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बात जब भी महिला स्वास्थ्य या उससे संबधित परेशानियों की होती है तो हमारी बातचीत का तरीका बदल जाता है। आवाज़ धीमी और विषय बदलने की जल्दबाज़ी लगी रहती है। कहीं कोई हमें इस तरह की बातें करते न सुन ले। यह असहजता खुद स्त्रियों में देखने को मिलती है। “तबियत खराब है” जैसी बात कहकर महिलाएं पीरियड्स की पीड़ा को उस तरीके से जाहिर नहीं कर पाती जितने की उसे आवश्यकता होती है। आज भी अधिकतर लड़कियां और महिलाएं अपने घर-परिवेश में खुलकर पीरियड्स पर बात नहीं करती हैं। यही नहीं शादी से पहले लड़की का स्त्री रोग विशेषज्ञ तक के जाना शक भरी नजरों से देखा जाता है। भारतीय संस्कृति में माहवारी को अशुद्ध बताकर इसके आधार पर महिलाओं के साथ पीढ़ियों से बुरा बर्ताव होता आ रहा है। पीरियड्स को लेकर समाज में बहुत सारी भ्रांतियां और नकारात्मकता है। पुरुषों में इसकों महिला को होने वाली एक बीमारी तक कहा जाता है। पीरियड्स जैसे विषय पर हमारे समाज में लगातार बातचीत करने की आवश्यकता है।

हाल में उत्तर-प्रदेश की महिला शिक्षक संगठन ने मांग की है कि उन्हें महीने में तीन दिन की पीरियड लीव मिले। यह मांग एक बार फिर से महिलाओं को होने वाली माहवारी और लैंगिक समानता को लेकर होने वाली बहस का विषय बन रही है। राज्य महिला शिक्षक संगठन ने अपने मांग पत्र में कहा है कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं की मानसिक और शारीरिक स्थिति सामान्य दिनों से अलग होती है। उनमें बहुत से हार्मोनल बदलाव होते हैं जिस कारण पेट और शरीर में दर्द, मूड स्विंग जैसी समस्या का उन्हें सामना करना पड़ता है। अपने मांग पत्र में उन्होंने कहा है कि डॉक्टर भी इस दौरान आराम करने की सलाह देते हैं इसलिए सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। पीरियड्स भारत में वह विषय है जो सामाजिक रूढ़ता के कारण बहुत जटिल बना हुआ है। पीरियड्स को शर्म का विषय मानकर भारतीय समाज में इस पर बहुत कम बात होती है। भारत से संबधित एक अध्ययन में यह बात भी सामने आ चुकी है कि 71 प्रतिशत लड़कियां माहवारी से जबतक अपरिचित रहती है तब तक वह पहली बार खुद इसका अनुभव नहीं करती है।

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क्या यह मांग महिला की कमज़ोरी दर्शाती है?

पीरियड लीव्स का मामला जब भी सामने आया है तो इस पर बहुत अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने को मिलती हैं। इस विषय पर खुद महिलाओं की राय दो खेमों में बंटी हुई दिखती है। कुछ इस तरह के फैसले को लागू करने के पक्ष में है तो कुछ का कहना है कि यह नीति वर्क स्पेस में महिलाओं की समान भागीदारी की मांग के आड़े आती है। इस तरह की मांग कार्यस्थल पर महिला की बराबरी और संघर्ष को कमजोर करती है। इस विषय पर कई महिलाओं का कहना है कि उन्हें इस तरह की नीति की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसी नीतियां महिलाओं के लिए नुकसानदेह ही साबित होंगी। काम पर रखने के लिए महिलाओं के चयन को नजरअंदाज किया जाएगा। यही नहीं यह मांग उस धार्मिक रूढ़ि को भी मजबूत कर देगी जो यह कहती है कि मासिक च्रक के दौरान महिला अशुद्ध होती है उसको इस दौरान सबसे अलग रहना चाहिए। इन सभी तर्कों के बीच सबसे ज़रूरी बात यह है कि सभी लोग पीरियड्स के दौरान एक जैसी समस्याओं से नहीं गुज़रते हैं इसलिए पीरियड्स लीव का प्रावधान कार्यस्थलों पर बिल्कुल होना चाहिए।

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क्या कहना है महिला शिक्षकों का

