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जल जीवन है और सभी पर उसका समान अधिकार है। यह कहना जितना आसान है, भारत में इसको वास्तविक स्तर पर लागू करना उतना ही कठिन। साफ पीने का पानी और स्वच्छता तक हर किसी की पहुंच हमारे देश में एक तरह का विशेषाधिकार है। भारत में आज भी आबादी का एक बड़ा तबका साफ पानी, शौचालय या स्वच्छता उत्पादों तक पहुंच के लिए जद्दोजहद करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की जल आपूर्ति और स्वच्छता के लिए जॉइन्ट मॉनिट्रिंग कार्यक्रम (जेएमपी) की साल 2017 की रिपोर्ट इस सामाजिक समस्या और असमानता को और अधिक स्पष्ट करती है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में 50 प्रतिशत से भी कम आबादी के पास सुरक्षित रूप से व्यवस्थित पेयजल तक पहुंच है। इस रिपोर्ट के एक अनुमान के मुताबिक भारत में दूषित पानी से होने वाली बीमारियों पर सालाना लगभग 600 मिलियन डॉलर का आर्थिक बोझ पड़ता है।

अमूमन जब परिवारों के पास सुरक्षित और विश्वसनीय जल स्रोत नहीं होता तो इसकी ज़िम्मेदारी महिलाओं और बच्चों को दे दी जाती है। भारत में बच्चों, किशोरों और महिलाओं की स्थिति पर साल 2016 का यूनिसेफ़ का एक विश्लेषण बताता है कि करीब 54 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां हर दिन पानी के लिए अनुमानित 35 मिनट खर्च करती हैं। यह सालाना 27 दिनों की मज़दूरी के बराबर है। बच्चों को पानी इकट्ठा करने में घंटों खर्च करना पड़ता है जिससे कई बार उनकी स्कूलों में मौजूदगी कम हो जाती है। इस विश्लेषण की मानें तो देश में सूखा प्रभावित राज्यों में बच्चियों के स्कूल छोड़ने की दर में 22 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। सामाजिक और आर्थिक रूप से समर्थ ना होने की वजह से भी देश में वंचित तबकों की एक बड़ी संख्या आज भी पीने के पानी और शौच जैसी मूलभूत जरूरतों से दूर है।

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साफ़ पानी का न होना कैसे महिलाओं को करता है प्रभावित

घरों में पानी लाने, स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रबंधन के लिए महिलाओं और लड़कियों की प्राथमिक जिम्मेदारी तय कर दी जाती है। रोज़ाना इन अवैतनिक कामों में घंटों व्यतीत करने से क्रम में इनकी किसी दूसरे कामों या शिक्षा में भागीदारी या तो रोक दी जाती है। पहले से ही हाशिए पर जी रहे समुदाय की यह समस्या आत्मसम्मान, अपमान और असुरक्षा से लड़ने की जटिल व्यक्तिगत लड़ाई में बदल जाती है। पानी और स्वच्छता उत्पादों से जुड़ी महिलाओं की ज़रूरतों को पूरा करना लैंगिक समानता लाने के लिए एक प्रमुख कदम है। कई शोध बताते हैं कि पानी लाने और स्वच्छता उत्पादों या शौच की कमी के कारण महिलाओं को न केवल बलात्कार और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है बल्कि इससे जीवन प्रत्याशा और मातृ मृत्यु दर भी प्रभावित होते हैं।

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आज भारत में पानी या शौच की सुविधा केवल मौलिक अधिकार नहीं बल्कि वर्चस्व और सामाजिक हैसियत का मापदंड बन गई है। इसलिए भारत में जल नीतियों को इन मुद्दों को महत्व देने, पानी और स्वच्छता की समस्या में विशेषाधिकार की समाप्ति और सामूहिक तौर पर काम करने की ज़रूरत है।

मल्टीडिसिप्लिनरी डिजिटल पब्लिशिंग इंस्टिट्यूट में छपे ‘जल प्रबंधन में लैंगिक परिप्रेक्ष्य: पूर्वी भारत के सहभागी जल संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी’ पर लेख के अनुसार भारत की 1987, 2002 और 2012 की राष्ट्रीय जल नीतियां लिंग आधारित समस्याओं को महत्व नहीं देती है। साल 1987 की राष्ट्रीय जल नीति जल वितरण और आवंटन में समानता और सामाजिक न्याय के आवश्यकता का उल्लेख तो करती है लेकिन यह महिलाओं को एक विशेष समूह के रूप में उल्लेख नहीं करती। यह केवल आर्थिक रूप से वंचित वर्ग जैसे छोटे किसान और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को कवर करती है।

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साल 2002 की जल नीति को देखें तो यहां सहभागी जल संस्थानों को डिजाइन करने में महिलाओं के लिए उपयुक्त भूमिकाओं पर जोर देते हुए उनका सिर्फ एक बार उल्लेख किया गया है। इसके बाद साल 2012 की राष्ट्रीय जल नीति अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के साथ-साथ महिलाओं की अनूठी जरूरतों और आकांक्षाओं पर विचार करने की बात करती है। यह लेख बताता है कि हालांकि हाल की दो जल नीतियों के दस्तावेजों में महिलाओं का उल्लेख तो है, लेकिन तीनों जल नीति के डिजाइन लैंगिक परिप्रेक्ष्य से नहीं किए गए हैं। ना ही इनमें नीतियों को लिंग समावेशी बनाने के लिए कोई ठोस दिशा-निर्देश बताए गए हैं। हालांकि, राष्ट्रीय महिला नीति 2016 यह मानती है कि पानी की अनुपलब्धता महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ डालती है। इसलिए, इसमें कार्यक्रमों और परियोजनाओं का डिजाइन महिलाओं को महत्वपूर्ण जल उपयोगकर्ता के रूप में ध्यान में रखते हुए किए जाने की बात कही गई है।

