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पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) एक जेनेटिक, हार्मोनल, मेटाबोलिक और प्रजनन संबंधी स्थिति है जो अक्सर महिलाओं, लड़कियों, नॉन बाइनरी, ट्रांस महिलाओं को प्रभावित करता है। हालांकि पीसीओएस एक आम समस्या है, लेकिन इसके इलाज के बारे में लोगों में, विशेषकर महिलाओं में जानकारी और जागरूकता की कमी है। अक्सर, इस स्थिति के बारे में पता लगाने या इलाज शुरू करने में बहुत देर हो जाती है। अमूमन लोग डॉक्टर के पास उस चरण में पहुंचते हैं जब यह स्थिति गंभीर लक्षण दिखाने लगती है। लोगों के बीच इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने और समय पर इलाज शुरू हो, इसलिए सितंबर के महीने को ‘अंतरराष्ट्रीय पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम जागरूकता महीने’ के रूप में मनाया जाता है।

पीसीओएस लोगों में मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज़, हृदय रोग और एंडोमेट्रियल कैंसर सहित कई दूसरी गंभीर बीमारियों के आसार को बढ़ाता है। भारतीय बहुराष्ट्रीय डायग्नोस्टिक कंपनी मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड ने भारत में युवा महिलाओं में पीसीओएस के प्रवृति को जानने और समझने के लिए पीसीओएस पर एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन के अनुसार भारत में हर पांच में से एक महिला पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम से पीड़ित है। मेडिकल पत्रिका द लैनसेट के अनुसार पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम से दुनिया भर में हर 15 में से एक महिला को प्रभावित करता है।। पीसीओएस में शरीर की कई प्रणालियां प्रभावित होती हैं, जिसके वजह से कई दूसरी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। पीसीसोएस से ग्रस्त लोगों में अनियमित पीरियड्स, बांझपन, शरीर या चेहरे पर अत्यधिक बाल का उगना, मुंहासे, मोटापा या गर्दन के पीछे, बगल या स्तनों के नीचे त्वचा के काले होने या धब्बों की शिकायत हो सकती है।

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हालांकि पीसीओएस एक आम समस्या है, लेकिन इसके इलाज के बारे में लोगों में, विशेषकर महिलाओं में जानकारी और जागरूकता की कमी है। अक्सर, इस स्थिति के बारे में पता लगाने या इलाज शुरू करने में बहुत देर हो जाती है।

पीसीओएस के कारण होने वाली गंभीर समस्याएं

पीसीओएस से ग्रस्त लोगों को अक्सर अनियमित पीरियड्स का सामना करना पड़ता है। इसमें कम, दर्दनाक या लंबे समय तक पीरियड्स हो सकते हैं। पीरियड्स का बिलकुल न होना भी पीसीओएस के लक्षण हो सकते हैं। साथ ही पीसीओएस से पीड़ित लोगों के अंडाशय यानि ओवरी में सिस्ट हो सकते हैं, जिससे ओवरी की नियमित कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। जबकि पीसीओएस वाले सभी लोगों में हाइपरएंड्रोजेनिज़्म नहीं होता है, लेकिन अधिकांश लोग इससे ग्रसित होते हैं। आसान शब्दों में बताएं तो पीसीओएस से ग्रसित लोगों में विशेषकर महिलाओं में एस्ट्रोजन (महिला हार्मोन) का स्तर कम होता है और एण्ड्रोजन (पुरुष हार्मोन) का स्तर ऊंचा। अलग-अलग शोध अनुसार 46 से 85 फीसद महिलाएं इससे प्रभावित होती हैं। इसलिए पीसीओएस से ग्रसित लोगों में आम तौर पर चेहरे और शरीर पर अत्यधिक बाल, मुंहासे या बालों का झड़ना देखा जा सकता है।

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पीसीओएस से ग्रस्त लोगों को अवसाद, चिंता या तनाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या भी हो सकती है। पीसीओएस से प्रभावित लोग अक्सर इंसुलिन प्रतिरोधी होते हैं। हालांकि उनका शरीर इंसुलिन बना सकता है, लेकिन इसका प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं कर सकता जिससे टाइप-2 डायबीटिज़ यानि मधुमेह होने का खतरा बढ़ जाता है। सेंटर फॉर डिसिस कंट्रोल एंड प्रीवेंशन के अनुसार पीसीओएस से ग्रसित आधी से अधिक महिलाएं 40 वर्ष की उम्र तक टाइप-2 डायबीटिज़ से पीड़ित हो जाती हैं। पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को हृदय रोग होने का खतरा अधिक होता है और उम्र के साथ यह जोखिम बढ़ता जाता है।

