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समकालीन समय में हम देख रहे हैं कि कैसे हर सामाजिक, राजनीतिक गतिविधि में आर्ट की अहम भूमिका होती है जो जन मानस तक बहुत सरल तरीके से अपनी बात पहुंचाने में मदद करती है। इस लेख के माध्यम से हम आर्ट की भूमिका को नारीवादी आंदोलन के परिपेक्ष्य में देखेंगे और समझेंगे कि कैसे नारीवादी चश्मा न सिर्फ आर्ट को देखने की हमारी नज़र बदलता है बल्कि आर्ट को भी बदल देता है। नारीवादी आंदोलन की पहली लहर मध्य उन्नीसवीं सदी में शुरू हुई, महिलाओं के समान अधिकारों के संघर्ष के लिए जिसमें वोट के अधिकार के लिए वूमेन सफरेज मूवमेंट शुरू किया गया जिसके परिणामस्वरूप साल 1920 में ये अधिकार महिलाओं के हिस्से उनके वर्ग और नस्ल के आधार की शर्त पर आया। इस समय तक कोई भी फेमिनिस्ट आर्ट अपने अस्तित्व में नहीं आया था लेकिन इस पूरी लहर ने 1960-70 के दशक के एक्टिविज्म और आर्ट के लिए एक ग्राउंड तैयार कर दिया था।

इस नारीवादी आंदोलन और नारीवादी सिद्धांत से प्रभावित महिला कलाकारों द्वारा साल 1970 में नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर में अमरीका, यूरोप समेत स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, कैनेडा और लातिनी अमरीका में फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट शुरू किया गया। जब हम फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट की बात कर रहे हैं तो पहले ये समझते हैं कि फेमिनिस्ट आर्ट या नारिवादी कला किसे कहते हैं? 1960 दशक के आखिरी वक्त और 1970 दशक के शुरुआती दौर में फेमिनिस्ट मूवमेंट के अंतर्गत फेमिनिस्ट आर्ट थियरी में क्रमागत उन्नति के लिए महिला कलाकारों द्वारा बनाया गया आर्ट जिसमें वे महिला होने की वजह से उनके साथ घटित सामाजिक और राजनीतिक भेदभावों को दर्शा रही थीं, फेमिनिस्ट आर्ट कहा जाता है। ये आर्ट पेंटिंग से लेकर, परफॉर्मिंग, विजुअल, बॉडी आदि रूपों के माध्यम से आंदोलन का हिस्सा बने।

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फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट क्या है?

फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट महिलाओं द्वारा किया गया वह आंदोलन था जिसमें वे अपने अथक प्रयासों से आर्ट में व्याप्त जेंडर स्टीरियोटाइप को तोड़ती हैं, उन्हें बदलकर और एक नई रूप-रेखा देती हैं। ऐसी आर्ट की रचना की जा रही थी जो औरतों के जीवन और अनुभवों को लोगों तक पहुंचाए जिससे आर्ट के इतिहास में उन्हें अपने हिस्से की जगह मिले। सबसे महत्वपूर्ण आर्ट पर पुरुष आधिपत्य यानि पुरुष कलाकारों के हिस्से सब मौके एवं औरतों पर आर्ट भी मेल गेज से बनाई जा रही थी, वे इसे चुनौती दे रही थी और पुरुष कलाकारों से अलग अनॉर्थोडॉक्स तरीकों का इस्तेमाल कर आर्ट में अलग-अलग तरह से प्रयोग किए गए। जैसे टेक्सटाइल, परफॉर्मेंस, वीडियो आदि जो अक्सर पुरुष कलाकारों ने नहीं किए थे। वे स्कल्पचर, पेंटिंग पर ही ज्यादा निर्भर थे लेकिन महिलाओं के इस मूवमेंट ने फाइन आर्ट को बढ़ने का, फैलने का मौका दिया इस तरह आर्ट की नींव को ये मूवमेंट बदल रहा था जिसे पुरुषों ने गढ़ा था। 

