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“राजा स्कूल जाता है। रानी कपड़े धोती है।” इस तरह के वाक्यों के उदाहरण आप सबने अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़े होंगे। भारत में लड़कियों और लड़कों के बीच न केवल उनके घरों और समुदायों में बल्कि हर जगह लिंगभेद दिखाई देता है। स्कूलों, पाठ्यपुस्तकों को भी उसी लैंगिक भेदभाव के ढ़ांचे पर संचालित किया जाता रहा है। बचपन में जाने-अनजाने में लैंगिक असमानता से परिचित होते बच्चों के बीच भेदभाव की सोच को रोप दिया जाता है जो व्यस्कता आने तक व्यापक हो जाती है। नतीजन समाज में महिला हिंसा और दुर्व्यवहार को सामान्य और एक अधिकार मान लिया जाने लगता है। हाल ही में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने राज्य में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के बाद राज्य के शिक्षा पाठ्यक्रम को संशोधित करने की बात कही है।

मुख्यमंत्री विजयन ने ट्वीट करके कहा है, ‘‘केरल की स्कूली शिक्षा पाठ्य पुस्तकों को संशोधित किया जाएगा और महिलाओं को अपमानित करने वाले शब्दों और वाक्यों को हटाने के लिए ऑडिट किया जाएगा। स्कूलों और कॉलेजों को ऐसे स्थान में बदलने के लिए कदम उठाए जाएंगे जो लैंगिक समानता और समान अधिकरों के विचार को गले लगाते हैं।’’ यह कदम खासतौर से उन्होंने 22 वर्षीय विस्मया की मौत के बाद लिया है। विस्मया की मौत का आरोप उसके पति पर है जो उसे दहेज के लिए प्रताड़ित कर रहा था। केरल में इन दिनों महिला के खिलाफ़ होने वाले अपराध बढ़े हैं। भारत में सबसे ज्यादा साक्षरता दर वाला राज्य केरल है। वहां पर महिलाओं के खिलाफ़ इस तरह की घटना होने के बाद दहेज, समाज और शादी में महिलाओं की स्तिथि पर चिंता जाहिर करते हुए राज्य सरकार ने यह फैसला लिया है।

भारत की शिक्षा प्रणाली

हमारे समाज में बहुत से भेदभाव निहित हैं जिसमें से एक है लिंगभेद। मनुष्य के चहुंमुखी विकास के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण इकाई है, जिसके माध्यम से सामाजिक समझ में बदलाव लाकर उसे नये सिरे से विकसित किया जा सकता है। देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार होने के बावजूद बड़ी संख्या में लिंग के आधार पर बड़ी संख्या में लड़कियों को स्कूल से वंचित रखा जाता है। दूसरा शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ही लिंगभेद की सोच उनके बस्ते के द्वारा उनमें डाल दी जाती है। देश में एक बच्चे का लिंगभेद से परिचय घर के बाद उसकी प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही शुरू हो जाता है। कहानी, कविताओं में तमाम ऐसे उदाहरण होते हैं जो लिंगभेद को बालमन के भीतर स्थापित करते हैं। शिक्षा की शुरुआत से ही लैंगिक रूढ़िवादिता के बीज बोने शुरू हो जाते हैं और कॉलेज व्यवस्था इसी पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित पाठ्यक्रम के माध्यम से सोच को विकसित कर दिया जाता है।

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शिक्षा के खत्म होने तक इस तरह के पूर्वाग्रह मज़बूती से स्थापित हो जाते हैं और फिर यही विचार सही मान लिए जाते हैं। स्कूल के वातावरण और पाठ्यक्रम के द्वारा लैंगिक भेदभाव को विभिन्न भागों में विभाजित करके सिखाया जाता है। स्कूल में बच्चे लैंगिकता से अंजान होते हुए रोज़ के क्रियाकलापों में ऐसे व्यवहार और चीजों के बीच रहकर लिंगभेद को अपनी आदतों में शामिल कर लेते हैं। स्कूल में सामान्य सी दिखने वाली दिनचर्या भी लैंगिक भेद के विचारों से निहित होती है। सहशिक्षा वाले स्कूलों में भले ही लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते तो हैं लेकिन प्राथमिक स्तर से ही उनकी बैठने की अलग-अलग व्यवस्था की जाती है। लड़कियों और लड़कों की अलग-अलग लाईन बनाई जाती है। प्रार्थना कराने की ज़िम्मेदारी लड़कियों को मिलती है। वहीं, खेलकूद की कमान लड़कों को सौंप दी जाती है। कक्षा में पढ़ाई के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिलता है। लड़कियों की छुट्टियां लड़कों से कुछ मिनट पहले कर दी जाती है।

