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बीते दिनों जापान की राजधानी टोक्यो में धूमधाम से संपन्न हुए ओलंपिक्स में भारत ने इतिहास का अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। भारत ने खेलों के इस महाकुंभ में एक गोल्ड, दो सिल्वर और चार ब्रॉन्ज मेडल मिलाकर कुल सात पदक अपने नाम किए। ओलंपिक्स के बाद अब खेल प्रेमियों की निगाहें 24 अगस्त से शुरू हुए पैरालंपिक खेलों पर हैं जिसमें भारत की ओर से 9 खेलों में 54 सदस्यीय दल अपना दमखम दिखाने गया है। इसी दल में एक नाम है, पैरा ताइक्वांडो खिलाड़ी अरुणा सिंह तंवर। हरियाणा के भिवानी जिले के गांव दिनोद की रहने वाली अरुणा पैरालंपिक खेलों में क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय ताइक्वांडो खिलाड़ी हैं। अरुणा को टोक्यो पैरालंपिक में वाइल्ड कार्ड के ज़रिए प्रवेश मिला है। पांच बार की राष्ट्रीय चैंपियन अरुणा महिलाओं की अंडर-49 kg/k-43 श्रेणी में दुनिया की चौथे नंबर की खिलाड़ी हैं। इसके साथ ही अरुणा ने एशियाई पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप और वर्ल्ड पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में भी पदक जीते हैं। वर्तमान में अरुणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से बीपीएड कर रही हैं। पेश हैं अरुणा सिंह तंवर से फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ बातचीत के मुख्य अंश।

फेमिनिज़म इन इंडिया : सबसे पहले आपको पैरालंपिक्स में चयनित होने की बहुत-बहुत बधाई। पैरालंपिक्स में जाने को लेकर आप कितनी उत्साहित हैं?

अरुणा : बहुत- बहुत शुक्रिया। मैं बता नहीं सकती कि मैं कैसा महसूस कर रही हूं। हर खिलाड़ी का सपना होता है कि वह ओलंपिक में जाए। मैं इस बार टोक्यो में अकेली भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करने वाली, पूरा भारत मेरे साथ प्रतिनिधित्व करेगा। इस बार मुझे मौका मिला है तो मैं मेडल लाने की पूरी कोशिश करूंगी।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपको कब लगा कि स्पोर्ट्स में जाना चाहिए? यह सफर कबसे शुरू हुआ?

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अरुणा : यह सब शुरू हुआ जब मैं 5-6 साल की थी, तब भिवानी के कोच रॉबिन सिंह मार्शल आर्ट के एक ट्रेनिंग कैंप के लिए हमारे गांव के स्कूल में आए थे जहां मैं पढ़ती थी। मुझे बचपन से ही मार्शल आर्ट बेहद पसंद था। फिर मैंने अपने टीचर से ताइक्वांडो के बारे में जानकारी ली जिसके बाद मेरी रुचि इसमें बढ़ती गई। आठ साल की उम्र में मैेंने सामान्य वर्ग में ताइक्वांडो खेलना शुरू किया था लेकिन हाथों में डिफॉर्मिटी की वजह से मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के अयोग्य घोषित कर दिया गया तो साल 2017 में मैंने पैरा ताइक्वांडो जॉइन कर लिया। ताइक्वांडो से पहले मैंने दो साल एथलेटिक्स भी किया था। फिलहाल मैं रोहतक की एक एकेडमी में अपनी प्रैक्टिस कर रही हूं।

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“अगर आप एक महिला हो, ऊपर से विकलांग हो तो समाज उसको जीने नहीं देता है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था। जब मैंने मार्शल आर्ट शुरू किया था तो सब पापा से यही कहते थे कि लड़की को स्पोर्ट्स में भेज रहा है, पहले से ही वह विकलांग है और ऊपर से अगर कुछ चोट लग गई तो दिक्कत हो जाएगी। इसको पढ़ा- लिखा और शादी कर दे।”

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपके यहां तक के सफर में सबसे ज्यादा सपोर्ट किसने किया है?

