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एक लोकतांत्रिक देश में आम जनता को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार दिया जाता है। भारत में अनुच्छेद 19 के तहत देश के हर नागरिक को यह अधिकार दिया जाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब जनता सामाजिक-राजनीतिक कुव्यवस्थाओं को बदलने के लिए, सत्ता पलटने के लिए, अपने अधिकार मांगने के लिए या रूढ़िवादी कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ विरोध जताने के लिए एकजुट हुई है, तब-तब दमनकारी शक्तियां भी उतनी ही ताकत के साथ उभरती नज़र आई हैं। न सिर्फ़ भारत में, बल्कि दुनिया के हर एक देश में जब भी विरोध-प्रदर्शन किए जाते हैं तो जनता की आवाज़ को कुचलने के लिए ऐसे शस्त्रों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके लिए दोबारा खड़े होकर आवाज़ बुलंद करना मुश्किल कर दे। 

असमानता हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है। जाति, लिंग, धर्म, वर्ग आदि के आधार पर असमानताओं के चलते हाशिये पर गए वर्गों को समान अवसरों से वंचित रखा जाता है और इनके लिए परिस्थितियाँ अधिक कठिन कर दी जाती हैं। यह असमानता विरोध-प्रदर्शनों के दौरान भी देखने को मिलती है। सदियों से विरोध-प्रदर्शनों में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका सराहनीय रही है। फिर भले ही हम शाहीन बाग़ की बात करें या किसान आंदोलन की। चाहे तो दुनिया के दूसरे कोने में सूडान या कैलिफोर्निया का उदाहरण लें। हक़ की लड़ाई में महिलाओं ने डटकर आवाज़ उठाई है लेकिन दमनकारी शक्तियों में भी पितृसत्तात्मकता अपनी जड़ बनाए हुए है। विरोध के दमन के लिए जहां एक ओर आंसू-गैस, लाठीचार्ज, गिरफ़्तारी आदि का प्रयोग होता है। वहीं, दूसरी ओर महिलाओं को रोकने के लिए इन शक्तियों का पैमाना और अधिक बढ़ जाता है। इसके फलस्वरूप महिलाओं को न सिर्फ़ सियासी ताकतों का सामना करना पड़ता है, बल्कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान वह दमन के पितृसत्तात्मक तरीकों को भी चुनौती देती हैं। ऐसी ही कुछ चुनौतियों की चर्चा हम आगे करेंगे।

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यौन हिंसा 

आए दिन अखबारों में हम महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रहे बलात्कार और यौन हिंसाओं की खबरें पढ़ते हैं। यह पितृसत्ता का सबसे सशक्त उपकरण है और दमनकारी शक्तियां इसी का प्रयोग आवाज़ दबाने के लिए करती हैं। विरोध-प्रदर्शनों में महिलाओं को यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। अभी हाल ही में चल रहे दुनिया के सबसे बड़े किसान आंदोलन में पश्चिम बंगाल से आई एक युवती के बलात्कार का मामला सामने आया था। ऐसे में जेंडर हिंसा विशेषज्ञ, मोनिका गोडाय का कहना है, ‘सत्ताधारी ताकतों द्वारा यौन हिंसा का उपयोग करना कोई नई बात नहीं है। इसका उद्देश्य महिलाओं को राजनीति में और विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने से रोकना है।’

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मोरल पुलिसिंग 

मोरल पुलिसिंग का अर्थ है किसी को नैतिकता के नाम पर ‘अच्छे आचरण’ अपनाने की हिदायतें देना। लड़कियों, औरतों को उनके पहनावे के लिए, रात में देर तक बाहर रहने के लिए, अकेले कहीं न जाने की हिदायतें दी जाती हैं। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान भी ‘मेल गेज़’ से बचने के लिए महिलाओं पर कई प्रकार की शर्तें लागू की जाती हैं। साल 2018 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज के होस्टल की नीतियों के ख़िलाफ़ रातभर मोर्चे पर बैठी लड़कियों पर रात के डेढ़ बजे मोटर साइकिल सवार कुछ लड़के आपत्तिजनक टिप्पणी करके जाते हैं। पुलिस को शिकायत करने पर जवाब यही मिलता है कि लड़की होकर रात को बाहर घूमोगी तो यही होगा। कॉलेज के अंदर ही रहिए। शाहीन बाग़ में सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ मोर्चा संभालती हुई औरतों पर ‘बिकी हुई’ और न जाने क्या-क्या कहकर आरोप लगाए जा रहे थे। चुटकियों में ही इन औरतों के संघर्ष को, इनकी आवाज़ की ताकत को मिट्टी में मिलाने की कोशिश की गई पर इन औरतों ने पलट कर जवाब दिया और इस तरह की झूठी अफ़वाहें और आरोप लगाने वालों के ख़िलाफ़ मानहानि का केस किया।

