अच्छी ख़बर पद्मश्री पूर्णमासी जानी : बिना पढ़ाई किए जिन्होंने की हज़ारों कविताओं और गीतों की रचना

पद्मश्री पूर्णमासी जानी : बिना पढ़ाई किए जिन्होंने की हज़ारों कविताओं और गीतों की रचना

गीतों और कविताओं की खास बात यह है कि पूर्णमासी कभी भी इन्हें दोहराती नहीं हैं यानि एक बार जो गा दिया, अब दोबारा नहीं गाया जाएगा। उनकी हर रचना दूसरी रचना से हर मायने में अलग होती है।

एडिटर्स नोट: यह लेख हमारी नई सीरीज़ ‘बदलाव की कहानियां’ के अंतर्गत लिखा गया तीसरा लेख है। इस सीरीज़ के तहत हम अलग-अलग राज्यों और समुदायों से आनेवाली उन 10 महिलाओं की अनकही कहानियां आपके सामने लाएंगे जिन्हें साल 2021 में पद्म पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। इस सीरीज़ की तीसरी कड़ी में पेश है पद्मश्री पूर्णमासी की कहानी।

आपस में बातचीत करने के लिए इंसान भाषा का प्रयोग करता है। इससे भावों की सहज अभिव्यक्ति होती है। मानवीय निकटता भी बढ़ती है। हालांकि इन सबके लिए भाषा को सीखना बहुत ज़रूरी होता है। व्यक्ति जितनी अच्छी तरह से भाषा सीखेगा, उतने ही अच्छे से संचार कर पाएगा। पढ़ना-लिखना इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है। बहरहाल, ओडिशा की पूर्णमासी जानी इसका अपवाद हैं। पूर्णमासी जानी कभी स्कूल नहीं गईं। उन्होंने न ही कभी भाषा की शिक्षा प्राप्त की पर वह ओड़िया, संस्कृत और कुई भाषा बोल लेती हैं। सबसे खास, इन तीन भाषाओं में उन्होंने करीब 50 हज़ार गीतों और कविताओं की रचना की है। भक्ति-भाव में सराबोर होकर वह आरती, भजन और आध्यात्मिक गीत गाती हैं। इतना ही नहीं, अपने गीतों और कविताओं के माध्यम से वह सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूकता भी फैलाती हैं। इस साल के पहले महीने में पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। ओडिशा के जिन पांच लोगों को पद्मश्री मिला, उनमें पूर्णमासी जानी भी शामिल थीं। अब वह पद्मश्री पूर्णमासी जानी हैं। 

पूर्णमासी जानी का जन्म साल 1936 में हुआ। जगह थी, ओडिशा के कंधमाल जिले का दलपड़ा गांव। इस इलाके में आदिवासी रहते हैं। उनका बचपन एक आम आदिवासी लड़की की तरह ही बीता। कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई जिसके बाद वह अपने ससुराल चरीपदा गांव आ गईं। अब जैसा कि आम भारतीय समाज में होता है, शादी के तुरंत बाद बच्चे पैदा करने का दबाव। वही दबाव पूर्णमासी पर भी चलाया गया। वह अपनी 10 साल की शादी में छह बार गर्भवती हुईं। दुर्भाग्य से उनके सभी बच्चों की मौत हो गई। मौत का कारण कम उम्र में मां का गर्भ धारण करना और कुपोषण था। पूर्णमासी दुखी रहने लगीं। हताश और परेशान भी। उनके ससुराल के पास ताड़ीसारू हिल्स है। यहां संत रहते हैं और आदिवासी देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। पूर्णमासी इन्हीं संतों के पास आ गईं और तपस्या करने लगीं। दुख कम करने का ये तरीका उन्हें शायद सबसे बेहतर लगा। अब वह आध्यात्मिक जीवन जीने लगीं। 

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तस्वीर साभार: eodisha.org

सालों बाद, ताड़ीसारू हिल्स से वह वापस गांव आ गईं। गांववालों ने उनमें काफी बदलाव देखे। उन्हें संत का दर्जा दिया गया। उनकी ही वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक इसके बाद उनका नया नामकरण हुआ, ‘ताड़ीसारू बाई।’ अपने क्षेत्र में पूर्णमासी अब इसी नाम से जानी जाती हैं। कुई बोली में ताड़ी का मतलब पर्वत, सारू का मतलब शिखर और बाई का मतलब संत होता है। इस तरह उनके इस नए नाम का अर्थ हुआ, पर्वत के शिखर-सी संत। गांव वापस आकर वह भक्ति गीत गाने लगीं। कविताओं की रचना करने लगीं। गीतों और कविताओं की खास बात यह है कि पूर्णमासी कभी भी इन्हें दोहराती नहीं हैं यानि एक बार जो गा दिया, अब दोबारा नहीं गाया जाएगा। उनकी हर रचना दूसरी रचना से हर मायने में अलग होती है। वह चाहे शब्दों का चयन हो या फिर ताल, लय और सुर। ये गाने सिर्फ भगवान को समर्पित नहीं होते बल्कि इनमें सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की बात भी होती है। पूर्णमासी विभिन्न सामाजिक मुद्दों को उठाती हैं। इनमें जानवरों की हत्या, बाल विवाह, शराब का सेवन और अशिक्षा आदि शामिल है। साल 1990 में पूर्णमासी और उनके गाने तब चर्चा में आए जब कुछ लेखक उनके क्षेत्र में आए। साहित्यकारों और साहित्य से जुड़ी तमाम संस्थाएं हज़ारों की संख्या में उनके गाने रिकॉर्ड कर चुकी हैं। 

