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बनारस स्थित हनुमान पोद्दार अंध विद्यालय में 250 छात्रों की सीट होती है। यह विद्यालय पूर्वांचल का एकमात्र अंध विद्यालय है। इसकी स्थापना 26 मार्च, 1972 में हुई थी। मुख्य उद्देश्य था कि दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को शिक्षित-प्रशिक्षित किया जाए। स्कूल को सरकार से 75 फ़ीसद ग्रांट मिलता था, लेकिन साल 2019-20 में उनके पास कोई सरकारी ग्रांट नहीं पहुंचा। पिछले साल जून के आख़िरी सप्ताह में कोरोना काल के दौरान ही नौवीं से बाहरवीं के विद्यार्थियों को पत्र द्वारा सूचित किया गया कि आर्थिक तंगी के कारण उनके लिए स्कूल में अब शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो पाएगी। 60 विद्यार्थी इस फैसले से तत्काल सीधे प्रभावित तो हैं ही, साथ ही ये दृष्टिबाधित विद्यार्थियों द्वारा जीवन को बेहतर बनाने के रास्ते में से एक अहम रास्ते हो हटा देने जैसा है। छात्रों को मिले पत्र में लिखा था कि वे किसी अन्य अंध विद्यालय में दाखिला करवा लें ताकि उनका साल बच जाए। उत्तर प्रदेश में कुल पाँच अंध विद्यालय हैं। उसमें से एक जो प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी क्षेत्र बनारस में स्थिति सबसे बड़ा अंध विद्यालय है, उसके द्वारा कोरोना काल में ऐसा बयान जारी करना कहीं से भी उचित नहीं मालूम पड़ता है।

इसके विरोध में पिछले कुछ दिनों से कई विद्यार्थी धरने पर बैठे हैं, आवाज़ उठा रहे हैं। 8 जुलाई को जारी एक प्रेस रिलीज़ में वे लिखते हैं, “आज दिनांक 8/07/2021 को विकलांग अधिकार संघर्ष समिति द्वारा श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय के बंद होने के खिलाफ दृष्टिबाधित छात्रों ने बीएचयू स्थित विश्वनाथ मंदिर पर विरोध-प्रदर्शन किया। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सरकार हम विकलांग छात्रों को दिव्यांग कहकर दया न दिखाए बल्कि हम विकलांग, दृष्टिबाधित छात्रों को उनका हक दिया जाए। पूरे उत्तर प्रदेश में कुल केवल 5 अंध विद्यालय है जिसमें वाराणसी का सबसे बड़ा 250 सीटों का विद्यालय है जो सेवा स्मृति ट्रस्ट द्वारा संचालित होता है लेकिन आर्थिक तंगी का हवाला देकर कक्षा 9 से 12 तक बंद किया जा चुका है और विद्यालय में नए छात्रों का प्रवेश नहीं हो रहा। ऐसे में हम बनारस भर के सभी छात्रों, नागरिकों से अपील करते हैं कि विकलांग छात्रों के अधिकार के लिए साथ आइए। जनता की आस्था का इस्तेमाल दृष्टिहीनता पर किए जाने के कारण यहां दान दाताओं का भी तांता लगा रहता है मगर छात्रों के जीवन पर इन सुविधाओं का कोई असर नहीं पड़ता। इन पैसों और सुविधाओं का इस्तेमाल ट्रस्ट अपने व्यवसायिक कामों में करती है। यहां तक कि दान-दाताओं को आकर्षित करने के लिए परीक्षा के दिनों में भी विद्यालय प्रांगण में ही कथाओं और बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिनका कोई भी सार्थक प्रभाव हम दृष्टिहीनों पर नहीं पड़ता।” 

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उन्होंने जो मांगे इस प्रेस रिलीज़ के जरिये सामने रखी हैं वे हैं :

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1. अंध विद्यालय को सरकार पूर्णतया अपने अधिकार क्षेत्र में ले और हमें हमारा अधिकार भीख या सेवा के बजाय अधिकार बोध के साथ प्रदान किया जाए। 

2. विद्यालय से निकाले गए छात्रों को वापस दाखिल किया जाए और उनकी कक्षाओं और परीक्षाओं का उचित प्रबंध किया जाए। 

3. तत्काल प्रभाव से विद्यालय को पुनः संचालित किया जाए।

अंध विद्यालय को बंद किए जाने के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन की तस्वीर। तस्वीर साभार: शशिभूषण