बलात्कार और यौन शोषण की धमकी 

टिकरी बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन को देश-विदेश से जानी-मानी हस्तियों का सहयोग मिला। ऐसे में टिकरी में इंटरनेट शटडाउन के खिलाफ प्रचलित गायक रिहाना ने ट्वीट करके लिखा था, ‘हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?’ इस एक ट्वीट ने भारत में तहलका मचा दिया था। रिहाना को कितने ही कॉमेंट्स में बलात्कार की धमकियां मिली और उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया। इतना ही नहीं, बहुत पहले एक खबर आई थी कि क्रिस ब्राउन ने रिहाना का यौन शोषण किया था। लोग उसका सहयोग करने लगे और कई लोगों ने तो इतना तक कह दिया कि रिहाना के साथ जो भी हुआ, सही हुआ था।

इससे हमारे समाज की पितृसत्तात्मक सोच के बारे में पता चलता है। अगर कोई महिला किसी मुद्दे को लेकर अपनी राय रखती है, तो उसके ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचारों को सही ठहराया दिया जाता है। यह कहानी सिर्फ़ रिहाना की नहीं है। साल 2020 में कॉमेडियन अग्रिमा जोशुआ के एक जोक से एक विशेष समाज को ठेस पहुंची, तो उसी समाज का एक प्रतिनिधि अग्रिमा के सोशल मीडिया पर उसे बलात्कार की धमकियां देने लगा। जहां डिजिटल मीडिया से हमें अभिव्यक्त करने की आज़ादी मिली है तो वहीं इस अभिव्यक्ति को रोकने के लिए, औरतों के ख़िलाफ़ तरह-तरह के कॉमेंट्स पास किए जाते हैं। 

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प्रदर्शन में शामिल महिला किसान, तस्वीर साभार: Outloo

दमनकारी नीतियां

अक्सर ऐसा भी होता है कि औरतों के अनुभवों को, उनके विचारों और उनकी राय को नज़रंदाज़ कर दबा दिया जाता है। किसी बड़ी मुहीम के चलते उनके ख़ुद के अस्तित्व को भुला दिया जाता है। यह देश के आम जन द्वारा ही नहीं बल्कि बड़े और समझदार तबके द्वारा भी किया जाता है। किसान आंदोलन के तहत एक समय ऐसा आया जब सुप्रीम कोर्ट के उच्च न्यायाधीश ने सभी बुजुर्गों और औरतों को घर लौटने के लिए कहा। चंद मिनटों में उन तमाम महिला किसानों के संघर्ष, उनकी मेहनत को नकार दिया गया। ऐसी औरतों के जज़्बे को सलाम जिन्होंने पितृसत्तात्मकता की दमनकारी तलवारों की मार सह कर भी अपनी आवाज़ बुलंद रखी। टाइम्स मैगज़ीन में एक महिला किसानों ने साक्षात्कार के दौरान कहा, ‘हम आखिर वापिस क्यों जाएं? यह सिर्फ़ पुरुषों की लड़ाई नहीं है। हम भी खेत में उतना ही काम करते हैं जितना हमारे मर्द। हम अगर किसान नहीं है तो और कौन हैं?’ यह दमनकारी ताकतें महिलाओं को क़ाबू में करने के लिए, उन्हें रोकने के लिए ऐसे कितने ही नुस्ख़े और तरकीबें निकालते रहेंगे। हमें इनकी राजनीति को समझने की ज़रूरत है। आवाज़ दबाने की जगह बढ़ाने की ज़रूरत है क्योंकि जब तक औरतें चुप रहेंगी, जुर्म बढ़ता ही जाएगा। 

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तस्वीर साभार : deccanherald

प्रेरणा हिंदी साहित्य की विद्यार्थी हैं। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने अनुवाद में डिप्लोमा किया है। अनुवाद और लेखन कार्यों में रुचि रखने के इलावा इन्हें चित्रकारी भी पसंद है। नारीवाद, समलैंगिकता, भाषा, साहित्य और राजनैतिक मुद्दों में इनकी विशेष रुचि है।

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