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‘सड़क पर तीन तरह के प्राणियों से बच कर रहिएगा,’ मेरे ड्राइविंग इंस्ट्रक्टर ने मज़ाक करते हुए कहा। ‘कौन-कौन?’ स्टीयरिंग व्हील थामे, मैंने भी बड़ी उत्सुकता से पूछा। ‘छोटे बच्चे, जानवर, और औरतें! ये लोग कब किस दिशा में मुड़ जाएं, कोई भरोसा नहीं!’ इतना कहकर वह इतनी ज़ोर से हंसे मानो उन्होंने दुनिया का सबसे बेहतरीन चुटकुला सुना दिया हो। मैं हैरान थी। इतने में एक लड़का, बिना दायें-बायें देखे, ठीक मेरी गाड़ी के सामने से अपनी बाइक फटाक से निकालकर ले गया। मैंने अंकल से कहा,’देखा अंकल! लड़के भी लापरवाही कर सकते हैं। कोई भी कर सकता है। आपने औरतों के बारे में ही ऐसा क्यों कहा?” अंकल फिर हंसे जैसे कि मैंने दुनिया का दूसरा सबसे बेहतरीन चुटकुला सुनाया हो और मुझसे माफी मांगते हुए कहा, “सॉरी, सॉरी, आपने तो पर्सनली ले लिया।’

ऐसे ही कई किस्से याद आते हैं जहां औरतों को ख़राब ड्राइवर मानने की धारणा पुरुषों के ज़हन में घर कर बैठी रहती है। मसलन, मेरे गणित के अध्यापक इतिहास की अध्यापिका को गाड़ी चलाता देखकर डर जाते थे और उनके आगे-पीछे चलनेवालों के लिए सलामती की दुआ करते थे! पितृसत्तात्मक विचारधारा से प्रेरित ऐसी कई बेतुकी धारणाएं अधिकतम पुरुषों के दिमाग पर हावी होती हैं। अक्सर ड्राइविंग करनेवाली लड़कियों को सुनने को मिलता है, ‘घरवाले गाड़ी चलाने देते हैं? लड़की होकर बाइक चला लेती हो? ड्राइविंग करने में डर नहीं लगता? रिवर्स गियर लगाना आता है ?’

ऐसे में सवाल उठता है कि महिलाएं ड्राइविंग नहीं कर सकतीं आखिर यह धारणा कहां से पैदा हुई। माइकेल बर्जर की एक थ्योरी के हिसाब से ऐसा माना गया है कि 1920 के दशक में अमेरिकी पुरुषों को यह डर था कि महिलाएं ड्राइविंग सीखकर उनकी जितनी स्वतंत्रता का अनुभव कर सकती हैं, जो कि पुरुषों को एकदम मंज़ूर नहीं था। इसलिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत महिलाओं को घरेलू कामकाज तक सीमित रखने की भरपूर कोशिश की गई।

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हमें सड़क पर कितनी महिलाएं ड्राइव करती दिखती हैं? रोड ट्रांसपोर्ट ईयरबुक (2015-2016) के हिसाब से भारत में सिर्फ 11 फीसद महिलाएं ही ड्राइव करती हैं। ये आंकड़े ये भी बताते हैं कि हमारी सड़कों पर, पब्लिक स्पेसेज़ में महिलाओं की मौजूदगी कितनी कम है। अधिकतर घरों में सिर्फ एक गाड़ी होती है जिसकी कमान हमेशा पुरुषों के हाथ में होती है। अमीर, उच्च वर्गीय घरों में भी, लड़की को गाड़ी चलाने देने के बजाय एक ड्राइवर रखना ज़्यादा मुनासिब माना जाता है। सऊदी अरब में औरतों की ड्राइविंग पर लंबे समय से रोक लगी हुई थी जिसे 24 जून 2018 को हटाया गया। तब से हर साल 24 जून को ‘इंटरनेशनल वीमन ड्राइवर्स डे’ मनाया जाता है।