जेएनयू से एमए की कर चुके, उत्तर प्रदेश के निवासी शशिभूषण इस विरोध प्रदर्शन में पहले दिन से सक्रिय हैं। वह बताते हैं कि जिन दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को प्रदर्शन स्थल पर आने की इच्छा है, अपनी बात ख़ुद वहां आकर रखना चाहते हैं और अगर थोड़ी दूर के रहने वाले हैं उनके लिए रहने की जगह इत्यादि की व्यवस्था करना भी एक दिक़्क़त हो जाती है। उनमें से कुछ को बीएचयू के पुरुष छात्रवास में ठहराया गया है। यही बात महिला दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के साथ भी लागू होती है। कुछ महिलाएं प्रदर्शन स्थल पर आकर प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों के साथ एकजुटता प्रकट करना चाहती हैं लेकिन स्तिथियां उनके अनुकूल नहीं हैं। रहने की व्यवस्था सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभर के समझ आती है। किसी आंदोलन को लंबे समय तक जमीन पर बनाए रखने के लिए अर्थ की जरूरत होती है। इस आंदोलन में आर्थिक सहायता के लिए लोगों से अपील भी की गई है। हालांकि इन दिक्कतों के बावजूद प्रदर्शन जारी है। उन्होंने बीएचयू गेट पर नारे लगाए, वे गुरुधाम स्थित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय जा रहे थे तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। वे विद्यालय खुलवाने के लिए प्रधानमंत्री को संबोधित पत्र उनके संसदीय कार्यालय में देना चाहते थे। एसीपी कोतवाली प्रवीण कुमार सिंह ने पत्र लेकर उन्हें आश्वस्त किया है।

उद्योगपतियों के दख़ल को लेकर विद्यार्थी बात कर रहे हैं उनका कहना है कि उन्होंने अपने कारोबार के लिए विद्यालय बंद करवाया है। वे विद्यालय की संपत्ति निज़ी फ़ायदे और कारोबार के काम लाना चाहते हैं। ट्रस्टियों में बनारस के ‘जालान समूह‘ समेत कई बड़े कारोबारी हैं जो कोविड-19 का तर्क देकर बता रहे हैं कि पैसे नहीं है। आर्थिक तंगी का हवाला देकर स्कूल को पहले नौवीं से बाहरवीं और फिर हमेशा के लिए बंद किए जाने की संभावित योजना विद्यार्थियों को असंतोष से भर रही है। दबी ज़ुबान से अध्यापकों का कहना है कि विद्यालय प्रबंधन के द्वारा सरकारी ग्रांट के लिए फाइल ही देर से भेजी जा रही है। अमित कुमार तिवारी, विद्यार्थी और प्रदर्शन में सक्रिय सदस्य कहते हैं, “हमारी भाषा में ‘विकलांग’ शब्द गाली की तरह आता है। हमारी इसी घृणित मानसिकता,सत्ता और पूंजीपतियों की गठजोड़ चालबाज़ी के खिलाफ ये दृष्टिबाधित छात्र सड़कों पर उतरे हुए हैं। सन् 1972 में स्थापित ‘श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय’, जिसमें कुछ दिनों पहले तक गोरखपुर, गोंडा, बाराबंकी, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, वाराणसी, गाजीपुर समेत पूरे पूर्वांचल के साथ-साथ बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के दृष्टिबाधित छात्र पढ़ते थे, उन्हें बड़ी ही चालाकी के साथ सत्ता और बनारस के पूंजीपति व्यापारी ‘जालान समूह’ के द्वारा बंद किया जा रहा है।” बनारस का ‘जालान समूह’ सेवा समिति ट्रस्ट का मालिक है। यही ट्रस्ट सरकार से अनुदान प्राप्त कर विद्यालय को संचालित करता है। विद्यालय में कक्षा 6-12 तक की पढ़ाई होती थी लेकिन कक्षा 9-12 तक की पढाई बंद कर दी गई है। बाकी कक्षा 6-8 तक के छात्रों को पास करके विद्यालय को बंद कर दिया जाएगा, ऐसा छात्रों का कहना है। 

छात्रों ने जानने की कोशिश की कि आखिर उनका विद्यालय क्यों बंद किया जा रहा है तो विद्यालय प्रशासन ने जवाब दिया कि सरकार की तरफ से ग्रांट नहीं आ रहा है।फिर छात्रों ने कागज़ात चेक किया तो पता चला कि 2014 तक विद्यालय को सरकार से 75 फ़ीसद ग्रांट प्राप्त होता रहा। नयी सरकार ने ‘दिव्यांग’ कहना शुरू किया और ग्रांट 50 फ़ीसद कर दिया। 2019-2020 में कोई ग्रांट ही नहीं आया। चोर-चोर मौसेरे भाई के खेल में प्रशासन ने छात्रों को जवाब दिया कि स्कूल की तरफ से जरूरी डाॅक्यूमेंट नहीं दिया जा रहा है इसलिए ग्रांट नहीं दिया गया। छात्रों का कहना है कि इनका असल खेल यह है कि जिस जगह पर इनका विद्यालय है वह बनारस के प्रसिद्ध ‘दुर्गा मंदिर’ के ठीक सामने है। ये लोग जमीन और उस संपत्ति को हथियाकर वहां माॅल और रेस्तरां खोलना चाहते हैं इसलिए ये लोग आपस में खेल कर रहे हैं।उस संपत्ति को हथियाने के बाद वे हमारा विद्यालय सेवा के नाम पर कहीं कोने-अतरे फेंक देंगे। सेवा होती रहेगी। आज ये छात्र अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर हैं। इन्हें किसी की सेवा नहीं चाहिए।

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तस्वीर साभार : प्रदर्शन में शामिल शशिभूषण की फेसबुक वॉल से

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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