केरल सरकार के इस तरह के फैसले भारतीय शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक बदलाव की पहल है। बचपन में सीखी और सुनी चीजों की दिमाग में गहरी छाप बन जाती है। शिक्षा प्रणाली में निहित रूढ़िवाद और पितृसत्ता को खत्म कर समावेशी सोच को शामिल कर सामाजिक भेदभाव वाले परिदृश्य को धीरे-धीरे बदला जा सकता है।

पाठ्यपुस्तकों में ऐसे चित्र, भाषा और सूचना आदि को शामिल किया गया है जो लैंगिक भेद को दर्शाते हैं। विषयों का विभाजन भी ज्ञान के आधार पर न करके लिंग के आधार पर कर दिया जाता है। लड़की है तो उसका गृहविज्ञान पढ़ना आवश्यक हो जाता है। खेल तक में लड़कियों को इनडोर गेम तक ही सीमित रखा जाता है। ये कुछ ऐसी बिल्कुल सामान्य सी दिखने वाली घटनाएं हैं जो आपने स्कूल की दैनिक क्रिया में ज़रूर की होंगी। कक्षा में दिए जाने वाले प्रॉजेक्ट भी लिंगभेद से निहित होते हैं। सामान्य पाठ्य-पुस्तकों की भाषा और चित्र भले ही लैंगिक भेद को सोचकर ना चुने गए हो लेकिन उनकी प्रकृति लिंगभेद आधारित ही होती है। किताबों, कहानियों में हमेशा ऐसे उदाहरण मौजूद रहे हैं, जिनमें पुरुष को गौरवशाली और ताकतवर दर्शाया जाता है। महिलाओं का वर्णन कोमलता और कमज़ोर के रूप में किया जाता है। कार्यक्षेत्र के बंटवारे में स्त्री के हिस्से दिखाने वाले काम केवल छत तक ही सीमित होते हैं। व्यवसाय वाले चार्ट में महिलाएं केवल उपभोक्ता के रूप में नज़र आती हैं। बचपन में वर्णमाला सिखाने के लिए जिस किताब का इस्तेमाल होता है उसे ध्यान से देखने पर आज भी उसमें लिंगभेद को स्थापित करने के चित्रों में महिला-पुरुष का भेद निहित वर्गीकरण दिख जाएगा। सामान्य तौर पर किताब के चित्रों में महिलाओं की मौजूदगी बहुत ही कम होती है।

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विभिन्न जाति-वर्ग का इतिहास भी है नदारद

शिक्षा पाठ्य-पुस्तकों से किसी विशेष वर्ग, हाशिये पर गई जातियों, आदिवासियों और समूह को अदृश्य रखना, महिलाओं को इसमें शामिल न करना, इस तरह की चीजें जेंडर पूर्वाग्रह और मान्यताओं को बढ़ावा देती हैं। देश की आबादी में 48.4 प्रतिशत नागरिक महिलाएं है और उन्हें पाठ्य-पुस्तकों से बाहर रखा जाता है। इसके अतिरिक्त ट्रांस समुदाय का तो कोई ज़िक्र हमारी स्कूली शिक्षा में दिखता ही नहीं है। महिला-पुरुष के अलावा किसी अन्य लिंग के बारे में सही जानकारी कॉलेज तक भी छात्रों के नहीं मिलती है। ठीक इसी तरह किताबों से दलित और अन्य उपेक्षित वर्गों का इतिहास गायब है। देश का बच्चा-बच्चा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को तो जानता है लेकिन झलकारी बाई के बारे में अधिकतर लोग नहीं जानते हैं। 1857 की क्रांति में अंग्रेजों से लोहा लेनेवाली बहादुर झलकारी बाई की वीरगाथा के बारे में पाठ्यक्रम में कोई जगह नहीं दी गई है। इतिहास में तमाम ऐसे उदाहरण हैं जिनकों उनका सही स्थान नहीं मिला है। दलित साहित्यकार की कृतियां पाठ्यक्रम से गायब हैं। भारत की विभिन्नता और क्षेत्रीयता को दिखाते तमाम उदाहरण किताबों से गायब हैं।

देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार होने के बावजूद बड़ी संख्या में लिंग के आधार पर बड़ी संख्या में लड़कियों को स्कूल से वंचित रखा जाता है। दूसरा शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ही लिंगभेद की सोच उनके बस्ते के द्वारा उनमें डाल दी जाती है।

संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में भारत की शिक्षा में लिंगभेद की स्थिति को बहुत ही चिंताजनक बताया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में लड़कों की तुलना में लगभग 42 प्रतिशत कम लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा मिलती है। वहीं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की लड़कियां प्राथमिक स्तर पर लड़कों के मुकाबले 30 प्रतिशत कम हैं तो उच्च प्राथमिक स्तर पर यही संख्या 26 प्रतिशत पर पहुंच जाती है। भारत में लड़कियों की उम्र बढ़ने के साथ स्कूल छोड़ने की संख्या में भी तेजी देखी जाती है। 23 मिलियन लड़कियां भारत में हर साल महावारी शुरू होने के बाद स्कूल छोड़ देती है। जनगणना 2011 के अनुसार लड़कों की साक्षरता दर 82 प्रतिशत थी तो वहीं केवल 65 प्रतिशत लड़कियां ही पढ़ और लिख सकती हैं।    

