग पुरूष रहे हैं। इसलिए उन्होंने उन घटनाओं को प्राथमिकता दी जो पुरुषों के मुताबिक जरूरी थी।

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महिलाओं को अपना इतिहास दर्ज़ करने से दूर रखा गया। इसलिए अगली पीढ़ी की महिलाओं के लिए पिछली पीढ़ी की औरतों के काम, उनकी सामाजिक भागीदारी का कोई ख़ास लेखा-जोखा मौजूद नहीं होता था। महिलाएं समाज और सभ्यता के निर्माण के केंद्र भूमिका में होने के बावजूद इतिहास की नज़र से हाशिये पर दिखती रहीं। कई मुख्यधारा के महवपूर्ण क्षेत्रों को महिलाओं की पहुंच से दूर रखा गया। इन क्षेत्रों में हुए रिसर्च, व्याख्यान भी मर्दाना चश्मे से हुए। एक व्यवस्थित तरीक़े से महिलाओं को प्रतीकवाद, जीवन दर्शन, विज्ञान, क़ानून बनाने से अलग रखा गया। शिक्षा का अधिकार उनके लिए नहीं था। सामाजिक सिद्धान्त निर्माण जिसके आधार पर लोग किसी सामाजिक व्यवस्था में होने वाली घटना का कारण पता करने की कोशिश करते हैं, यहां भी पुरुषों का आधिपत्य था। इसलिए लंबे समय तक महिलाओं के ऊपर पुरुषों के आधिपत्य को प्राकृतिक बताने के लिए कई सिद्धान्त बनाए जाते रहे।

ऐंथ्रोपोलॉजिस्ट्स ने कई साल तक यह थ्योरी बताई कि पहले का इंसान शिकारी होता था क्योंकि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अधिक शारीरिक बल होता है इसलिए उनका काम सबसे अहम माना गया और उनका वर्चस्व ज्यादा था। वहीं ग्रेडा लर्नर अपनी क़िताब ‘द क्रिएशन ऑफ पेट्रीआर्की’ में बताती हैं कि कैसे नारीवादी मानव विज्ञानी यानी ऐंथ्रोपोलॉजिस्ट्स ने कई ऐसे समाजों का जिक्र किया है जहां ये थ्योरी काम नहीं करती। साथ ही, महिलाएं और बच्चे पुरुषों के मुक़ाबले अलग लेकिन जीवन यापन के लिए किए गए अन्य जरूरी रोज़मर्रा के काम करते थे। उनकी भूमिकाओं को कमतर बताकर मानव विज्ञानियों ने एक तरह से इतिहास को मेल गेज़ से लिखे जाने का काम किया है। नारीवादी आंदोलन के तीसरे चरण में कई नारीवादी मानव विज्ञानी सक्रिय थी। इसकी जननी मैकेको डी लियोनार्डो को कहा जाता है। 

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औरतों के वस्तुतिकरण का कारण और इतिहास

आजकल कई बार महिलाओं द्वारा अपनी पसंद के अपारंपरिक कपड़े पहनने, सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने या न्यूड फ़ोटो पोस्ट करने को पुरुष समाज बड़ी आसानी से ‘अटेंशन सीकिंग’ कह देता है, या उस महिला का वस्तुतिकरण करने लगता है। अपनी यौनिकता, यौन इच्छाएं खुलेआम जाहिर करने वाली औरतें समाज को डराती हैं। यह कोई नहीं बात नई नहीं है। महिलाओं का वस्तुतिकरण यानी उन्हें इंसान की जगह कोई वस्तु या सिर्फ संसाधन की तरह मानना। क्लाइड लेवी स्ट्राउद के अनुसार सेक्सुअलिटी और प्रजनन क्षमता के कारण महिलाओं का वस्तुतिकरण हुआ। बात तब की है इंसान कृषि समाज बनाने की तरफ़ बढ़ा। तब पाश्चात्य सभ्यता का भी निर्माण नहीं हुआ था। हर समुदाय को खेतों में काम कराने के लिए बच्चों की जरूरत होती, ताकि उनकी उपज ज्यादा हो। महिलाएं प्रजनन कर सकती थी, वे यौन सुख भी दे सकती थी। इसलिए महिलाओं से इन दो चीजों को पुरुषों को मिलने वाली सुविधाओं के तौर पर लिया जाने लगा। उस समाज में एक समूह के तौर पर जो अधिकार पुरुषों का महिलाओं पर था वो महिलाओं का पुरुषों और नहीं था। हिंसा या मैत्री से ये समूह अपने समाज में महिलाओं की संख्या जमीन के किसे टुकड़े की तरह बढ़ाना चाहते थे। उन्हें इंसान की तरह नहीं बल्कि संसाधन या काम की वस्तु की तरह देखा जाने लगा था।