इस विषय पर हमने उत्तर प्रदेश में कार्यरत महिला शिक्षकों से बात की है जिनकी इस मांग पर राय बंटी हुई दिखती है। महिला शिक्षकों की निजता का ध्यान रखते हुए यहां उनके नाम को उजागर नहीं किया गया है। यह सभी शिक्षिका पश्चिम उत्तर-प्रदेश में कार्यरत हैं। स्वाति का कहना है, “यह मांग एक टैबू को तो खत्म करती है कि हम खुलकर पीरियड्स पर बात कर रहे हैं लेकिन हर महीने महिला शिक्षिका को तीन दिन की लगातार छुट्टी मिलना सही नहीं है। यदि यह मांग मान ली जाती है तो पहले से ही लचर शिक्षा व्यवस्था का इस पर बहुत खराब असर पड़ेगा। बच्चों के पाइंट ऑफ व्यू से देखें तो लगातार इस तरह से टीचर की अनुपस्थिति पढ़ाई को डिस्टर्ब करेंगी। मान लीजिए किसी स्कूल में अधिकतर महिला शिक्षकों का हैं और सबका पीरियड समान दिन बैठता है तो क्या हम स्कूल को इस कारण बंद रखेंगे।” वहीं, रीना (बदला हुआ नाम) का कहना है कि पीरियड लीव की मांग एक उचित मांग है। महिला शिक्षकों की सेहत को ध्यान में रखते हुए यह काम होना चाहिए। बहुत सारी महिलाएं अपने पीरियड्स के दौरान बहुत दर्द का सामना करती हैं। सुमन (बदला हुआ नाम) का कहना है, “इस पर सबको छुट्टी देना थोड़ा मंहगा पड़ सकता है। हमारे स्कूलों में पहले से ही स्टॉफ की कमी है। दूसरा मुझे ऐसा लगता है कि छुट्टी के बजाय यदि शौचालय और स्वच्छता हमारी प्राथमिकता हो तो ज्यादा बेहतर होगा। इसका फायदा स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों को भी होगा।”

हाल में उत्तर-प्रदेश की महिला शिक्षक संगठन ने मांग की है कि उन्हें महीने में तीन दिन की पीरियड लीव मिले। यह मांग एक बार फिर से माहवारी और लैंगिक समानता को लेकर होने वाली बहस का विषय बन रही है।

साथ ही सभी महिला शिक्षिकाओं ने इस बात को भी कहा है कि कुछ त्योहारों की छुट्टियां केवल महिला शिक्षिकाओं को मिलती हैं। इस वजह से हमारे सहयोगी पुरुष शिक्षक हमारा मजाक उड़ाते हैं। टीचर्स ग्रुप में करवा चौथ, अष्टमी जैसे पर्व पर ऐसे जोक्स चलते हैं कि काश ‘हम भी महिला शिक्षक होते।’ पीरियड्स की इस तरह से अलग से हर महीने छुट्टी मिलना तो महिला शिक्षिकाओं को और भी बातें सुनने को मिल सकती हैं। इससे यह बात तो साफ निकलकर आती है कि माहवारी को लेकर हमारे शिक्षित पुरुष शिक्षिक भी वही सोझ-समझ रखते हैं जो इस समाज के अन्य पुरुष रखते हैं।

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पहले से ही मौजूद है कही जगह पीरियड लीव

भारत में कई कंपनियां है जहां पर महिला कर्मचारियों को पीरियड्स के दौरान छुट्टी दी जाती है। यही नहीं बिहार राज्य में सन् 1992 से महिलाओं को अतिरिक्त छुट्टी देने का प्रावधान है। इसमें कलकत्ता की डिजिटल मीडिया कम्पनी ‘फ्लाई माई बिज’, मुबंई की ‘कल्चरल मशीन’, बैंगलोर मे स्थित ‘हॉर्सस स्टेबल न्यूज’, गोजूप ऑनलाइन प्राइवेट लिमिटेड, और जौमेटे वे कंपनियां हैं जिनके यहां साल भर में महिला कर्मचारियों को पीरियड्स को ध्यान में रखते हुए उन्हें अतिरिक्त छुट्टियां मिलती हैं। सन 2018 में अरूणाचल प्रदेश से लोकसभा सांसद निमोंग एरिंग ने ‘मेंस्ट्रुअल बेनिफिट बिल’ पेश किया था जिसमें कहा गया था कि प्रत्येक कामकाजी महिला के लिए माहवारी के दिनों आराम के लिए छुट्टी मिलनी चाहिए। इस बिल में भारत के सभी सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों में महिला कर्मचारियों को हर महीने दो दिन की वेतन सहित छुट्टी दी जाएगी।

खुलकर बात होनी चाहिए

यह सच है कि हमें महिलाओं और उनके स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत सरकार के आंकड़े ही इस बात पर मुहर लगाते हैं कि भारतीय महिला आबादी की बड़ी संख्या एनीमिया से पीड़ित है, उन्हें सही पोषण आहार नहीं मिलता है। कार्यक्षेत्र में उनकी बॉयलोजिक संरचना को देखते हुए उन्हें वे सुविधाएं देनी चाहिए जो उनकी सेहत के लिए आवश्यक हैं। पीरियड्स पर अक्सर जब भी बात होती है तो वह महिलाओं को पीरियड से जुड़े उत्पाद तक सीमित रहती है। पीरियड्स की बुनियादी जरूरत से आगे भी बहुत करना आवश्यक है। भारत में यदि पीरियड लीव की कोई पॉलिसी बनती है तो वह कामकाजी महिलाओं, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली मजदूर महिलाओं और ट्रांस समुदाय के लोगों के लिए भी लागू होनी चाहिए। पीरियड्स के दौरान एक महिला का खुद का ध्यान रखना ना केवल आवश्यक है बल्कि यह उसका हक भी है। इस विषय के पक्ष-विपक्ष के आए विचार उसी तरह है जैसे अन्य किसी विषय पर होते हैं। विपक्षी तर्क को नकारात्मकता से न देखकर विषय की गंभीरता और आवश्यकता पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।               

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तस्वीर साभार : CNN

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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