गरीब महिलाओं के संघर्ष को रोमांटिसाइज़ करता अमीरों का सोशल मीडिया
FII Hindi is now on Telegram

याद कीजिए अमूल इंडिया की प्रसिद्ध ‘दूध की नदिया बहती जाए’ विज्ञापन जिसमें महिलाएं सिर पर मटके लिए मीलों चलती नज़र आती हैं। या फिर हाल के समय में इंस्टाग्राम पर छाया हुआ वह वीडियो जिसमें एक सुन्दर नीली आंखों वाली बच्ची कभी रोटियां बना रही है तो कभी प्याज़ काट रही है। या फिर उस महिला को देखिए; जो मिटटी के टूटे घड़े पर रोटियां सेंक रही है। इन सारे उदाहरणों में गरीब और हाशियेबद्ध सामाजिक वर्ग की महिलाओं को बतौर ‘नायिका’ दिखाया गया है।

लेकिन, अक्सर निम्न सामाजिक और आर्थिक तबके से होने के कारण, इनके दैनिक जीवन की परेशानियां जैसे चूल्हे पर खाना पकाना या सिर पर पानी का मटका लिए मीलों चलने को रोमांटिसाइज़ किया जाता है। कभी संस्कृति या कभी सभ्यता के नाम पर, उनके अवैतनिक कामों को चकाचौंध के साथ दिखाया जाता है। गरीबी के साथ महिलाओं और अवैतनिक कामों का गहरा संबंध है। अमूमन महिलाओं के अवैतनिक कामों को हमारा पितृसत्तात्मक समाज ममता, त्याग, समर्पण, प्यार, फ़र्ज़ और परिवारवाद से जोड़ता है। यही नहीं, गरीब और बेसहारा महिलाएं हमेशा से हमारे बॉलीवुड और टेलीविज़न की दुनिया या इंस्टाग्राम पर भी कहानियों के पसंदीदा किरदार बन चुकी हैं।

और पढ़ें: फेमिनाइज़ेशन ऑफ़ पोवर्टी: महिलाओं में बढ़ती गरीबी, उनकी समस्याएं और अधिकारों की बात

याद कीजिए अमूल इंडिया की प्रसिद्ध ‘दूध की नदिया बहती जाए’ विज्ञापन जिसमें महिलाएं सिर पर मटके लिए मीलों चलती नज़र आती हैं। या फिर हाल के समय में इंस्टाग्राम पर छाया हुआ वह वीडियो जिसमें एक सुन्दर नीली आंखों वाली बच्ची कभी रोटियां बना रही है तो कभी प्याज़ काट रही है। या फिर उस महिला को देखिए; जो मिटटी के टूटे घड़े पर रोटियां सेंक रही है। इन सारे उदाहरणों में गरीब और हाशियेबद्ध सामाजिक वर्ग की महिलाओं को बतौर ‘नायिका’ दिखाया गया है।

कैसे गरीबी का किया जाता है महिमामंडन

पिछले दिनों महिंद्रा एंड महिंद्रा के अध्यक्ष आनंद गोपाल महिंद्रा का एक ट्ववीट चर्चा का विषय रहा जिसमें क्षमता से अधिक सामान लिए बाइक पर जा रहे एक जोड़े की तस्वीर दिखी। इसमें महिला को पीछे जगह न मिलने के कारण सामने तेल की टंकी पर बैठे देखा गया। महिंद्रा ने इस विषय पर कहा कि समझा जा सकता है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन क्यों बनाता है। उन्होंने एक छोटे से दोपहिया वाहन पर इतना अधिक सामान ले जा पाने की तारीफ की। हालांकि हज़ारों लोगों ने इसे देश का अनोखा जुगाड़ बताया। लेकिन कई लोगों ने ट्ववीट को आपत्तिजनक और गरीबी को बढ़ावा देने वाला बताया। गौरतलब हो कि आनंद महिंद्रा ने अपने ट्वीट में आर्थिक तंगी में दोपहिये पर इस तरह सामान लिए जाने और सामने बैठी महिला की सुरक्षा और सुविधा पर कुछ नहीं लिखा।

Become an FII Member

इसी तरह, हाल ही में मास्टरशेफ इंडिया में जज रह चुके शेफ कुणाल कपूर ने एक ऐसी औरत का वीडियो अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जो चूल्हे पर टूटे हुए मटके के इस्तेमाल से रोटियां सेंक रही थी। इस वीडियो पर भी अधिकतर लोगों ने इसे नया तकनीक और जुगाड़ बताते हुए तारीफ की। वीडियो से यह स्पष्ट हो रहा है कि वह हाशिये पर जी रही कोई महिला है; जिसके पास नये बर्तन खरीदने का साधन नहीं है।

