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आदिवासी नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में जो छवि उभरती है वह कुछ इस प्रकार की होती है; काले,अधनंगे, चपटी नाकवाले, शरीर पर गोदना के निशान लिए हुए कुछ अलग तरह की बोली या भाषा बोलने वाले। हां मैं आदिवासी हूं लेकिन इसमें से कोई भी मेरी पहचान नहीं है। जब किसी को पता चलता हैं कि मैं एक आदिवासी समुदाय से आती हूं। बस्तर से आती हूं तो वह मुझसे बार-बार एक ही सवाल करते हैं क्या तुम सच में आदिवासी हो? इसीलिए क्योंकि मेरे नैन-नक्श, त्वचा का रंग आदिवासियों के लिए बनाए गए पूर्वाग्रह में फिट नहीं बैठते। उन्हें मेरे हाथों में, चेहरे पर किसी भी तरह के गोदने का निशान नहीं दिखता।

मेरी प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा एक जनजाति आश्रम में हुई हैं। एक बार दीवाली की छुट्टी में जब हॉस्टल जाना हुआ तब हॉस्टल में बाकी बच्चों के नहीं आने के कारण हमें अपने हॉस्टल के चौकीदार के यहां रुकना पड़ा। उनकी पत्नी को जब पता चला कि मैं एक आदिवासी लड़की हूं उन्होंने ना सिर्फ अपने पति से लड़ाई की बल्कि मुझे भद्दी गालियां दीं। अलग थाली में खाना देकर मुझसे धुलवाया, मुझे ज़मीन पर सुलाया गया। यह मेरा पहला अनुभव था जहां आदिवासी होने पर मुझे हीन महसूस करवाया गया था। जब हम मां के साथ शहर आए तो हमें अच्छी शिक्षा के लिए संघ के स्कूल में भेजा गया। यहां पर हमने सबसे अधिक मानसिक तनाव झेला। हमारी टीचर से लेकर क्लासमेट तक हमसे दूरी बनाकर रखते। कुछ समझने में दिक्कत होती तो हमें कहा जाता, “आदिवासी कबसे सीखने समझने लगें।” कभी-कभी हमारे क्लासमेट्स हमसे नक्सलियों के बारे में पूछते,”क्या तुम उन्हीं के बीच से आए हो और क्या वे तुम्हारी तरह दिखते हैं?”

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ऐसा नहीं हैं हमें कुछ भी समझ नही आता था लेकिन आदिवासी इलाकों में पढ़ाई का स्तर क्या हैं ये सभी को पता हैं। वहां शिक्षक पढ़ाने के लिए नही आते। सभी सब्जेक्टस का भार किसी एक टीचर पर ही रहता है और हम उसी बीच से निकलकर आए थे। लंच के लिए जब टिफिन लेकर जाते तब साथ पढ़ने वाले बच्चे टिफिन देखकर मजाक उड़ाते हुए कहते, घास-फूस की जगह रोटी लेकर आ गए! रोटी खा पाओगे? फिर भाई ने टिफिन ले जाना बंद कर दिया और कुछ समय बाद मैंने भी दूरी के कारण जब स्कूल बस में जाना शुरू किया तो वाहन प्रमुख आचार्य मुझे बार बार यहीं कहते तुम आदिवासी हो, क्या-क्या खाते हो अजीब जानवरों का नाम लेते और कहते इसका स्वाद कैसा होता होगा, उसे कच्चा खाया जाता है या पकाकर। मैंने तब उन्हे जवाब दिया और उन्होंने आगे से मुझे कभी स्कूल बस की सीट में बैठने नहीं दिया। मैं स्कूल जाने से बचने लगी,फिर जब जाना शुरू किया तब भाई के साथ साईकल से जाया करते।

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जब हम मां के साथ शहर आए तो हमें अच्छी शिक्षा के लिए संघ के स्कूल में भेजा गया। यहां पर हमने सबसे अधिक मानसिक तनाव झेला। हमारी टीचर से लेकर क्लासमेट तक हमसे दूरी बनाकर रखते। कुछ समझने में दिक्कत होती तो हमें कहा जाता, “आदिवासी कबसे सीखने समझने लगें।” कभी-कभी हमारे क्लासमेट्स हमसे नक्सलियों के बारे में पूछते,”क्या तुम उन्हीं के बीच से आए हो और क्या वे तुम्हारी तरह दिखते हैं?”

