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1955 की बात है। उस वक्त अमेरिका के दक्षिण अमेरिकी प्रांत अलाबामा में नस्लभेद अपने चरम पर था। ब्लैक महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को बंदी बनाकर उनका लगातार शोषण किया जाता। उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था, गोरे जिस रास्ते पर चलते, उस पर ब्लैक अपना पैर नहीं रख सकते थे, पानी के नल और बस की सीट तक बंटी हुई थीं। इस नस्लीय हिंसा और भेदभाव वाले समय में ही डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करने वाली एक ब्लैक महिला ने किसी गोरे व्यक्ति के लिए बस की सीट से उठने से इनकार कर दिया था। इस पर बस के ड्राइवर ने पुलिस बुला ली और इस महिला को दोषी करार दिया गया। उस पर 10 डॉलर का जुर्माना लगाया गया और अलग से 4 डॉलर की कोर्ट फीस भी देनी पड़ी। लेकिन इस महिला के विरोध ने यह निश्चित कर दिया था कि ब्लैक्स की स्थिति जो अमेरिका में थी उसके ख़िलाफ़ वह आवाज़ उठाएगी। यह महिला थी रोज़ा लुईज़ मक्कॉली पार्क्स। इस घटना के बाद भी रोजा ने हार नहीं मानी और अमेरिका में समानता की लड़ाई का बिगुल बजाया। नस्लभेद के खिलाफ़ कानून को चुनौती दी जिसने दूसरे लोगों को भी अन्याय और भेदभाव का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। रोज़ा का अकेले का विद्रोह अब सबका बन गया था। यह नागरिक आंदोलन लगभग एक साल चला और अंत में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट को यह आदेश देना पड़ा कि ब्लैक नागरिक बस में कहीं भी बैठ सकते हैं। 

लेकिन रोज़ा का यह सफर इतना आसान नहीं था। बसों के बहिष्कार आंदोलन के चलते रोज़ा को लगातार उत्पीड़न और धमकियों का सामना करना पड़ा। उनकी नौकरी चली गई जिसके बाद पार्क्स ने अपने पति और मां के साथ आखिरकार डेट्रॉइट जाने का फैसला किया जहां पार्क्स का भाई रहता था। पार्क्स को साल 1965 में नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले नेता जॉन कॉनयर्स जूनियर के कार्यालय में एक प्रशासनिक सहयोगी का पद मिला। यहां रोज़ा ने रिटायरमेंट तक काम किया। साल 1977 और 1979 के दौरान रोजा के पति, भाई और मां की मौत हो गई। इसके बाद साल 1987 में उन्होंने डेट्रॉइट के युवाओं के विकास के लिए ‘रोज़ा और रेमंड पार्क्स इंस्टीट्यूट फॉर सेल्फ-डेवलपमेंट’ की स्थापना की। 

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रोजा लुईज़ मक्कॉली पार्क्स का जन्म 4 फरवरी, 1913 को अलाबामा के टस्केगी में हुआ था। रोजा जब 2 साल की थीं तब उनके माता-पिता जेम्स और लियोना मक्कॉली अलबामा के पाइन लेवल में शिफ्ट हो गए। उनके भाई सिल्वेस्टर का जन्म 1915 में हुआ था और उसके कुछ समय बाद ही उनके माता-पिता अलग हो गए। रोजा की मां एक शिक्षिका थीं और उनका परिवार शिक्षा को अधिक महत्व देता था। 11 साल की उम्र में रोजा ने मोंटगोमरी, अलबामा में हाई स्कूल में प्रवेश लिया। साल में पांच महीने ही रोजा स्कूल जाती थीं, बाकी समय खेतों पर काम करना पड़ता था। अपनी दादी के बीमार पड़ने पर रोज़ा को स्कूल छोड़ना पड़ा। दादी की मौत के बाद रोजा की मां बीमार हो गईं, तो फिर से उनको स्कूल छोड़ना पड़ा। रोजा ने हाई स्कूल की पढ़ाई शादी होने के बाद पूरी की। 

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रोज़ा पार्क्स, तस्वीर साभार: Time Magazine