पितृसत्तात्मक सोच बनाम आंकड़े

पुरुष महिलाओं को ड्राइविंग में काम आंकते हैं। महिलाएं गाड़ी संभलकर नहीं चला पातीं और ज़्यादा दुर्घटना होने की संभावना रहती है ये पितृसत्ता द्वारा गढ़े गए नैरेटिव हैं। न्यू यॉर्क सिटी ट्रैफिक स्टडी के मुताबिक 80 फीसद सड़क दुर्घटनाओं में पुरुष ड्राइविंग करते पाए गए। साथ ही पुरुष ड्राइवर महिलाओं से लगभग तीन गुना ज़्यादा ट्रैफिक सिग्नल तोड़ते हैं। नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के साल 2019 के आंकड़ों के मुताबिक सड़क दुर्घटना में हुई 4.2 लाख मौतों में 3.4 लाख पुरुष शामिल थे, जबकि महिलाओं का आकंड़ा सिर्फ 81,000 था।

जब किसी पुरुष से सड़क हादसा होता है तो यह उसका निजी मामला होता है, सिर्फ उसकी भूल मानी जाती है। वहीं, किसी औरत से कुछ गड़बड़ी हो जाती है तो सारी औरतों को ही जेंडर के आधार पर खराब ड्राइवर साबित कर दिया जाता है।

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सड़कों पर महिलाओं को असहज करना

ऐसा अक्सर देखा गया है कि अगर कोई महिला ड्राइव कर रही है तो सामान्य से ज़्यादा नज़रें उन पर होती हैं। पुरुष खुद आड़ी-तिरछी गाड़ी चलाएंगे और ज़रा सी गलती होने पर आपको ऐसे घूरेंगे जैसे गलती महिला की ही हो। लड़कियों को बाइक चलाता देखकर उन पर भद्दी टिप्पणियां किया जाना भी हमारे समाज में आम है। साफ तौर पर महिलाओं को बुरा ड्राइवर मानने के पीछे कोई तथ्य नहीं, सिर्फ पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी मानसिकता है।

बेहतर सुविधाओं की दरकार

अन्य समस्याओं और चुनातियों के बीच काम महिला ड्राइवर होने का एक और प्रमुख और गंभीर कारण है, उचित शौचालयों का न होना। उचित सुविधाओं के न होने से महिलाएं ड्राइविंग नहीं कर पातीं। कई महिला टैक्सी ड्राइवर बताती हैं कि बेहतर सुविधा न होने के डर से वे पानी ही नहीं पीती। मुम्बई में फोरशे (Forsche) महिलाओं द्वारा दी जाने वाली टैक्सी सुविधा की संस्थापक रेवती रॉय बताती हैं कि उन्होंने मुम्बई एयरपोर्ट पर काम करनेवाले कर्मचारियों के लिए शौचालय की सुविधा मुफ्त करवाई। ऐसा करना उन्हें एक छोटी जीत हासिल करने जैसा लगा। सड़क पर सबको समान अवसर और सुरक्षा देने के लिए उचित सुविधाओं, शौचालय आदि, इन सब का होना बेहद ज़रूरी है।

समानता का सफर अभी लंबा है

जब किसी पुरुष से सड़क हादसा होता है तो यह उसका निजी मामला होता है, सिर्फ उसकी भूल मानी जाती है। वहीं, किसी औरत से कुछ गड़बड़ी हो जाती है तो सारी औरतों को ही जेंडर के आधार पर खराब ड्राइवर साबित कर दिया जाता है। ड्राइविंग करना कोई जेंडर आधारित काम नहीं बल्कि कौशल पर आधारित काम है। फिर क्यों महिलाओं पर इतने सवाल उठते हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलकर औरतों को अभी और आगे बढ़ना है और बिना झिझक के स्टीयरिंग व्हील थामनी है।

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तस्वीर साभार : Global Giving

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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