आज भी कई इलाकों में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में चूल्हों पर खाना पकाना आर्थिक तंगी और संसाधनों तक पहुंच न होने के कारण किया जाता है। सोशल मीडिया पर ध्यान दें, तो, ऐसे हजारों ट्वीट्स या इंस्टाग्राम के रील्स मिल जाते हैं, जहां परंपरा और नवीनता के नाम पर चरम गरीबी और अवैतनिक कामों को रोमांटिसाइज़ किया जाता है। ट्विटर और इंस्टाग्राम को इस्तेमाल करनेवालों का डेमोग्राफिक्स देखें, तो आपको समझ आ जाएगा कि यहां गरीब तबके और दलित-बहुजन समुदाय के लोगों के लिए कोई जगह नहीं। शायद इसलिए, यहाँ उन मुद्दों पर चर्चा बहुत कम होती है जिससे विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को असहजता हो।

और पढ़ें: गरीब महिलाओं के लिए आज भी कोसों दूर है विकास की व्यवस्थाए

क्या है देश में असमानता की हालत

भारत सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और लैंगिक रूप से असमान देश है। ऑक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट अनुसार कोरोना महामारी के दौरान जब देश में 84 प्रतिशत परिवारों को अपनी आय में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा, तब भारत में अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई। यह रिपोर्ट बताती है कि देश में सबसे अमीर महज 98 भारतीयों के पास उतनी ही संपत्ति है, जितनी सबसे हाशियेबद्ध सामाजिक और आर्थिक श्रेणी के 55.2 करोड़ लोगों के पास है।

ऑक्सफैम बताता है कि भारत के सबसे अमीर सौ लोगों की सामूहिक संपत्ति साल 2021 में 57.3 लाख करोड़ रूपए के स्तर पर पहुंच गई थी जो एक रिकॉर्ड था। इससे पहले ऑक्सफैम ने साल 2018 से 2022 के बीच, भारत में हर दिन 70 नए करोड़पति पैदा होने का अनुमान किया था। आंकड़ों पर जाएं, तो भारतीय आबादी के सबसे संपन्न 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 77 फीसद हिस्सा है।

साल 2017 में जनरेटेड वेल्थ यानि सृजित संपत्ति का 73 फीसद सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास गया था। वहीं, 67 मिलियन भारतीय जिनमें आधे से ज्यादा गरीब आबादी शामिल थी, उनकी संपत्ति में महज एक प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। जिस देश में हर क्षेत्र में जातिवादी व्यवस्था का बोलबाला हो और हर स्तर पर असमानता हो, वहां हाशिये पर रह रहे वर्ग की रोज़मर्रा की समस्याओं को समस्या समझा जाना ही एक चुनौती है। केंद्र सरकार के आंकड़ों की बात करें, तो साल 2011 के ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के अनुसार 179.7 मिलियन ग्रामीण परिवारों में से 107.4 मिलियन परिवार वंचित पाए गए।

और पढ़ें: कोविड-19 के कारण 4.7 करोड़ महिलाएं अत्यधिक गरीबी की ओर: रिपोर्ट

गरीबी, अवैतनिक काम और महिलाएं

आर्थिक रूप से वंचित परिवारों में महिलाओं का पढ़ा-लिखा न होना ही आम है। ऐसे में महिलाएं उन कामों को चुनती हैं; जहां शिक्षा की नहीं बल्कि शारीरिक मेहनत की ज़रूरत होती है। इसलिए हाशिये पर रह रहे परिवारों की महिलाओं के पास अपने पसंद का काम चुनने का विशेषाधिकार नहीं होता। घरेलू मदद, दिहाड़ी मजदूर, किसान या ऐसे कई असंगठित क्षेत्रों में कम वेतन होता है और कई बार समय की भी निश्चित सीमा नहीं होती।

हमारा सिनेमा जगत, सोशल मीडिया गरीबी से पीड़ित महिला को दिखाने में कामयाब रहा, लेकिन अमूमन उसे आर्थिक, मानसिक, सामाजिक या शैक्षिक स्तर पर उनके संघर्ष को नहीं दिखाया जाता। न ही संसाधनों तक पहुंच, सरकारी नीतियों की परख, स्वास्थ्य, शिक्षा या रोजगार के अधिकार जैसे मुद्दों पर कोई बात होती है।