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जिस आर्ट के क्षेत्र में महिलाएं उनके जेंडर की वजह से, राजनैतिक रूप से असक्षम समझे जाने की वजह से आगे नहीं आने दिया जा रहा था जब उन्होंने आंदोलन किए और आर्ट में पुरुषवाद को चुनौती दी तब न सिर्फ आर्ट को फेमिनिस्ट लेंस से देखे जाने का नजरिया पैदा हुआ बल्कि आर्ट में तमाम ऐसे बदलाव हुए जिसे पुरुष सोच भी नहीं सकते थे।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले महिलाएं आर्ट नहीं बना रही थीं। वे अपने निजी जीवन में छिपकर आर्ट बना रही थीं लेकिन मुख्यधारा में उन्हें जगह नहीं दी जा रही थी, उनके लिए कोई आर्ट आयोजन, गैलरी एग्जीबिशन नहीं कराया जा रहा था इसी वजह से पब्लिक डोमेन में वे दिख भी नहीं रही थीं लेकिन नारीवादी आंदोलन के उदय से इसके रास्ते खुलने लगे। प्रोटो फेमिनिस्ट (उन महिला कलाकारों की जीवनी या काम जिन्होंने 1970 दशक के फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट को प्रभावित किया) लुइस बोरगीस (1911-2010) और जर्मन अमेरिकी ईवा हेस्से (1936-1970) वे नारीवादी कलाकार थीं जिनके काम काल्पनिक रूप से महिला के शरीर के इर्द-गिर्द, निजी जीवन के अनुभव और घरेलूपन को लेकर थे चाहे खुद उन्होंने ज़ोर देकर अपनी कला को नारीवाद से जोड़ा हो या नहीं। 

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नारीवाद की दूसरी लहर के वक्त प्रोटो फेमिनिस्ट जिन विषयों को लेकर काम कर रही थीं उन विषयों को व्यापक रूप देते हुए उन्हें जेंडर इक्वॉलिटी के संघर्ष से जोड़ा और आंदोलन के उद्देश्य को बताने, समझाने के लिए इनके कामों का इस्तेमाल किया गया। जब आंदोलन फैलने लगा तब इसी 1970 के दशक में न्यूयॉर्क शहर जहां आर्ट गैलरी, म्यूज़ियम आदि अच्छी तरह स्थापित थे वहां महिला कलाकार इस बात को लेकर चिंतित थीं, विचार कर रही थीं कि कैसे उन आर्ट संस्थानों में बराबर हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए।

ऐसा करने के लिए उन्होंने संगठन का रास्ता चुना। महिला कलाकारों ने अलग-अलग तरह के वूमेन आर्ट ऑर्गेनाइजेशन बनाए जैसे आर्ट वर्कर्स कोलिशन, वूमेन आर्टिस्ट इन रिवोल्यूशन (वार) और एआईआर गैलरी बनाए जिसके माध्यम से वे कलाकार समुदाय में अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें, अपनी बात, मांग को रख सकें। इन सभी संगठनों ने मिलकर म्यूज़ियम सिस्टम जैसे म्यूज़ियम ऑफ मॉडर्न आर्ट और द व्हिटनी के खिलाफ अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए आंदोलन किए और परिणामस्वरूप महिला कलाकारों की हिस्सेदारी 1969 में 10 प्रतिशत से 1970 में 23 प्रतिशत तक बढ़ी। 

जूडी शिकागो और मिरियम स्कपिरो

वहीं, कैलिफोर्निया में महिला कलाकार पहले से स्थापित संस्थानों में अपने अधिकार, अपने प्रतिनिधित्व के लिए लड़ने की बजाय खुद की अलग संस्थाएं बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। साल 1972 में महिला कलाकार जूडी शिकागो और मिरियम स्कपिरो ने फेमिनिस्ट आर्ट प्रोग्राम की नींव रखते हुए प्रोजेक्ट वूमेनहाउस का आयोजन किया।

 

जूडी शिकागो और मिरियम स्कपिरो , तस्वीर साभार :Los Angles Times

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जूडी शिकागो फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट की पायनियर में से एक रही हैं। उनकी आर्ट डिनर पार्टी फेमिनिस्ट आर्ट की मास्टरपीस श्रेणी में रखी जाती है। इस आर्ट के माध्यम से जूडी महिलाओं द्वारा इतिहास में अपने बूते कमाई गई उपलब्धियों को दर्शाती हैं, और कैसे आर्ट के इतिहास से औरतों को गायब किया गया, उसके इंटरप्रेटेशन को जगह नहीं दी गई को चुनौती देती हैं। मिरियम स्कपीरो की आर्ट ‘फेमेज’ (किसी और मटेरियल को टेक्सटाइल से जोड़कर बनाया गया आर्ट) मूवमेंट में आर्ट को एक नया रूप देती है। सिलाई, बुनाई जैसा काम जो औरतों के काम कहे जाते थे, अब भी कहे जाते हैं और निम्न समझे जाते हैं जिन्हें इसी वजह से फाइन आर्ट की श्रेणी में कभी नहीं रखा गया मिरियम ने उनका इस्तेमाल कर आर्ट तैयार किए जिन्हें ऑयल पेंटिंग, क्लासिकल ड्राइंग के बराबर ला खड़ा कर दिया। डॉलहाउस उनका ऐसा ही एक आर्ट वर्क है। जब हम आज धागे की आर्ट या अन्य ऐसी आर्ट देखते हैं तो ये याद करना चाहिए कि मिरियम और तमाम आर्ट फेमिनिस्ट ने इस फाइन आर्ट का स्कोप बढ़ाया था।  