भारत के शिक्षातंत्र मे बदलाव की दरकार 

देश के स्कूलों में एक अलिखित नियम होता है जिसके तहत लड़के-लड़कियां आपस में ज्यादा घुलमिल नहीं सकते हैं। स्कूल के वातावरण में जो लड़की लड़कों से बात करती हुई दिखती है उसको बुरा माना जाता है। स्कूल के शिक्षण इसे गलत हरकत ठहराकर आगे से न करने के लिए चेतावनी देते हैं। यह नियम हमारे शिक्षातंत्र में इतनी गहरी पैठ बना चुका है जिसके बदलने के लिए विभिन्न तरह के बदलाव और कदम उठाने की ज़रूरत है। लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए तमाम पाठ्यक्रम और व्यवहार में बदलाव की आवश्यकता है। समावेशी समझ को विकसित करने के लिए पुराने पूर्वाग्रहों पर आधारित कक्षाओं के ढ़ांचे को ध्वस्त करना होगा। वर्ग, समुदाय, लिंग के आधार पर समावेशी पाठ्यक्रम में शामिल कर छात्रों को उनसे रूबरू कराना होगा।   

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केरल सरकार के इस तरह के फैसले भारतीय शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक बदलाव की पहल है। बचपन में सीखी और सुनी चीजों की दिमाग में गहरी छाप बन जाती है। शिक्षा प्रणाली में निहित रूढ़िवाद और पितृसत्ता को खत्म कर समावेशी सोच को शामिल कर सामाजिक भेदभाव वाले परिदृश्य को धीरे-धीरे बदला जा सकता है। शिक्षा के माध्यम से ही समता और समावेशी ज्ञान बच्चों को दिया जा सकता है। पाठ्यक्रमों को जेंडर न्यूट्रल बनाकर बच्चों के बीच उस संवैधानिक सोच को स्थापित कर सकते हैं, जो संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है चाहे वह किसी भी लिंग, धर्म, जाति, वर्ग-समुदाय से हो। देश में लैंगिक भेद आधारित अपराधों की बढ़ती संख्या को देखकर कुछ प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन रूढ़िवादी पूर्वाग्रहों की इन जड़ों को काटने के लिए बहुत ही बड़े स्तर पर हर क्षेत्र में सक्रिय होने की आवश्यकता है। अध्यापन के क्षेत्र में रिसर्च कर रही ‘टीच फॉर इंडिया’ की रिसर्च फेलो वर्तिका का कहना है कि पाठ्यक्रम संशोधन का फैसला बहुत सराहनीय है। सोच में बदलाव लाने के लिए पढ़ाई ही एकमात्र समाधान है। हम जब अपने ट्रेनिंग पैटर्न को इम्प्रूव कर लेंगे तो हमारे सिस्टम में बदलाव आ जाएगा। क्या पढ़ाया जा रहा है, कैसे पढ़ाया जा रहा है यह बहुत मायने रखता है। सीखने-सिखाने की क्रिया जितनी निष्पक्ष होगी उसके परिणाम उतने ही बेहतर होंगे। इस तरह के विषयों पर लगातार बात होनी चाहिए। ऑथारिटी को बदलाव लाने के लिए बार-बार चीजें बदलनी होंगी।

इसी साल महिला दिवस पर पंजाब सरकार ने छात्र-छात्राओं को जेंडर सेंसिटव बनाने के लिए एक पहल की है। पंजाब सरकार के शिक्षा विभाग ने महिला हिंसा के मुद्दे पर काम करने वाली संस्था ‘ब्रेकथ्रू’ और ‘अब्दुल लतीफ जमील पावर्टी एक्शन लैब (जे-लैब)’ दक्षिण एशिया के कार्यक्रम से जुड़कर राज्य की शिक्षा प्रणाली में सुधार किया है। 10 से 14 वर्ष की आयु के छात्रों के लिए ‘तारो की टोली’ एक लिंग संवेदनशील पाठ्यक्रम को स्कूली शिक्षा से जोड़ा है। इससे पहले लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए तेलंगाना सरकार ने कुछ ऐसी ही पहल की थी जिससे शिक्षा को समावेशी बनाया जा सके। ‘टुवर्डस ए वलर्ड आफ इक्वल्सः ए बाइलिंग्वल टेक्सबुक ऑन जेंडर’ किताब पाठ्यक्रम में शामिल करके लैंगिक समानता विषय पर इस तरह की कोशिश करने वाला पहला राज्य बन गया था।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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