जब मैं बारहवीं में गई तो मेरे केमिस्ट्री के टीचर साइंस सब्जेक्ट लेने की वजह से मुझे बिलकुल भी पसंद नही करते थे, वह ब्राह्मण थे उनमें जाति का दंभ कूट-कूट कर भरा पड़ा था। किसी ना किसी बहाने मुझे क्लास से बाहर खड़ा करते। प्रेयर हॉल में जब उन्होंने मुझे जातिगत गालियां दी गईं तब उनका सम्मान करते हुए किसी ने कुछ नहीं कहा और जब मैंने जवाब दिया तब बोर्ड की परीक्षा में फ़ेल कराने की धमकी दी गई। वह यह तो नही कर पाए लेकिन मेरे प्रैक्टिकल के नंबर ज़रूर कम कर दिए। मेरे साथ पढ़नेवाले बच्चे से ज्यादा मेरे टीचर्स को यह बात बुरी लगती थी कि उनकी क्लास में कोई दूर गांव का आदिवासी बच्चा पढ़ रहा है।

ऐसे ही हिंदी की टीचर मेरा शब्दों के उच्चारण में (ब भ ग घ) गलती होने पर वह मुझे मेरे रंग को लेकर “गोरे चमड़ी की चरित्रहीन” कहती। वह बार-बार चेक करती कि इसका गोरा रंग असली है या नक़ली। उन्हें यह भ्रम होता कि मैंने अपने बैग में कोई क्रीम छिपा रखी है। मुझे उनकी क्लास में हमेशा मुंह धोकर बैठना पड़ता। वह किसी भी चीज से उठाकर मारती। मैं कमजोर और टॉपर नहीं, एवरेज बच्चों में थी लेकिन बाक़ी बच्चों के बीच सिर्फ़ मुझे टारगेट किया जाता था। मुझे जंगली ,चींटी खाने वाले कहा जाता। इस स्कूल ने मेरा मनोबल कम किया मेरे आत्मविश्वास को कमज़ोर कर हतोत्साहित किया गया। यहां पर मुझे अच्छे टीचर्स, दोस्त यादें कुछ भी नहीं मिला। मां- पापा की पढ़ाई भले ही कम हुई हो लेकिन वे इस बात को बखूबी समझते थे कि पढ़ाई के लिए हिंदी कितनी ज़रूरी हैं। उन्होंने कभी भी हमसे अपनी मातृभाषा (गोंडी/बस्तरिया) में बात नहीं की ना ही हमको कभी सिखाया। उनका कहना था बच्चे यदि अपनी मातृभाषा में बात करेंगे तो पढ़ाई में पिछड़ जाएंगे ठीक से नहीं पढ़ पाएंगे। पापा ने बचपन से ही हमारे लिए हिंदी बोलना अनिवार्य कर दिया था हम कभी भी पापा के सामने बस्तरिया बोली नहीं बोलते थे फिर भी हमारा मज़ाक हिंदी को लेकर ही उड़ाया गया।

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मैं ठीक से हिंदी बोल लेती हूं, पढ़ लेती हूं लेकिन अक्सर किसी से बातचीत के दौरान आखिर में मुझसे यही पूछा जाता है, “क्या तुम छत्तीसगढ़ के बाहर से हो?” हिंदी में अपने लहजा सुधारने की बहुत कोशिश की, हिंदी न्यूज़ सुनती उसे सुनकर बोलती रहती, खुद की रिकार्डिंग सुनती, हिंदी के अखबार पढ़ती और फिर एक समय के बाद मैंने इस पर सुधार करना छोड़ दिया क्योंकि लोग मुझे मेरे चेहरे के रंग से नहीं पहचानते कि मैं आदिवासी हूं मेरी अलग भाषा ही छत्तीसगढ़ में मेरा बस्तरिया आदिवासी होने की पहचान है। ऐसे भेदभाव का सामना हमें अपने ही राज्य में करना पड़ता है। मैं आज तक छत्तीसगढ़ से बाहर कहीं नहीं गई यह इसी राज्य की बात है। लोग बस्तर के जंगल से प्यार करते हैं लेकिन उस जंगल से आने वाले आदिवासियो से नहीं।