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मूवमेंट के दौरान आर्ट पर पौरुष दबदबे को तोड़कर रख दिया था 1972 में मैरी बेथ एडल्सन ने। उन्होंने लियोनार्डो डा विंची का ‘द लास्ट सपर आर्ट’ का पुनर्निर्माण किया नारीवादी पर्सपेक्टिव का इस्तेमाल कर। लियोनार्डो डा विंची के आर्ट में जहां सिर्फ पुरुष ही पुरुष दिखते हैं, मैरी बेथ ने उन सभी पुरुषों के सर को महिला कलाकारों के सर से बदला, क्राइस्ट का सर जियोर्जिया ओ ‘ कैफे से बदला और इस तरह ये आर्ट फेमिनिस्ट आर्ट की आइकॉनिक आर्ट बनी। ये आर्टवर्क सिर्फ इसीलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि ‘बॉयज क्लब’ को चुनौती दी गई बल्कि धर्म के अंतर्गत जिस तरह औरत का दमन किया जाता है उसको भी दर्शाता है। 

मैरी बेथ एडल्सन, तस्वीर साभार: The Art News

बदलाव वक्त की मांग होता है, अगर नहीं किया जाता तो बढ़ते वक्त के साथ चीज़ें अपना महत्व खो देती हैं। 1970 के दशक से गुजरते हुए ये मूवमेंट 1980 में कदम रखता है जब पोस्टमॉडर्निज्म पॉलिटिकल थियरी में आ चुका था। इस दौर में फेमिनिस्ट आर्ट इंडिविजुअलिज़म की ओर बढ़ते हुए महिला जीवन के सेक्सुअल, मटेरियल, सामाजिक और राजनैतिक हिस्सों को दर्शाने लगा। औरतों का शरीर इसका केंद्र रहा जैसा कि 1970 से एकदम उलट था। हालांकि ऐसा नहीं था कि आर्ट अब सामूहिक संघर्ष को नहीं दिखा रहा था और महिलाओं की सब मांगें पूरी हो चुकी थीं। इसी दशक के साथ आइडेंटिटी या अस्मितावादी आर्ट और एक्टिविस्ट आर्ट अपने अस्तित्व में आया जिसमें गुरिल्ला गर्ल्स अहम स्थान रखती हैं। साल 1985 में बना ये समूह आर्ट क्षेत्र में सेक्सिज्म के खिलाफ अपनी पहचान छिपाते हुए गुरिल्ला मास्क पहनकर लड़ता था, आंदोलन करता था। जेनी होल्जर और बारबरा क्रूगर 1980 दशक की महत्वपूर्ण फेमिनिस्ट आर्टिस्ट थीं जिन्होंने डिजिटल आर्ट पर फोकस किया और राजनीति के तमाम पेचीदा विषयों को सरल और आकर्षित ढंग से नारों में तब्दील किया, 1970 में जिस तरह पुरुष महिला के बीच भेदभाव आर्ट का केंद्र था अब उस पर केंद्र न होते हुए नए नए एक्सपेरिमेंट कर अलग से महिला कलाकार जगहें बनाने लगी थीं।

बीसवीं सदीं के मध्य तक ये आंदोलन स्वीडन, डेनमार्क, रशिया, जापान, एशिया, अफ्रीका, ईस्टर्न यूरोप समेत विश्व भर में फैला जिसे आज हम समकालीन आर्ट के रूप में जानते हैं। जिस आर्ट के क्षेत्र में महिलाएं उनके जेंडर की वजह से, राजनैतिक रूप से असक्षम समझे जाने की वजह से आगे नहीं आने दिया जा रहा था जब उन्होंने आंदोलन किए और आर्ट में पुरुषवाद को चुनौती दी तब न सिर्फ आर्ट को फेमिनिस्ट लेंस से देखे जाने का नजरिया पैदा हुआ बल्कि आर्ट में तमाम ऐसे बदलाव हुए जिसे पुरुष सोच भी नहीं सकते थे। मसलन बॉडी आर्ट, विजुअल, बुनाई, अलग अलग कपड़े का इस्तेमाल कर के बनाई जाने वाली आर्ट। आज के समय के आर्टिस्ट जब नारीवाद को कोसते नज़र आते हैं तब उन्हें ये इतिहास पढ़ने की जरूरत है कि जो भी आर्ट में आज बेहतरीन विकास हुआ है वो नारीवादी आंदोलन की देन है।

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संदर्भ:

The Art Story
Art Finder
Rise Art

फीचर्ड तस्वीर साभार : Art Space

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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