साफ़ पानी तक पहुंच है एक विशेषाधिकार

भारत में स्वच्छ पानी और उस तक पहुंच कितनी असमान है, यह नीति आयोग का साल 2019 का समग्र जल प्रबंधन सूचकांक स्पष्ट करता है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 फीसद आबादी यानी लगभग 800 मिलियन लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। हालांकि इनमें 87 प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी तक पहुंच तो है पर सरकार के लिए आज भी सुरक्षित पानी का प्रावधान एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ आधी ग्रामीण आबादी के पास सुरक्षित रूप से व्यवस्थित पानी तक पहुंच है जो चीन और बांग्लादेश जैसे देश से भी खराब परिणाम है। विकासशील देशों में भारत में पानी से होने वाले बीमारियों के कारण सबसे ज्यादा लोग बीमार होते हैं। देश में अपर्याप्त या दूषित पानी के कारण हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत होती है।

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ग्रामीण क्षेत्र में आज भी लोगों तक जरूरत के अनुसार साफ पानी की आपूर्ति के लिए व्यवस्थित श्रोत उपलब्ध नहीं है। जेएमपी रिपोर्ट के अनुसार 49 प्रतिशत से भी कम ग्रामीण आबादी सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेय जल का उपयोग कर रही है। पानी का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब कोरोना महामारी से बचने के उपायों में बार-बार हाथ धोने की सलाह दी जाती है। भारत में हर तीन में से सिर्फ एक स्कूल में बुनियादी जल और स्वच्छता सेवाएं (WASH) मौजूद है। पानी, स्वच्छता और स्वच्छता उत्पादों तक पहुंच स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बुनियादी जरूरतें हैं। साल 2019 की जेएमपी रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर 462 मिलियन से अधिक बच्चों के स्कूल में कोई स्वच्छता सेवा नहीं थी, जिनमें से तीन चौथाई यानी 92 मिलियन भारत से हैं। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य साल 2030 तक जल और स्वच्छता तक सभी के सर्वव्यापक और समान पहुंच पर ज़ोर देता है। इसके बावजूद देश में साफ पानी या स्वच्छता उत्पादों तक सब की पहुंच नहीं है। बीते दिनों शिक्षा मंत्रालय ने देश भर में 42,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा नहीं होने और 15,000 से अधिक स्कूलों में शौचालय अनुपलब्ध होने की जानकारी दी।

भारत में बच्चों, किशोरों और महिलाओं की स्थिति पर साल 2016 का यूनिसेफ़ का एक विश्लेषण बताता है कि करीब 54 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां हर दिन पानी के लिए अनुमानित 35 मिनट खर्च करती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के प्राथमिक शिक्षा में अहम भूमिका निभा रहे आंगनवाड़ी केंद्रों में भी पानी या शौचालय की कमी के कारण बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा के साथ समझौता किया जाता रहा है। द हिन्दू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जल शक्ति मंत्रालय द्वारा साल 2020 में सम्पूर्ण रूप से पानी और स्वच्छता के लिए 100 दिनों का अभियान शुरू किया गया था। इसके बावजूद देश के केवल आधे सरकारी स्कूलों और आंगनवाड़ियों में नल के पानी की सुविधा है। दशकों से पानी और स्वच्छता पर काम कर रही अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्था वाटरएड बताती है कि जलवायु परिवर्तन के मामले में भारत दुनिया का 51वां सबसे कमज़ोर देश है। देश में 7 फीसदी आबादी अपने घर पर बिना बुनियादी पानी की आपूर्ति के उपाय के जी रही है। गौरतलब है कि भारत वर्तमान में जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में 120वें पायदान पर है। साल 2021-22 के केंद्रीय बजट में शहरी इलाकों को शामिल करते हुए 2.86 करोड़ घरों में नल कनेक्शन के माध्यम से सुरक्षित पानी पहुंचाने के लिए जल जीवन मिशन की घोषणा करना यह साबित करता है कि पानी और स्वच्छता के लिए भले कई योजनाएं बनाई गई हो, आज भी सभी लोगों तक इसकी पहुंच नहीं है।

हमारे देश में लोगों के जीवन में जल का सिर्फ सामाजिक या पर्यावरणीय महत्व ही नहीं बल्कि समय-समय पर यह राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक समस्याओं और मुद्दों से जुड़ जाता है। रोज़ाना पानी की आपूर्ति के साथ-साथ पानी से जुड़े कामों जैसे सिंचाई या फैक्टरियों में भी महिलाओं की अहम भूमिका है। आज भारत में पानी या शौच की सुविधा केवल मौलिक अधिकार नहीं बल्कि वर्चस्व और सामाजिक हैसियत का मापदंड बन गई है। इसलिए भारत में जल नीतियों को इन मुद्दों को महत्व देने, पानी और स्वच्छता की समस्या में विशेषाधिकार की समाप्ति और सामूहिक तौर पर काम करने की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार : The Conversation

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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