भाई-बहनों के साथ हम अपने परिवार की पहली पीढ़ी हैं जो अब ग्रेजुएशन की पढ़ाई तक पहुंच पाए हैं। हमें पता है हमारे पापा, मां, चाचा, बड़ी मां सब ने अपनी शुरुआती पढ़ाई के दौरान ऐसी बातों का सामना किया। उनका मनोबल तोड़ा गया फिर भी हमें पढ़ना है हम बिना पढ़े इस व्यवस्था से जातिगत भेदभाव से नहीं लड़ सकते।

बस्तर के जंगल, आदिवासी खानपान, वहां का रहन सहन, लोक-नृत्य, जंगल से मिले खाद्य पदार्थ, सबकुछ बाहर के लोगों को पसंद आता है। बस पसंद नहीं आता तो यह कि कोई आदिवासी मुख्यधारा में आने की कोशिश करे, पढ़ने-लिखने की कोशिश करे। अगर ऐसा होता है तो उसे हर बार नीचा दिखाया जाता है, उस पर मज़ाक बनाए जाते हैं। आप जब आदिवासियों के स्कूल ड्रॉपआउट की खबरें पढ़ते हैं तो अखबारों में साफ तौर पर लिखा होता है कि आदिवासी खुद ही पढ़ना-लिखना नहीं चाहते, अपने वातावरण से बाहर निकलना नहीं चाहते लेकिन सच यह नहीं है। पढ़ाई-लिखाई में गरीबी और इसके प्रति जागरूकता का अभाव तो आड़े आता ही है लेकिन उससे भी ज्यादा ऐसी मानसिक प्रताड़ना दी जाती है कि बच्चे खुद ही स्कूल छोड़कर भाग जाएं। उन्हें प्यार से सिखाने के बजाय मारपीट की जाती है, गंदी गालियां दी जाती हैं और वे चाहते हैं यदि हम उसका मजाक उड़ांए उसे बुरा भला कहें तो चुपचाप सुन लें। इसी जगह जब जवाब दे दिया जाता है तो उनमें सुनने की क्षमता नही होती।

भाई-बहनों के साथ हम अपने परिवार की पहली पीढ़ी हैं जो अब ग्रेजुएशन की पढ़ाई तक पहुंच पाए हैं। हमें पता है हमारे पापा, मां, चाचा, बड़ी मां सब ने अपनी शुरुआती पढ़ाई के दौरान ऐसी बातों का सामना किया। उनका मनोबल तोड़ा गया फिर भी हमें पढ़ना है हम बिना पढ़े इस व्यवस्था से जातिगत भेदभाव से नहीं लड़ सकते। हक़ की लड़ाई के साथ ही हमें पढ़ना चुनना है। हमें, मानसिक रूप से तैयार रहना होगा जब जहां भी जाए ऐसी बातों का सामना हमेशा हमसे होगा लेकिन गलत बातों का विरोध कर लोगों को जवाब देना शुरू करना पड़ेगा। आदिवासी कोई अलग ग्रह से आया प्राणी नहीं है। वह आप की तरह है जीता-जागता इंसान है। बेशक उनका रहन-सहन तथाकथित सभ्य समाज से अलग है। उसके अपने रीति रिवाज, परंपरा, त्यौहार है, बोली-भाषा है लेकिन काला या गोरा रंग किसी विशेष वर्ग की पहचान नहीं है इसीलिए जब आप कभी किसी आदिवासी से मिले तो इस नज़रिए से ना मिलें।

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तस्वीर साभार : गूगल

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2 COMMENTS

  1. वो हमें नक्सली कह दें हमें बुरा भी नहीं लगना चाहिए… पर आप उन्हें शरणार्थी/प्रवासी/बाहरी कह दें.. बुरा मान जाते हैं कथित सभ्य लोग…

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