अरुणा : अगर आप एक खिलाड़ी हैं या जिस किसी भी फील्ड में हैं, परिवार के सपोर्ट के बिना कुछ भी नहीं है। अगर मेरे माता- पिता ने मुझे सपोर्ट नहीं किया होता तो मैं आज यहां तक नहीं पहुंचती।

फेमिनिज़म इन इंडिया : कोविड-19 के वक्त जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था तब आपने किस तरीके से तैयारी की थी?

अरुणा : सभी की तरह कोविड -19 का समय मेरे लिए भी अच्छा नहीं था। एकेडमी बंद हो गई थीं, केवल घर पर ही प्रैक्टिस कर सकते थे। सुबह- शाम मैंने अपने घर पर ही प्रैक्टिस की थी। मेरे कोच मुझे लाइव ट्रेनिंग करवाते थे। कोविड-19 के कारण जॉर्डन में वर्ल्ड और एशियाई क्वालिफायर में खेल नहीं पाई थी तो मैं थोड़ी निराश थी लेकिन मुझे विश्वास था कि मेरी वर्ल्ड रैंकिंग से मैं कोटा हासिल कर सकती हूं। मेरा मानना है कि कोविड-19 हो या कोई भी प्रॉब्लम हो, आपको मानसिक रूप से मजबूत रहना चाहिए, खुद को मोटिवेट रखना चाहिए। बुरा वक्त सभी के जीवन में आता है और चला भी जाता है। बस मैंने खुद को मोटिवेट रखा। मई में जब मैं लखनऊ के साईं सेंटर गई थी तो मुझे वहां भी कोविड हो गया था, 14 दिन क्वारंटाइन रहने के बाद भी मैं पॉजिटिव आई। लेकिन मैं निराश नहीं हुई और देखिए आज मैं ठीक हूं और टोक्यो भी जा रही हूं।

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अरुणा सिंह तंवर, तस्वीर साभार: Wikipedia

फेमिनिज़म इन इंडिया : क्या आपको ट्रेनिंग के लिए आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा? सरकार की तरफ से आपको कुछ मदद मिली?

अरुणा : नहीं, सरकार ने मेरी कोई मदद नहीं की। मैंने पांच इंटरनेशनल खेले हैं जिसमें वर्ल्ड चैंपियनशिप, दो बार एशियाई चैंपियनशिप और एक इंटरनैशनल कप भी शामिल हैं। उस वक्त सरकार ने मेरी कोई सहायता नहीं की थी लेकिन पैरालंपिक्स में नाम आने के बाद मदद करना शुरू किया है। मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से आती हूं। मेरे पापा अधिक से अधिक एक या दो देश में जाने के लिए पैसे खर्च कर सकते थे लेकिन उन्होंने उधार लेकर, ब्याज पर पैसे लेकर मेरी ट्रेनिंग करवाई है और हमेशा कहते थे, “तू जा अपने खेल पर ध्यान दे।”

फेमिनिज़म इन इंडिया : महिलाओं से अक्सर कहा जाता है कि खेल का क्षेत्र उनके लिए नहीं है, क्या आपने भी ये सब अनुभव किया?

अरुणा : अगर आप एक महिला हो, ऊपर से विकलांग हो तो समाज उसको जीने नहीं देता है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था। जब मैंने मार्शल आर्ट शुरू किया था तो सब पापा से यही कहते थे कि लड़की को स्पोर्ट्स में भेज रहा है, पहले से ही वह विकलांग है और ऊपर से अगर कुछ चोट लग गई तो दिक्कत हो जाएगी। इसको पढ़ा- लिखा और शादी कर दे। लेकिन मैंने ठान लिया था तो मेरे पापा ने भी लोगों की बातों की परवाह न करते हुए मेरा साथ दिया। मेरी मां ने भी मेरा पूरा साथ दिया। वह लोगों से कह देती थीं कि हमारी बेटी है, हम देख लेंगे। आपको फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है। मेरे से ज्यादा तो मम्मी-पापा ने सुना है क्योंकि जो भी लोग आते थे, उनको ही बोलते थे लेकिन उन्होंने मुझ पर विश्वास किया और मेरा हाथ नहीं छोड़ा। अब तक जो कुछ भी मेरा हासिल है, सब उन्हीं की बदौलत है। मैं आगे भी इसी तरह उनको गौरवान्वित करने का प्रयास करूंगी।

