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मैंने आज एक स्त्री को देखा जिसने श्रृंगार भी किया हुआ था। माथे पर छोटी सी बिंदी और मांग में सिंदूर लेकिन इस औरत का वैवाहिक जीवन कष्टदायक रहा है। शादी के कई साल बाद वह अपने पति से अलग हो गई। जिस रिश्ते में हमेशा मार-पीट ही मिली, जहां कभी सम्मान नहीं मिला तो उसने अपने बचे हुए जीवन को जीने के लिए उस आदमी से अलग रहना ही बेहतर समझा। फिर क्या होना था, यह तो स्वाभाविक है जब कोई स्त्री अपने लिए आवाज़ उठाती है तो वे आवाजें भी उसके खिलाफ हो जाती हैं जो कभी उसके साथ थीं। खैर, एक कठिन जीवन यात्रा के बाद भी जब वह सजना-संवरना नहीं छोड़ती और अब वह खुद के लिए सजती है तो जिस समाज ने उसे अब तक केवल पति के लिए सजना सिखाया था वह इसे एक चुनौती की तरह देखता है। खासकर, वे लोग जो एक औरत का सजना-संवरना उसका पत्नी धर्म मानते हैं।

असल में हर औरत अपने पति के लिए ही नहीं सजना चाहती है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां हमें बचपन से ही कुछ ऐसी बाते सिखाई जाती हैं जो पितृसत्ता को बढ़ावा देती हैं। शादी से पहले कोई लड़की बिंदी या लिपस्टिक लगाती है तो उसे डांटा जाता है और ऐसा करना अश्लील समझा जाता है। तब समाज के कुछ पितृसत्तात्मक लोग आकर उसे समझाते हैं कि औरत को श्रृंगार केवल उसके पति के लिए ही करना चाहिए और शादी से पहले ये सब शोभा नहीं देता। दूसरी श्रेणी में आती हैं ‘शादीशुदा लड़कियां।’ अगर कोई औरत श्रृंगार जैसे कि बिंदी ,लिपस्टिक ना करे तो फिर यही लोग आकर उसको पाठ पढ़ाते हैं लेकिन इस वक्त वे अपने शब्द बदलकर बोलते हैं लेकिन उसका मूल भाव समान रहता है; पति के लिए हमेशा सजना-संवरना चाहिए। तीसरी श्रेणी में आती हैं वे औरतें जिनके पति मर चुके हैं या अपने पति से अलग रह रही हैं। यदि ये औरतें ढंग के कपड़े भी पहन लें या थोड़ा सज-संवर लें तो फिर यह समाज उन पर तरह-तरह के लांछन लगता है, उन्हें चरित्रहीन बताता है, गालियां देता है और फिर से उसे समझाता है कि तुम्हारा पति तुम्हारे साथ नहीं है तो तुम किसके लिए संवरती हो? इन लोगों को जाकर कोई बताता क्यों नहीं कि हम अपने लिए सजते हैं, अपने लिए संवरते हैं, हमारा पति कोई नहीं।

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जन्म लेते ही औरत का अस्तित्व उसके पिता के हाथो में सौंप दिया जाता है, शादी के बाद उसके पति को, मां बनने के बाद वह स्वयं ही अपना अस्तित्व अपने बच्चों को सौंप देती है लेकिन वह खुद क्या करती है? त्याग, अपने अस्तित्व का? जीवनभर?

अगर श्रृंगार सिर्फ पति के लिए किया जाता है तो फिर हर औरत का पति है। उसका पति वह खुद है वह खुद को खुश करने के लिए संवरती है। अगर पति शब्द पर गौर करें तो यह पितृसत्तात्मक समाज का प्रतीक है जिसका अर्थ ही ‘सर्वोपरि’, ‘उच्च’, ‘मालिक’ है, जो अपने साथी को नियंत्रण में रखता है वह तानाशाह है। शादी की संस्था के अनुसार दो व्यक्तियों को एक बंधन में बांधा जाता है और उनके रिश्ते को पति-पत्नी का नाम दिया जाता है। जिसमें पति को ‘स्वामी’ का दर्जा दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर वह औरत जो धर्मपत्नी कहलाती है वह जीवन भर उसकी आज्ञाकारिणी बनने की कसमें खाती है। जन्म लेते ही औरत का अस्तित्व उसके पिता के हाथो में सौंप दिया जाता है, शादी के बाद उसके पति को, मां बनने के बाद वह स्वयं ही अपना अस्तित्व अपने बच्चों को सौंप देती है लेकिन वह खुद क्या करती है? त्याग, अपने अस्तित्व का? जीवन भर? क्या औरत कभी खुद के लिए जीती है?