भारतीय समाज रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक नियमों पर चलता है जहां प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी विषय पर खुलकर चर्चा या बातचीत आज भी वर्जित है। पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम आम तौर पर महिलाओं में पाया जाने वाला प्रजनन आयु में होने वाला एक विकार है। चूंकि आम तौर पर हमारे समाज में पीरियड्स या प्रजनन से जुड़ी बातचीत किसी महिला के चरित्र को तय कर देता है, लक्षण होने के बावजूद महिलाएं इसे तब तक सहती रहती हैं जब तक कि उसके गर्भधारण की बात न हो। महिलाओं में बांझपन का एक आम कारण पीसीओएस भी है।

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पीसीओएस का आर्थिक और भौगोलिक स्थिति से संबंध

पीसीओएस प्रजनन आयु की महिलाओं में पाया जाने वाला सबसे आम हॉर्मोनल विकार है। यह प्रजनन आयु की किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय की महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। प्रमुख डिजिटल अनुसंधान डेटाबेस पबमेड सेंट्रल में छपी एक लेख अनुसार अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, ग्रीस, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और मेक्सिको की महिलाओं में 6 से 9 प्रतिशत के बीच पीसीओएस होने का प्रचलन पाया गया। इस लेख में बचपन में कठिन सामाजिक और आर्थिक स्थिति में रह चुकी शिक्षित महिलाओं पर किए गए शोध के परिणामों को भी बताया गया।

इस लेख के अनुसार अपने जीवन के बाद के समय में, उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी आर्थिक और सामाजिक कठिनाई झेलती महिलाओं का पीसीओएस से एक मजबूत संबंध है। खराब सामाजिक और आर्थिक स्थिति का मोटापे और इंसुलिन प्रतिरोध सहित पीसीओएस के अन्य लक्षणों से भी संबंध पाया गया। इसके अलावा, बचपन में निम्न सामाजिक और आर्थिक स्थिति का डायबीटिज़ और कोरोनरी हृदय रोग से भी संबंध पाया गया। चूंकि पीसीओएस का चिकित्सकीय कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है, संभव है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित महिलाएं अपने शारीरिक कष्ट को नज़रअंदाज़ करने के कारण मोटापा, हृदय रोग या पीरियड की समस्या से जूझना ही उनके लिए आम हो। आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी साधारणतः व्यक्ति को चिकित्सा जैसे मूलभूत अधिकार से भी दूर कर देती है।  

भारत और अमेरिका की पीसीओएस सोसाइटी के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन पर आधारित रिपोर्ट अनुसार पीसीओएस तुलनात्मक रूप से नज़रअंदाज़ किया जाने वाला एक गैर संक्रामक रोग है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में बड़ी संख्या में लोग नींद की कमी, बढ़ते वजन और मोटापे के शिकार हैं। इसके चलते डायबीटिज़, इंसुलिन प्रतिरोध जैसे पीसीओएस से संबंधित कारकों से लोग अधिक ग्रसित हैं। इसके अतिरिक्त, पीसीओएस से पीड़ित महिला पर आर्थिक बोझ के विषय में भी इसमें जानकारी दी गई।

पीसीओस की शुरुआती जांच का खर्च लगभग चार से पांच हज़ार रूपए है। पीसीओएस का परिवार में मां या बहन का पहले से इससे ग्रसित होने से भी गहरा संबंध है। डच प्रकाशक एल्सेवियर के वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रकाशनों के डेटाबेस साइन्स डायरेक्ट में छपे शोध आधारित एक लेख के अनुसार भारत में शहरी और ग्रामीण आबादी में ग्रामीण क्षेत्रों में पीसीओएस से ग्रसित होने का प्रतिशत अधिक नहीं था, लेकिन ग्रामीण आबादी के बीच जागरूकता की कमी पाई गई। निश्चित तौर पर पीसीओएस का इलाज हर मध्य या निम्न वर्ग परिवार के बजट में फिट नहीं हो सकता। इसके साथ-साथ जागरूकता और जानकारी की कमी भारत में बढ़ते पीसीओस मरीजों की ओर इशारा कर रही है। द इकनॉमिक टाइम्स की हेल्थ वर्ल्ड डॉट कॉम में छपी भारतीय वेलनेस ब्रांड ओज़िवा के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 65 फीसद महिलाएं पीसीओस के लक्षणों से अनजान हैं। साफ तौर पर पीसीओएस के बारे में जानकारी, जागरूकता और इलाज के अभाव में आज भी हज़ारों महिलाएं प्रभावित हो रही हैं।

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तस्वीर साभार : Tata Health

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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