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रोज़ा के पति रेमंड पार्क्स नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता थे जिन्होंने रोज़ा को हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया। साल 1943 में रोजा पार्क्स नेशनल एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल (NAACP) के मोंटगोमरी चैप्टर की सदस्य बनीं। उन्होंने 1956 तक इसके सचिव के रूप में काम किया। रोजा ने इस बारे में एक बार कहा था, “मैं वहां अकेली महिला थी, और उन्हें एक सचिव की ज़रूरत थी और मैं ना कहने की हालत में नहीं थी।” यहां उन्होंने स्थानीय NAACP  नेता एडगर निक्सन के लिए काम किया जिनका मानना था कि महिलाओं को रसोई में ही रहने की जरूरत है। जब पार्क्स ने पूछा, “अच्छा, मेरे बारे में क्या खयाल है?” इस पर निक्सन ने जवाब दिया, “मुझे एक सचिव की आवश्यकता है और आप इसके लिए ठीक हैं।” उस वक्त सचिव का पद महिलाओं के लिए उपयुक्त माना जाता था।

साल 1944 में सचिव के रूप में रोजा ने अलबामा की एक ब्लैक महिला के सामूहिक बलात्कार की जांच की। पार्क्स और अन्य नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने उस महिला को न्याय दिलाने के लिए ‘द कमेटी फॉर इक्वल जस्टिस’ का गठन किया, जिसे शिकागो डिफेंडर ने ‘उस दशक का बराबरी के न्याय के लिए सबसे मजबूत अभियान’ कहा। पार्क्स ने पांच साल तक एक एंटी रेप कार्यकर्ता के रूप में अपना काम जारी रखा। कुछ समय तक पार्क्स ने मैक्सवेल एयर फोर्स बेस में नौकरी भी की।

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कहा जाता है कि 1955 में जब रोज़ा पार्क्स ने अपनी बस की सीट छोड़ने से इनकार कर दिया, तो यह पहली बार नहीं था जब वह बस ड्राइवर जेम्स ब्लेक से भिड़ी थीं। पार्क ने इस घटना से 12 साल पहले भी इसी बस में ब्लैक नागरिकों के खिलाफ हुए अन्याय का विरोध किया था। उन्होंने ब्लैक लोगों के लिए बस से उतरने और फिर से पिछले दरवाजे से प्रवेश करने के नियम का विरोध किया। रोजा ने ऐसा करने से मना किया तो ब्लेक ने क्रोधित होकर रोजा के कोट की आस्तीन खींचकर बस से उतरकर पिछले दरवाजे से चढ़ने के लिए कहा लेकिन पार्क ने ऐसा करने के बजाय बस छोड़ देना उचित समझा।

अपने रिटायरमेंट के बाद के वर्षों में, रोजा ने नागरिक अधिकार संबंधी घटनाओं को अपना समर्थन देने के लिए यात्राएं की और ‘रोजा पार्क्स: माई स्टोरी’ नाम से आत्मकथा भी लिखी। वेबसाइट हिस्ट्री के मुताबिक अपनी आत्मकथा में उन्होंने बस संबंधी घटना के बारे में जिक्र करते हुए लिखा था, “लोग हमेशा कहते हैं कि मैंने अपनी सीट इसलिए नहीं छोड़ी क्योंकि मैं थकी हुई थी, लेकिन यह सच नहीं है। मैं शारीरिक रूप से थकी हुई नहीं थी, मैं बूढ़ी नहीं थी। हालांकि कुछ लोगों को लगता था कि मैं उस समय बुज़ुर्ग थी। मैं बयालीस की थी। मैं थक चुकी थी तो केवल एक चीज से, हार मानने से।”

रोज़ा पार्क्स के नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन का असर सिविल राइट एक्ट के रूप में सामने आया जिसे कांग्रेस ने 1964 में लागू किया था। 1996 में जब बिल क्लिंटन राष्ट्रपति थे, तब रोजा पार्क्स को प्रेसिडेंशियल मेडल आफ फ्रीडम से सम्मानित किया गया था। 1999 में पार्क्स को कांग्रेसनल गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा एक नागरिक को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। 24 अक्टूबर 2005 को 92 वर्ष की आयु में रोजा की मृत्यु हुई। आज भी अमेरिका में हर साल उनकी जन्मतिथि को मनाया जाता है। रोजा पार्क्स की 100वीं जन्मतिथि पर अमेरिकी डाक सेवा द्वारा उनकी याद में उनकी तस्वीर छपी टाक टिकट जारी की गई थी।  

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तस्वीर साभार : Britannica

मेरा नाम पारुल शर्मा है। आईआईएमसी, नई दिल्ली से 'हिंदी पत्रकारिता' में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और गुरु जांबेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। शौक की बात करें तो किताबें पढ़ना, फोटोग्राफी, शतरंज खेलना और कंटेंपरेरी डांस बेहद पसंद है।

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