‘क्लास’ की खींचातानी के बीच औरतें

आंतरिक स्त्रीद्वेष के बिना पितृसत्ता का विस्तार मुमकिन नहीं है। आंतरिक स्त्रीद्वेष में जब ‘क्लास’ यानी सामाजिक शक्ति श्रेणी जब मिल जाती है तब मामला और भी भयंकर नज़र आता है। हर समाज में उच्च वर्ग की महिला होने के लिए उच्च वर्ग के पुरुष के साथ वैवाहिक बंधन में आना जरूरी था। बदले में पुरुष महिला को ‘सुरक्षा’ देता था। ‘सुरक्षा’ मतलब इस सामाजिक शक्ति श्रेणी में अन्य लोगों से ऊपर का स्थान। जबतक महिलाएं उच्च समाज के सारे नियम मानती, वे उनकी ‘इज्ज़त’ मानी जाती थीं। बदले में ये औरतें निचले पायदान पर रखे गए लोगों पर हुक्म चला सकती थीं। इस तरह से उन्हें इस भ्रम में डाला गया कि वे ‘शोषित’ नहीं है क्योंकि उनके पास भी कुछ सामाजिक हैसियत आ गई है। लेकिन जैसे ही कोई उच्च कुल की महिला अपने समाज के नियमों का बहिष्कार करती उन्हें उस ओहदे से हटा दिया जाता। इस तरह उच्च कुल महिलाओं ने और उच्च कुल में जन्मी लड़कियों ने रक्षा की राजनीति में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को ठोस करना चुना। भले ही उनके घरों में उनके पुरुषों या अपने भाइयों के बराबर के अधिकार न मिले हो। 

आप चन्नार आंदोलन को देख सकते हैं जब निचली जाति की महिलाओं को उनके स्तन ढकने के लिए उच्च जातियों को टैक्स देना पड़ता था। नांगेली नामक महिला ने इसके खिलाफ विरोध दर्ज़ करते हुए अपने स्तन काट डाले थे। इस तरह की कई शोषक व्यवस्थाएं केवल निचली जातियों की औरतों के लिए बनाए गए थे। निचले तबके के पुरुषों का शोषण उच्च तबक़ों ने श्रम के आधार पर किया लेकिन निचले तबक़ों की महिलाओं का श्रम के आधार पर तो हुआ ही साथ ही यौन रूप से भी किया गया। इसलिए जब हम शोषण का इतिहास देखते हैं तब पाते हैं कि किसी भी समाज में निचले तबके की महिलाओं ने सबसे ज़्यादा और अमानवीय शोषण झेले हैं। 

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महिला इतिहास की जरूरत

महिलाओं को अपना इतिहास पता होना बहुत ही आवश्यक है। उनकी मांओं का इतिहास, उनकी महिला पूर्वजों का इतिहास क्योंकि कई ऐसे पुरूष हैं जिनका गुणगान इतिहास में उन्हें हीरो बनाकर दर्ज किया गया है जबकि वे महिलाओं के प्रति प्रोब्लेमटिक काम करते थे या वैसे विचार रखते थे। जब मैंने जाना कि बाल गंगाधर तिलक के विचार थे कि महिलाओं की शिक्षा केवल घर और परिवार संभालने पर केंद्रित होनी चाहिए और हिन्दू समाजिक व्यवस्था के अनुरूप होनी चाहिए। उनके अनुसार बाल विवाह महिला विरोधी प्रथा नहीं थी क्योंकि औरतों का घर उनका ससुराल होता है। यहां तक कि तिलक ने विधवाओं के सिर मुंडाने के ख़िलाफ़ ज्योतिबा फुले के अभियान का विरोध किया था। यह पढ़ना मेरे लिए असहज और था क्योंकि स्कूली किताबों में आज़ादी के आंदोलनों के बारे में पढ़ते हुए तिलक का यह पक्ष नहीं बताया जाता है। इतिहास की किताबें कई ऐसे पुरुषों की उन बातों को बताना जरूरी नहीं समझती जिससे उनकी छवि को ठेस पहुंचे। जबकि इतिहास और समाज को देखने का नारीवादी नज़रिया स्कूली शिक्षा का अहम अंग होना चाहिए था।

कई बात महिलाओं का किसी क्षेत्र में काम करने के लिए प्रशिक्षण ऐसे होता है कि वे ‘पुरुषों की तरह’ सोच सकें। जबकि हमें सबसे ज्यादा जरूरत एक नारीवादी चश्मे की है। धार्मिक रूढ़ियों के कट्टरपंथी विचारकों से लेकर विज्ञान को मर्दाना अनुभव और नज़रिए से लिखकर उसे मानव जाति का एकमात्र अनुभव या विचार कहने वाली व्यवस्था को नकारना जरूरी है। आपको हर क्षेत्र में आगे आने वाली महिला के ऊपर अपने पुरूष साथियों की तरह सोचने और कार्य करने के तरीक़े को अपनाने का बोझ आसानी से दिख जाएगा क्योंकि ‘महिलाओं की तरह’ सोचने या काम करने को अच्छी बात नहीं मानी जाती है। लंबे समय तक महिला ने अपने निज़ी अनुभवों को, महिलाओं ने एक समूह के तौर पर अपने अनुभवों को न्यायसंगत या उचित नहीं माना क्योंकि हर जगह, हर व्यवस्था का बनना और उसकी व्याख्या मर्दाने चश्मे और सहूलियत से हुई है।महिलाओं की संस्कृति उन्हें पितृसत्ता को अपनाने की जगह अपनी सर्जनात्मकता और अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करती है। यह संस्कृति उन्हें सिस्टरहूड में बांधती है। अमरीकी इतिहासकार ग्रेडा लर्नर, महिला इतिहास लिखती थीं। वह कहती हैं, “जो अनुभव समाज मानने से मना करता है उसपर भरोसा करें। अपने हर विचार को लेकर आलोचनात्मक रहें क्योंकि आप पितृसत्तात्मक व्यवस्था में हैं। बौद्धिक औरतों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है स्वीकृति और सुरक्षा की चाहत को नकारना और ‘अनफेमिनिन’ गुणों की तरफ़ बढ़ना जो कि पुरुषों व्यवपकों द्वारा बनाए गए हैं।”

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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