इसके अलावा, अमूमन बुनियादी संसाधन जैसे पानी, बिजली या गैस की सुविधा न होने से घरेलू काम ज्यादा मुश्किल और समय वाला हो जाता है। पिछले दिनों भारतीय आरपीजी समूह के अध्यक्ष हर्ष गोयनका ने एक ट्ववीट किया जिसमें एक महिला किसी के बरात में सिर पर लाइट पकड़े; झोली में बच्चे को लिए अपना काम कर रही है। इस ट्ववीट पर आई कई टिप्पणियों के बाद, अपना पक्ष साफ़ करते हुए बिजनेसमैन गोयनका ने मां और बच्चे के रिश्ते का तर्ज दिया और एक मां के प्यार और साहस की बात कही। लेकिन यहां यह सवाल ज़रूरी है कि क्यों महिलाओं से ही उम्मीद की जाती है कि वे स्वेच्छा से खुशियों का त्याग करते हुए परेशानियों को झेलेंगी, साहसी और ममतामयी बनी रहेगी।

और पढ़ें: जलवायु परिवर्तन की मार और बढ़ते तापमान से शहरी घरेलू कामगार महिलाओं में बढ़ रही है गरीबी : रिपोर्ट

गरीबी को किस तरह देखती है बॉलीवुड और टेलीविज़न की दुनिया

सिनेमा और टेलीविज़न सामाजिक बदलाव लाने का एक सशक्त माध्यम है; जिसकी पहुंच दूसरे किसी भी माध्यम से कहीं ज्यादा है। लेकिन इसके बावजूद, गरीब और गरीबी को बॉलीवुड और टेलीविज़न की दुनिया ने कभी मुद्दा बनने नहीं दिया। बॉलीवुड में महिला केंद्रित फिल्में हमेशा ही बनती आयी है। लेकिन जब बात गरीबी और महिला की होती है, तो उन्हें एक विशेष रूप में ही दिखाया जाता रहा है। गरीब परिवार की महिला को अमूमन अनपढ़, न्याय प्रिय, पारिवारिक, आदर्श व्यवहार करनेवाली, भारतीय कपड़े पहनने वाली, त्याग और बलिदान की मूरत, ममतामयी और मेहनती दिखाया जाता है, जो अकेले ही सारे कामों का बोझ उठाती रहती है। सिनेमा में इस तरह के स्टीरियोटाइप्स साल दर साल दिखाने से गरीबी एक मुद्दा बनने के बजाय कपड़ों और व्यवहार तक सीमित होने लगती है।

मनोरंजन की दुनिया गरीबी से महिला को उबारने की कोशिश करने की जगह, उसकी नैतिकता पर ज़ोर देती रही है। हालांकि, हमारा सिनेमा जगत, सोशल मीडिया गरीबी से पीड़ित महिला को दिखाने में कामयाब रहा, लेकिन अमूमन उसे आर्थिक, मानसिक, सामाजिक या शैक्षिक स्तर पर उनके संघर्ष को नहीं दिखाया जाता। न ही संसाधनों तक पहुंच, सरकारी नीतियों की परख, स्वास्थ्य, शिक्षा या रोजगार के अधिकार जैसे मुद्दों पर कोई बात होती है। सालों से मनोरंजन की दुनिया गरीबी को दिखाने के लिए, महिलाओं को एक विशेष रूप में दिखाकर, असल मुद्दे से भटकती नज़र आई है।

हाशिये पर रह रहे परिवारों की समस्याओं को समझने के लिए, उनके स्तर पर जाकर ज़मीनी तौर पर काम और शोध की आवश्यकता है। गरीबी आर्थिक के अलावा सामाजिक समस्या भी है और यह किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं है। साथ ही, गरीबी को एक ‘समस्या’ के तौर पर दिखाने के लिए, महिलाओं को पितृसत्तात्मक समाज के तय किए गए मानदंडों पर खरे उतरने की भी ज़रूरत नहीं। आज के दुनिया में हर तरह के बातों के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण मंच है। जब सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीर साझा की जाती है, तो लोग असल समस्या से भटकते नज़र आते हैं। गरीबी एक व्यापक समस्या है और इसे मिटाने के अब भी सालों लग सकते हैं। पर निश्चित ही इसकी पहल गरीबी को सही दृष्टिकोण से समझने से की जा सकती है।

और पढ़ें: मज़दूरों को कोरोना वायरस से ज़्यादा ग़रीबी और सरकारी उत्पीड़न से खतरा है


कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply