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आज देश एक महामारी की गिरफ्त में है। देश के प्रमुख जनप्रतिनिधि से लेकर हर क्षेत्र के वे बड़े नाम जिनको इस देश की आम जनता अपना आदर्श मानती है, उनके एक आह्वान से लोग न केवल उनकी बात सुनते हैं बल्कि अपनी एकजुटता तक प्रदर्शित करते हैं। इस समय में यह नायक-शासक वर्ग गायब है। राजनीति, खेल, सिनेमा के तमाम बड़े नाम धरातल से लेकर सोशल मीडिया की उन दीवारों पर जहां करोड़ों लोग इनके फॉलोवर हैं, वहां से भी सब नदारद रहे। देश के करोड़ो लोग जो इस वक्त बीमारी और अव्यवस्थथा से पीड़ित है उनके लिए कोई संवेदना तक जाहिर नहीं की है। यही नहीं इस अव्यवस्थता के समय में भी कुछ खिलाड़ी और अभिनेता राजनैतिक क्रूरता के खेल में सकारात्मकता की बातें करने के लिए लगातार सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं। इन तथाकथित नायक वर्ग में से केवल कुछ चुनिंदा गिनती के नाम हैं जिन्होंने सवाल किया है या फिर आम नागरिकों की पीड़ा को समझ कुछ योगदान दिया।

अमीर-गरीब, बड़े-छोटे के भेद से निहित हमारे समाज में कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचा दी है। सामाजिक विषमता को इस समय ने और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है। बड़ी संख्या में लोगों को उनके हाल पर सिर्फ और सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया गया। इस दौरान दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संविधान का लिखा सब भूला दिया गया। जनता का जीने का अधिकार एक अदद डॉक्टर की तलाश में भटकता रहा। शासन और अभिजात वर्ग जो मेहनतकशों की मेहनत से बना है वे अपने शीशों के आवास में क्वारंटीन का लुफ्त लेते हुए कभी-कभार तस्वीरें पोस्ट कर रहा है। वहीं, कुछ लोग तो देश छोड़ किसी आइलैंड पर है और संकट की स्थिति गुजरने का इंतजार कर रहे हैं। देश की आम जनता जो खिलाड़ियों, फिल्मी सितारों और अन्य सेलिब्रिटी के लिए एक अलग ही दीवानगी रखती है। मात्र एक झलक के लिए इनके प्रशंसक घंटों तक सड़क पर इनकी राह ताकते रहते हैं। वहीं, जब-जब इनको चाहने वाली जनता पर कुछ भी समस्या आन पड़ती है तो ये सितारें गायब हो जाते हैं। जिनको बड़ा इनकी कला के साथ-साथ जनता के प्यार ने बनाया है ये उनसे मुंह फेर लेते है। चाहे वो फिल्मी सितारे हो या खिलाड़ी और तो और इस महामारी में तो देश के गृहमंत्री अमित शाह तक की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी गई। 

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पिछले कुछ समय से यह भी साफ देखने को मिल रहा है कि यह नायक वर्ग समाज से मुंह चुराकर अपनी मुनाफे की दुनिया में ही गुम है। किसान आंदोलन के वक्त भी यह देखने को मिला। देश का अन्नदाता भले ही दिल्ली की सरहदों पर बैठा रहे उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। खूब आलोचना के बावजूद भी सितारों ने जब मुंह खोला तो रिहाना को निशाना बनाते हुए, सरकार के समर्थन में सभी ने एक जैसे संदेश ट्वीट कर दिए।

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पहली तालांबदी के दौरान भी इसी तरह की स्तिथि देखने को मिली थी। लोगों को मीलों पैदल भूखा चलने के लिए छोड़ दिया गया था। ठीक इसी तरह दुनिया में सबसे ज्यादा क्रिकेट देखने वाली जनता जब सांसों के लिए तरस रही थी उस समय इस देश के करोड़पति क्रिकेटर आईपीएल खेल रहे थे। देश की जनता बुरी तरह कोरोना की दूसरी लहर में इलाज के लिए भटक रही थी और खिलाड़ी मैच खेल रहे थे। पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों ने देश के कोविड हालात पर ज्यादा चिंता व्यक्त की। ऑस्ट्रेलिया के एंड्रयू टाय ने टूर्नामेंट की आलोचना कर फ्रेंचाइजी और सरकार को कड़े शब्दों में बातें कही। आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स की ओर से खेलने वाले ऑस्ट्रेलिया के उपकप्तान पेट कमिंस ने कोविड संकट के लिए 50000 डॉलर की राशि का दान दिया। पूर्व ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ब्रेट ली ने भी राहत कोष में राशि दान की। 

इंस्टाग्राम पर 122 मिलयन फॉलवर्स रखने वाले भारतीय कप्तान विराट कोहली ने अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के साथ 7 मई को पहली बार एक इनिशिएटिव से जुड़कर फंड इकट्टा करने के लिए एक वीडियो मैसेज अपलोड किया। ऐसे ही कई और लोग जिनके पास अथाह पूंजी है, उन्होंने सीधे मदद करने की जगह क्राउड फंडिंग का रास्ता अपनाया। वही, सिनेमा के बड़े दिग्गज नाम भी इस समय में खामोश रहे। चारों तरफ से आलोचना और नाम लेकर इन नायकों का पता पूछने के बाद कुछ ने राहत कोष में दान या मदद का आश्वासन दिया लेकिन यह काम बहुत देर बाद शुरू हुआ। राजनीति, सिनेमा या फिर खिलाड़ी इनके इस तरह के रवैये ने यह साबित कर दिया है कि इनके लिए इनके प्रशंसक केवल एक उपभोग हैं जिनका इस्तेमाल ये अपने मुनाफ़े के लिए करते हैं।

इस समय में देश के लोगों की बड़ी संख्या परेशानियों से गुजर रही हैं। अस्पताल, बेड, ऑक्सीजन और दवाई के लिए लोग भटक रहे हैं। शासक वर्ग उस सिस्टम पर आरोप लगाकर खुद की लाहपरवाही पर पर्दे डाल रहा है जिसका निर्माणकर्ता वह खुद है। स्वयं सहायता से लोग खुद की मदद कर एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं। अस्पताल में बिस्तर और दवाई के लिए इधर से उधर सूचना प्रसारित कर खुद एक सिस्टम बनाने में लग गए जो काम सरकार को करना था। खुद के संसाधनों का प्रयोग कर अपने गांव और मोहल्लों में मरीजों की देखभाल में लग गए। गांवों में जहां पर चिकित्सा सुविधा के नाम पर केवल जर्जर हालात में स्थित एक इमारत होती है वहां पर लोग आपस में मिलकर जरूरी मेडिकल चीजों को एकत्र करने लगे ताकि संक्रमित लोगों की जान बचाई जा सके। समाज के अभिजात्य वर्ग और सत्ता की यह असंवेदनशीलता बेहद क्रूर है। जो इस देश की भोली जनता को बार-बार लगातार ठग कर अपना उल्लू सीधा कर रही है। 

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तस्वीर साभार: RTE

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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