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लोकगीत में बिना दुराव-छिपाव के जनमानस के भाव अभिव्यक्त होते हैं इसलिए ये गीत अपने लगते हैं। रोज़मर्रा के जीवन के चित्रों से सजे इन गीतों में निजी अनुभव और स्मृतियां बसे होने के कारण ही ये लोक के कंठ में अपना स्थान बना पाते हैं। इन गीतों में लोक परंपरा और संस्कृति के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष संबंधों के अंतरंगी सुंदर चित्र बिखरे हुए होते हैं। इन चित्रों में जीवन के संघर्षों के बीच विश्राम के क्षणों में प्रेम के आत्मिक और आंतरिक एकाकार क्षणों के रंगीन दृश्य स्त्री कंठ से निकलकर गीतों में साकार हो उठते हैं। प्रेम के मधुर एहसास उन्मुक्त भावों के रूप में अभिव्यक्ति पाते हैं। जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए स्त्रियों को आंदोलन करना पड़ता है, वही आज़ादी बिना किसी शोर के इन गीतों के ज़रिये कब उसने अपने नाम किया यह कोई नहीं जानता। यौनिकता के बारे में ऐसी आज़ादी अक्सर स्त्रियों को बोल्ड और अश्लीलता के तमगे के साथ मिलती है। लोक में अश्लील कुछ नहीं होता। इसका उदाहरण है यह गीत जिसमें अपने जीवन के अंतरंग क्षणों के दृश्य बड़ी ही सहजता के साथ कोई भी स्त्री गुनगुना सकती है। शृंगार रस में डूबा यह गीत दामंपत्य प्रेम के मधुर दृश्य को बड़ी शालीनता के साथ प्रस्तुत करता है, “अंखिया भइले लाल, एक नींद सुतअ द बलमुआ, चढ़त फागुनवा गौना ले के आईले, मीठी मीठी बतिया में सुधिया हरायिले,टूटे लागल मोर पोर ,पोर हो, अरे एक दिन सुत द बलमुआ … रसे रसे भइले कठोर हो ,अंखिया भइले लाल।”

गौना करके आई नवविवाहिता स्त्री के अंतरंग और मधुर क्षणों को बड़ी ही सहजता के साथ कहने की कला लोकगीतों में ही हो सकती है। इसलिए स्त्री मन की गहराईयों तक पहुंचने के द्वार हैं लोकगीत। ऐसे निजी प्रसंगों को दर्शाने वाले इन गीतों में अश्लीलता नहीं दिखाई देती। रूमानियत से भरे ऐसे लोकगीतों को निर्विकार भाव से लोक समाज गाता और सुनता है। लोकगीतों में स्त्री के सपने, आशा ,आकांक्षाएं ,शिकवे-शिकायत सभी कुछ दर्ज हैं। लोक समाज शृंगार प्रिय समाज है। ऋतु परिवर्तन के साथ ही लोक हृदय के तार झंकृत होने लगते हैं। विशेषकर वसंत ऋतु की प्रकृति बड़ी मादक होती है। प्रकृति में सब कुछ उल्लास से भर जाता है। लोकमन अपने उल्लास और प्रसन्नता को प्रकट करने के लिए गीतों का सहारा लेता है जिसमें प्रेम के उन्मुक्त चित्र उकेरे जाते हैं। माना गया है कि प्रेम, काम की ही मानसिक अभिव्यक्ति का ही एक रूप है लेकिन समाज काम की शक्ति को सीधे-सीधे स्वीकारने से घबराता है। काम का नाम सुनते ही लोक लाज और मर्यादा की दुहाई देने लगता है। वहीं, लोक जीवन इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करता है और निश्छल मन से अभिव्यक्ति करने का साहस अपने गीतों मे करता है जिसे युवा हो या प्रौढ़, सभी निर्मुक्त भाव से सामूहिक रूप में गाते और सुनते हैं।

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महिलाएं अपनी भावनाओं को खुलकर इन गारी गीतों में अभिव्यक्त करती हैं। इसी प्रकार श्रम करते हुए, खेत में धान रोपती महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत महिलाओं के पक्ष को सामने रखते हैं। इन गीतों के भीतर टटोला जाए, तो उनके मन की गई गांठें ,कई परतें खुलती नजर आएंगी।

लोक संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता है उसका खुलापन। प्रेम संबंधों के लिए जैसी खुली भूमि लोक साहित्य में मिलती है वैसे शायद ही किसी रूप में मिले। मिलन की चाह लिए नवविवाहिता गाती है, “जोबन एड़ी की धमक से ढ़लो जाए, भायेली गौना कब होयगौ, जोबन भरै तरंग मेरौ झुक झोका खावै, कामदेव बलवान हर घड़ी अपनौ दखल जमावै, एरी मेरी आंखिन में नसा सौ रह्यो आवै, भायेली गौना कब होयगौ।” परदेसी पति से दूर हो तो वियोगिनी विरह में कह उठती है, “चढ़ल जवानी जोर पियऊ हो गइलन कठोर, हमें छोड़ के लोभइलन परदेस, छोड़ के लोभइलन परदेस, बटोही भाई गवना कराके दिहलन घरवा में बइठाई, का कइलीं कसूर जे परदेस गइलन पराई।” मुखरता के साथ स्त्रियां जो गीत गाती हैं उसकी अंतर्वस्तु में बूढ़े पति के साथ नवयौवना की इच्छाओं अतृप्ति के भाव खुलकर अभिव्यक्त होते हैं, ब्रज अंचल के एक प्रसिद्ध लोकगीत में स्त्रियां बूढ़े पति को जी भर कोसते हुए अपनी व्यथा को इस प्रकार व्यक्त करती हैं, “बिन मेल बिगड़ गया खेल, बुढ़े से मेरी जोड़ी ना मिले, पांच बरस की मैं मेरी मैना ,पंचपन के भरतार, वे तो ले गए लगन लिखाया, बुढ़े से मेरी जोड़ी ना मिले, छ:बरस की मैं मेरी मैना ,पचपन के भरतार, वे तो ले गए तोरन मार, बूढ़े से मेरी जोड़ी ना मिले, याकू बाबा कहूं भरतार , बुढ़े से मेरी जोड़ी ना मिले।” लोक जीवन में ऐसे अनेक लोकगीत प्रचलित हैं जिसमें स्त्रियों ने थोपे हुए संबंधों में अपनी नाराज़गी जाहिर की है। लोकगीत में इस प्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अन्य माध्यमों की अपेक्षा ज्यादा है। लोक साहित्य इस मामले में उदार है। मैथिली भाषा का चर्चित विद्यापति रचित गीत में अनमेल विवाह से व्यथित स्त्री अपने भाग्य की चूक के लिए स्वयं को कोस रही हैं और कह रही है, “पिया मोर बालक हम तरूणी गे, पिया मोर बालक हम तरूणी गे, कोन तप चुकल भेलहुं जननि गे।”

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इस लोकगीत की स्त्रीवादी आलोचना के कई बिंदू हो सकते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है स्त्री मन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। यहां इस बात को भी समझना होगा कि ग्रामीण महिलाओं की अभिव्यक्ति का एक माध्यम लोकगीत ही तो हैं जहां वे बेझिझक अपनी बात बिना पहचान दिए रख सकती हैं। लोकगीत सामूहिक रचना होते हैं। सबके साथ हंसकर, बतकही कर अपना दुख, अपनी कुंठाएं भुलाने का जरिया गीत ही तो होते हैं। इन गीतों में पुरुषों, सास, ननदों को उलाहने वाले गीत हो या  विवाह के दौरान होने वाले रीति-रिवाजों से संबंधित गीत, सबमें महिलाओं द्वारा हास परिहास के साथ दी जाने वाली ‘गारी’ का अपना आनंद है। विशेषकर गारी गीतों का एक दूसरा पक्ष, महिलाओं का पक्ष है। महिलाएं अपनी भावनाओं को खुलकर इन गारी गीतों में अभिव्यक्त करती हैं। इसी प्रकार श्रम करते हुए, खेत में धान रोपती महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत महिलाओं के पक्ष को सामने रखते हैं। इन गीतों के भीतर टटोला जाए, तो उनके मन की गई गांठें ,कई परतें खुलती नजर आएंगी।

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संयोगियों के लिए चैत मास जितना सुखद है उतना ही दुखद है विरह-व्याकुल प्राणियों के लिए। चैत के मास को मधुमास भी कहा जाता है। वसंत के जाने के बाद चैत माह में गाया जाने वाला चैती गीत को ‘चैतार’ या ‘चैतावर’ कहा जाता है। ‘हो रामा’, ‘आहो रामा’ की टेक चैतावर गीत की पहचान है। “रामा चइत के निंदिया बड़ी बइरिनिया हो रामा सुतलो बलमुआ नहीं जागे हो रामा या सुतल संइया के जागवै हो रामा तोरी मीठी बोलिया, रोज-रोज बोले कोइली सांझ सबेरबा, आज काहे बोले अधिरतिया हो रामा तोरी मीठी बोलिया, अब ले त रहू कोइली बन के कोइलिया,अब तुहूं भइलू सवतिनिया हो रामा ,तोरी मीठी बोलिया।” यहां पति-पत्नी के एकांत में खलल डालने वाली कोयल से शिकायत है कि वह अपनी मीठी बोली से सोए पिया को जगाए दे रही है। पहले तो सांझ-सवेरे ही बोलती थी, अब आधी रात को भी एकांत में खलल डाल रही है। लोकगीत की उत्सवधर्मिता और उल्लास की बात ही अलग है। चिर नवीन और चिर यौवन सौन्दर्य ही लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता है। बारहमासा आषाढ़ महीने से आरम्भ होकर ज्येष्ठाषाढ़ पर समाप्त होता है। संयोग में जो मास सुहावन लगते वहीं विरहिणी की विरह व्यथा का मार्मिक चित्रण बारहमासा गीतों में मिल जाएंगे, कारण है रोज़ी-रोटी के जुगाड़ में प्रिय से अलग रहने की विवशता ग्रामीण स्त्री जीवन की कड़वी सच्चाई है। “आज भी रेलिया बैरन पिया को लेकर परदेश चली जाती है।”

ऐसे में बारहमास का एकाकी जीवन बड़ा ही कष्टप्रद होता है, “सवनवा मोरा लेखे बैरी भइल, भादौं भवन सोहावन न लोगे आसिन मोहि ना सुहाई, कातिक कंत बिदेस गइल हो, समुझि समुझि पछिताई, अगहन आइल ना, कहि गइल उधौ, पूस बितल भरि मास, माघ मास जोवन के मातल, कइसे धरब जिऊ आस, फागुन फरकेला नैन हमार, चैत मास सुनि पाई, पियना ने अइहन एहि बैसाखे, फुलवन सेजिया सजाई,जेठ मास में आकुल जैसे राधे, नाहिं बाड़े साम हमार, सवनवा मोरा लेखे बैरी भइल असाढ़।” लोक गीतों में स्त्री मन की कसक को बड़े ही शालीन रूप में अभिव्यक्त करने और संकेतों मे सब कुछ कह देने की चतुराई होती है। अभिजात्य वर्ग की तुलना में ग्रामीण प्रकृति प्रेमी होता है। गीत ,नृत्य और हर्षोल्लास से भरा पूरा लोक बदलते ऋतुओं के सौन्दर्य अनुभवों को लोकगीतों  कजरी, झूमर आदि के द्वारा अपने उल्लास की अभिव्यक्ति करता है। मन और प्रकृति की तारतम्यता उसके गीतों को जीवंत बनाती है। मन की अतृप्त भावनाएं तृप्ति की चाह में मचलने लगता है।

“अरे बैरन हो गई जुनईया में कैसे कहूं, जिनकी बैरन सास ननदिया, रात की बैरन जुनईया मैं कैसे कहूं, कैसे कैसे जुनईया डूबी, साजन बड़े सोवइया मै कैसे कहूं, कैसे तैसे मैने साजन जगायो, ललना बड़े है रोवैया मै कैसे कहूं, जैसे तैसे मैने ललना सोवाओ, बोलन‌ लगी चिरैया मै कैसे कहूं। चुनईया (चांदनी रात) बैरन हो गई है। सांस ननद तो बैरन थे ही उस पर ये चांदनी रात भी बैरन हो गई। चांद डूबा तो संइया सो गए, संइया को जगया तो ललना रोने लगा। उसे जैसे तैसे सुलाया तो चिरैया बोलने लगी” यानि सुबह हो गई। पूरे गीत में संयुक्त परिवार में स्त्री के अपने पति से संसर्ग करने के समुचित प्रयास कैसे निष्फल हो जाते हैं उसका बड़ा सुंदर चित्रण लोकगीतों की खूबसूरती है। आज भले स्त्रियां आधुनिक रूप से सशक्त हो लेकिन आज भी बड़ी संख्या में औरतें सेक्सुअलिटी से जुड़े मुद्दों पर वे खुलकर बात नहीं कर सकती हैं। सभ्य और शालीनता के मुखौटे के पीछे जीने की विवशता इन ग्रामीण स्त्रियों की नहीं है क्योंकि अपनी कुंठाओं और अतृप्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति का ज़रिया है ये लोकगीत। दैहिक इच्छाओं के संदर्भ में  स्त्रियां जो बातें कहने से झिझकती हैं उन सभी बातों और संवेदनाओं को वो लोकगीतों के माध्यम से खुलकर अभिव्यक्त करती हैं। बारहमासा के संयोग और वियोग के गीतों से लेकर फाग, चैती, डहकन आदि लोकगीत इसके सुंदर उदाहरण हैं।

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तस्वीर साभार : Patnabeats

डॉ विभा ठाकुर, 15 वर्षों के शैक्षणिक अनुभव के साथ वर्तमान में कांलिंदी महाविद्यालय ,पटेल नगर, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए , एमफिल , पीएचडी, और कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कॉम में एमए किया है।

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