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मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से आती हूं। मेरे पापा अधिक से अधिक एक या दो देश में जाने के लिए पैसे खर्च कर सकते थे लेकिन उन्होंने उधार लेकर, ब्याज पर पैसे लेकर मेरी ट्रेनिंग करवाई है और हमेशा कहते थे, “तू जा अपने खेल पर ध्यान दे।”

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप उन लोगों को क्या कहना चाहेंगी जो अपनी लड़कियों को स्पोर्ट्स में नहीं भेजते हैं?

अरुणा : मैं बस यही कहना चाहूंगी कि लड़कियां किसी से कम नहीं होती हैं। अगर आप एक चिड़िया के पर ही बांध देंगे तो वह कैसे उड़ पाएगी। जिन भी लोगों की ऐसी मानसिकता है, मैं उनसे कहना चाहती हूं कि आपकी बेटी, आपकी बहन के अपने करियर को लेकर कुछ सपने हैं तो उन्हें करने दें, रोकें नहीं। वह आपका सिर ऊंचा ही करेगी। अगर आप उसके सपने को अंदर ही अंदर खत्म करने पर मजबूर कर देंगे तो वह कुछ भी नहीं कर पाएगी, उसके मन में नकारात्मकता घर कर जाएगी। ऐसी सोच न रखिए कि लड़की है तो हमारी ‘नाक कटा’ देगी। इंदिरा गांधी भी एक महिला थीं और उन्होंने पूरा देश चलाया था। 

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपके खेल ने आपके विकास में किस तरीके से योगदान दिया है?

अरुणा : ताइक्वांडो मेरे लिए कोई गेम नहीं है। यह मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। किसी और चीज के बिना मैं रह सकती हूं लेकिन ताइक्वांडो के बिना मैं अब नहीं रह सकती हूं। इसने मुझे अनुशासन सिखाया है जो कि हर गेम में महत्वपूर्ण होता है। इसने मुझे मेरी पहचान दी है, नाम दिया है।

अरुणा ने साल 2017 में शिमला में पैरा नेशनल में स्वर्ण पदक जीतने के बाद साल 2018 में वियतनाम में एशियाई पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में रजत पदक जीता था। 2018 में ही अरुणा ने किमांग कप इंटरनेशनल पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक और ईरान में हुई प्रेसिडेंट कप एशियन रीजन पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में रजत पदक अपने नाम किया था। साल 2019 में तुर्की में विश्व पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में अरुणा ने कांस्य पदक जीता था, जहां वह वर्ल्ड नंबर वन यूक्रेन की विक्टोरिया मारचुक से हारी थीं। इसके बाद उन्होंने 2019 में ही एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक के अलावा इसी वर्ष राष्ट्रीय खिताब भी जीता। अरुणा की उपलब्धियों को देखते हुए चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने मशहूर अंतर्राष्ट्रीय पैरा एथलीट और अर्जुन अवार्ड विजेता रमेश टीकाराम जो कि पैरा बैडमिंटन के पिता भी कहे जाते हैं, उनके नाम पर एक स्पेशल स्पोर्ट्स स्कॉलरशिप देने की शुरुआत की है। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी में पैरा एथलीटों के लिए स्पोर्ट्स कैटेगरी के अंदर 25 सीटें भी आरक्षित की जाएंगी।

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तस्वीर साभार : IndiaTimes

मेरा नाम पारुल शर्मा है। आईआईएमसी, नई दिल्ली से 'हिंदी पत्रकारिता' में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और गुरु जांबेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। शौक की बात करें तो किताबें पढ़ना, फोटोग्राफी, शतरंज खेलना और कंटेंपरेरी डांस बेहद पसंद है।

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