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पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं की मानसिकता को ही ऐसा बना दिया है कि वह सांसे चलते रहने को ही अपना जीवन मान लेती है। पितृसत्ता द्वारा गढ़े गए सुंदरता के पैमाने आज हम चारों तरफ पाते हैं। समाज का प्रत्येक व्यक्ति सुंदर दिखना चाहता है और यहां पर सुंदरता पुरुषों से ज्यादा स्त्रियों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। इन पैमानों को गढ़ने और बॉडी शेमिंग की शुरुआत होती है हमारे घर से। एक बच्चे को छोटी उम्र से ही खाने पर रोक लगाई जाती है क्योंकि वह मोटे हो जाएंगे। सुंदर दिखने की इच्छा आज इतनी ज्यादा है मनुष्य में कि वे अपने आपको बदसूरत मानकर वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। सुंदरता के मानदंड पितृसत्ता की ही उपज हैं। समाज को इस कुरीति ने इतनी बुरी तरह जकड़ रखा है कि इंसान यथार्थ से ही परे हो जाता है। इस व्यवस्था के जाल में हम फंसते इसीलिए हैं क्योंकि यह चारों ओर है। अगर हम टेलीविजन देख रहे हैं तो यह संभव है हमारी नजर उस प्रॉडक्ट पर ज़रूर पड़ती है जो चेहरे को खूबसूरत बनाने का दावा करते हैं और हम चाहकर भी इनसे दूर नहीं जा पाते हैं। कोई कंपनी उत्पादन ही उस सामान का करती है जिसकी बाज़ार में मांग अत्यधिक हो और बाजार उन लोगों से भरा हुआ है जो चौबीस घंटे अपने चेहरे, अपने रंग को लेकर चिंतित रहते हैं। इस चिंता का फायदा बाज़ार पूरी तरह उठाता है।

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सुंदरता का यह पैमाना स्त्रियों के लिए ज्यादा दुखदाई है। पितृसत्तात्मक समाज को यह समझने की आवश्यकता है स्त्री कोई वस्तु नहीं है जिसमें हम मोल-भाव, नाप-तौल कर खरीदें। स्त्री किसी की रचना नहीं है वह एक साधारण मनुष्य है। उसमे कौशल है, प्रतिभा है, वह कोई भोग-विलास की वस्तु नहीं है। एक लड़की को क्या पहनना है , एक शादीशुदा औरत कैसी रहेगी, एक विधवा कैसे जीएगी यह सब समाज तय करता है जो पितृसत्तात्मक है। यहां तक कि कपड़ों के रंग पर भी समाज टिप्पणी करता है। सुंदरता के इस जाल ने बुरी तरह औरतों को जकड़ कर रखता है। सुंदरता ही वह जाल है जिसने आज तक औरत को बंधन में रखा है। केवल कुछ ही स्त्रियां इस देह, श्रृंगार से आगे बढ़कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाई है। आज हम हर क्षेत्र में महिलाओं का योगदान पुरुषों से कम देखते हैं लेकिन कभी हमने इसका कारण जानने की कोशिश की? इसका एक बड़ा कारण इस देह की सुंदरता रही है जिसे वह अपना सब कुछ समझती है और इसमें उस औरत का कोई खोट नहीं है। खोट इस पितृसत्तात्मक समाज का है जिसने औरत को सजने-संवरने की शिक्षा दी और इससे आगे कभी बढ़ने नहीं दिया। जिस दिन औरत अपने साथ हुए इस अन्याय का हिसाब मांगेगी उस दिन उस दिन सारे कानून फेल होंगे।

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तस्वीर साभार : The Scroll

भावना शर्मा दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज में बीए की छात्रा हैं।

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