गीतों और कविताओं की खास बात यह है कि पूर्णमासी कभी भी इन्हें दोहराती नहीं हैं यानि एक बार जो गा दिया, अब दोबारा नहीं गाया जाएगा। उनकी हर रचना दूसरी रचना से हर मायने में अलग होती है।

आदिवासी कवियत्री और संत पूर्णमासी जानी साल 1969 से आदिवासी लोगों के विकास के लिए काम कर रही हैं। उनके शिष्य डॉक्टर बनोज कुमार रे ने द हिन्दू से बात करते हुए बताया कि आदिवासी समाज पर उनका प्रभाव बहुत अधिक है। कई गांववालों के लिए वह भगवान से कम नहीं हैं। उनके कहने पर बड़ी संख्या में युवा हिंसा और शराब छोड़ चुके हैं। साल 2008 में कंधमाल जिले में आदिवासियों और ईसाई समुदाय के बीच दंगे हुए थे। इन दंगों के बीच समाज में शांति लाने का उनका प्रयास अविस्मरणीय है। साल 1996 में पूर्णमासी जानी को श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने आमंत्रित किया था। उनकी आत्मकथा भी लिखी गई है। इसे डॉक्टर सुरेन्द्र नाथ मोहंती ने लिखी है। शिक्षक दुर्योधन प्रधान ने उनके गानों का संकलन किया है। वहीं, प्रेमानंद मोहपात्रा ने उनकी कविताओं के संकलन को प्रकाशित करवाया है। यहां यह याद रखना जरूरी है कि उनकी सभी कविताओं को लिखित रूप में सबसे पहले उनके शिष्यों ने ही इकट्ठा किया है। उन पर करीब छह किताबें लिखी गईं हैं। प्रेमानंद मोहपात्रा ने ‘कहे ताड़ीसारू’, बिरंची नारायण साहू ने ‘बिस्मय प्रतिवा’, डॉक्टर बनोज कुमार रे ने ‘ताड़ीसारू जिबानी ओ जनापदेशा’ और ‘ताड़ीसारू श्री भजनमाला’, सुरेंद्र प्रसाद मोहंती ने ‘संत साधिका पूर्णमासी जिबानी ओ पदाबली’ और ‘अन्य जने भीमाबोई’ लिखी हैं। कई स्कॉलर उनकी रचनाओं पर शोध करके ओड़िया साहित्य में पीएचडी प्राप्त कर रहे हैं। 

पूर्णमासी जानी को कविताओं के लिए साल 2006 में ओडिशा साहित्य अकादमी अवार्ड प्राप्त हुआ था। साल 2008 में उन्हें दक्षिण ओडिशा साहित्य सम्मान मिला। अपनी असाधारण प्रतिभा के कारण उन्हें विभिन्न संगठनों ने कई पुरस्कार दिए हैं। सबसे खास भारत सरकार द्वारा साल 2021 में मिला ‘पद्मश्री’ है। उनके पति की अब मौत हो चुकी है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में उन्हें कोरोना वायरस हो गया था। 15 जून को वह बीमार पड़ी थीं जिसके बाद उन्हें पास के ही फूलबनी कोविड अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तीन दिन बाद जब उनकी तबियत और बिगड़ी तो उन्हें आदित्य अश्विनी कोविड अस्पताल में शिफ्ट किया गया। हालांकि अब उनकी हालत स्थिर है। पूर्णमासी जानी की कहानी बताती है कि प्रतिभा किसी में भी हो सकती है। हम सबकी अपनी ज़िंदगी के संघर्ष हैं। जीवन की अपनी यात्राएं हैं। एक आम महिला कैसे समाज में मिसाल बन सकती है, यह उनसे सीखा जा सकता है। जब हौसला और हिम्मत साथ हो तो उम्र महज एक आंकड़ा है।

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(पद्मश्री पूर्णमासी जानी के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप उनकी वेबसाइट को पढ़ सकते हैं।)

About the author(s)

मेरा नाम अदिति अग्निहोत्री है। मैं आईआईएमसी में "हिंदी पत्रकारिता" स्नातकोत्तर डिप्लोमा की विद्यार्थी हूँ। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से मैंने 'हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार' में स्नातक किया है। मेरा उद्देश्य जनसरोकार और हाशिये के समाज के लोगों के लिए पत्रकारिता करना है। उनकी बात मुख्यधारा की मीडिया में पहुँचाना है।

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