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शहीद मीना किश्वर कमाल के दास्तान किसी रोचक कहानी से कम नही है। वह एक अफ़ग़ानी फेमिनिस्ट, क्रांतिकारी और राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में आज तक याद की जाती हैं। उन्होंने अपने क्रांतिकारी सोच को कविता की शक्ल भी दी। साल 1956, काबुल में मीना का जन्म अनेक सामाजिक गतिविधियों और जन आंदोलनों के बीच हुआ। छोटी उम्र से ही उनका समाज सुधारक कार्यों की तरफ एक झुकाव बना रहा। अपनी उच्च शिक्षा उन्होंने आधे में छिड़ दी ताकि वे पूरे तन- मन से समाज सेवा में अपना योगदान दे सकें।

महिलायों के सशक्तिकरण के लिए उन्होनें साल 1977 में, अपनी उच्च शिक्षा के दौरान ही, उन्होंने रेवोल्यूशनरी एसोसिएशन ऑफ द वीमेन ऑफ अफ़ग़ानिस्तान (RAWA) नाम से एक संस्थान की स्थापना की, जिससे वंचित व खामोश औरतों को आवाज़ मिल सके। इस संस्थान के माध्यम से महिलाओं को आगे आकर अपनी बात रखने का हक मिला। RAWA में हर औरत के समानता और शिक्षा की अहमियत दी गयी। सौर क्रांति के बाद भी मीना को लगा कि महिलाओं के शोषण में कोई अभाव नहीं आया है, तब ही साल 1979 में उन्होंने सरकार और रूसी फौज के विरुद्ध आंदोलन चलाया, जिसके चलते उन्होंने स्कूलों, कॉलेजों और काबुल यूनिवर्सिटी में ढेरों धरने औए बैठकें आयोजित किया।

साल 1981 में उन्होंने एक द्विभाषीय पत्रिका निकली- पयाम-ए-ज़न (महिलायों का संदेश) जो कट्टरपंथी संगठनों के गुनाहों को लगातार प्रहार करती रही। कई ‘वतन स्कूल’ स्थापित करके उन्होंने रिफ्यूजी बच्चों और माओं को शरण दी। इन स्कूलों के ज़रिए ज़रूरतमंद बच्चों और महिलाओं को अस्पताल की सेवाएं, स्किल डेवलपमेंट और आर्थिक मदद पाने के अवसर भी प्रदान किये गए।

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देश-विदेश जाकर मीना ने अपनी आवाज़ रखी। साल 1981 में फ़्रांसीसी सरकार के न्योते पर उन्होंने फ्रांस जाकर फ़्रांसीसी सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस में अफ़ग़ान रेजिस्टेंस मूवमेंट की चर्चा की। वहाँ मौजूद बोरिस पोनोमारेव (रूसी कम्यूनिस्ट पार्टी के राजनेता) की नेतृत्व में आई सोवियत डेलीगेशन ने शर्मिंदा होकर हॉल छोड़ दिया और दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मीना ने खुशी से अपने हाथ से विक्ट्री साइन बनाकर लोगों का अभिवादन किया।

वे कहती थीं कि, ‘अफ़ग़ानी महिलाएं सोते हुए शेरों की तरह हैं जो जगाने पर सामाजिक क्रांति में अद्भुत किरदार निभा सकती हैं।’

मीना का विवाह अफ़ग़ानिस्तान लिबरेशन आर्गेनाईजेशन के लीडर फ़ैज़ अहमद से हुआ। दोनो के तीन बच्चे हैं, जिनका पता फिलहाल किसी को नहीं मालूम है। फ़ैज़ अहमद को मुजाहिदीन लीडर गुलबुद्दिन हेकमतयार द्वारा मरवा दिया गया। तीन महीने बाद ही, फरवरी 1987 में, मीना की पाकिस्तान में हत्या कर दी गयी। हत्यारों का ठीक पता नहीं है, लेकिन अटकलें लगाई जाती हैं कि या तो अफ़ग़ान इंटेलिजेंस सर्विस ‘KHAD’ या गुलबुद्दिन के ही एजेंट्स द्वारा मरवाया गया। साल 2002 में पाकिस्तान में मीना की हत्या के लिये दो आदमियों को फांसी की सज़ा मिली।

मीना जैसी जज़्बाती और बहादुर महिलाओं का इतिहास हमेशा आभारी रहेगा। उनकी संस्थान RAWA आज भी चलन में है और उनके इस संस्थान को समर्पित 12 साल का त्याग आज भी याद किया जाता है। उनका अटूट विश्वास था कि निरक्षरता, जानकारी के अभाव, कट्टरपंथी विचारधारा, और भ्रष्टाचार के बावजूद भी महिलाओं को उनका लोकतांत्रिक अधिकार ज़रूर मिलेगा।

वे कहती थीं कि, ‘अफ़ग़ानी महिलाएं सोते हुए शेरों की तरह हैं जो जगाने पर सामाजिक क्रांति में अद्भुत किरदार निभा सकती हैं।’

साल 2006 में टाइम मैगज़ीन ने मीना को 60 एशियाई हीरोज़ की सूची में शामिल किया और लिखा, ‘हालांकि वे सिर्फ 30 साल की थीं जब उनकी हत्या हुई, मीना ने पहले ही अफ़ग़ान महिलाओं के अधिकार के आंदोलन के बीच बो दिए थे।’

अपनी कविता, ‘मैं कभी पीछे नहीं लौटूंगी’ में वे लिखती हैं –

मेरा पुनर्जन्म हुए है
आज़ादी और साहस के महाकाव्यों के बीच
मैंने सीखे हैं आज़ादी के तराने
आख़िरी साँसों के बीच
लहू की लहरों और विजय के बीच
ऐ मेरे देश के लोगों, ऐ भाई
मैं अब वह नहीं जो हुआ करती थी
मैं वह औरत हूँ जो जाग उठी है
मुझे अपनी राह मिल गयी है
और मैं अब कभी पीछे नहीं लौटूँगी

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तस्वीर साभार : poshampa.org

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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