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यात्राएं किसी भी इंसान के विकास के लिए बेहद ज़रूरी होती हैं। ये न केवल हमारे व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ाती हैं बल्कि बहुत सारी जानकारियां और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा देती हैं। पर दुर्भाग्य से जब बात महिलाओं के हिस्से की यात्रा की आती है तो उस पर सुरक्षा के नाम पर महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं। महिलाओं की यात्राओं पर पाबंदी उनके विकास को हमेशा प्रभावित करती है।

जब मैंने एक समाजसेवी संस्था में काम करना शुरू किया तब साइकिल से अलग-अलग गाँव की यात्राएं शुरू हुई। इससे पहले गांव की बाक़ी लड़कियों की तरह ही, घर से स्कूल या फिर कोई छोटे-मोटे समान लाने के लिए पास के बाज़ार जाने तक ही यात्राएं सीमित थीं। यूं तो परिवार के साथ जाने का अक्सर मौक़ा मिलता पर अकेले यात्राएं बहुत कम या यह कहूं कि बिल्कुल नहीं किया करती थी। लेकिन जब से मैंने खुद अलग-अलग गाँव अकेले जाना शुरू किया तब से अब तक अपने आत्मविश्वास में काफ़ी बदलाव देखती हूं।

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पहले जब भी गाँव के किसी पुरुष से बात करनी होती तो मैं सहम जाती थी। मेरी आवाज़ धीमी पड़ जाती। कई बार लोग इसका मज़ाक़ भी उड़ाते कि तुम तो किसी आदमी से बात भी नहीं कर पाती। संस्था में काम क्या करती होगी? कभी-कभी लोगों ख़ासकर पुरुषों की ये बातें मुझे निराश करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे अलग-अलग गाँव जाते-जाते और नए-नए लोगों से मिलते-मिलते मेरी हिचक दूर हुई। आज मैं बिना किसी डर और संकोच के नए लोगों से मिलती हूं। अलग-अलग बच्चों और महिलाओं से मिलकर उनके साथ काम करती हूं। सुरक्षा को लेकर भी मैं खुद को पहले से ज़्यादा मज़बूत महसूस करती हूं। ये यात्राएं बहुत छोटी और सीमित हैं। यह ज़रूर है कि मैं आज भी किसी ज़िले की सरहद पार नहीं कर पाई हूं, लेकिन हां अपने परिवार में पितृसत्ता के हिसाब से लड़कियों की यात्राओं और गतिशीलता को अपने क़ब्ज़े में करने के नियमों को ज़रूर पार किया है।

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“यूं तो परिवार के साथ जाने का अक्सर मौक़ा मिलता पर अकेले यात्राएं बहुत कम या यह कहूं कि बिल्कुल नहीं किया करती थी। लेकिन जब से मैंने खुद अलग-अलग गाँव अकेले जाना शुरू किया तब से अब तक अपने आत्मविश्वास में काफ़ी बदलाव देखती हूं।”

पर आज भी गाँव की कई लड़कियों को परिवार और समाज के बताए सुरक्षा के घेरे में सिमटकर रहना पड़ता है। लड़कियों को परिवार द्वारा यूं समेटना उनको शिक्षा और विकास के कई अवसरों से भी वंचित कर देता है। वे अपने मनचाहे स्कूल-कॉलेज में नहीं जा पाती हैं और न ही अपनी मर्ज़ी से कहीं घूम पाती हैं। पितृसत्तामक समाज में हम महिलाओं की यौनिकता, उनकी आज़ादी को हमेशा पुरुषों के माध्यम से बंदिश में रखा जाता है। अपनी मर्ज़ी से घूमना, कहीं आना-जाना या यात्राएं करना, ये सब महिला-यौनिकता से जुड़ा हुआ है। अक्सर गाँव में जब कभी भी महिलाओं के साथ लड़कियों की गतिशीलता पर पाबंदियों की वजह का ज़िक्र करती हूं तो बहुत अजीब-अजीब ज़वाब मिलते हैं। एक बार देईपुर गाँव की एक महिला ने ज़वाब दिया था कि अगर लड़कियों को घूमने छोड़ दिया जाए तो वे आवारा हो जाएंगी और किसी के साथ भागकर शादी कर लेंगी। वहीं, एक दूसरी औरत ने कहा कि अगर गाँव समाज में ये बात फैल जाए कि इसकी लड़की घूमती है और अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आती-जाती है तो उसकी शादी नहीं होगी।

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पितृसत्तामक समाज में हम महिलाओं की यौनिकता, उनकी आज़ादी को हमेशा पुरुषों के माध्यम से बंदिश में रखा जाता है। अपनी मर्ज़ी से घूमना, कहीं आना-जाना या यात्राएं करना, ये सब महिला-यौनिकता से जुड़ा हुआ है।

ये ज़वाब थोड़े अजीब लग सकते हैं पर वास्तव में ये महिलाओं को अपने क़ब्ज़े में रखने के माध्यम हैं। ज़्यादातर जवाबों में चिंता ‘महिला सुरक्षा’ की होती है और सुरक्षा लड़कियों के जान-माल से ज़्यादा उनके द्वारा मनपसंद शादी करने की होती है। उन्हें लगता है कि अगर वे लड़कियों को बाहर नहीं जाने देंगें तो लड़कियां अपनी पसंद से शादी नहीं करेंगी पर अफ़सोस समाज की इस रूढ़िवादी सोच की वजह से महिलाओं की आज़ादी छिनने लगती है। वे पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी कहीं भी आने-जाने में असमर्थ होती हैं। महिलाओं को कभी भी बाहर न जाने देने की यह शुरुआती आदत उन्हें समाज के बाहरी माहौल के लिए तैयार नहीं हो पाती है, जिसकी वजह से वह ज़रूरत पड़ने पर कई बार अपने साथ होने वाली हिंसा और भेदभाव को भी किसी के साथ साझा करने में हिचकती हैं।

हमें समझना होगा कि जब हम महिलाओं के विकास की बात कर रहे है तो उनके विकास के लिए उनकी यात्राएं बेहद ज़रूरी हैं तभी वह अपनी शिक्षा का इस्तेमाल करना सीख पाएंगीं और उसे व्यवहार में ला पाएंगी। इसके साथ ही, महिलाओं की अकेली यात्राएं उन्हें स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि परिवेश चाहे ग्रामीण हो या शहरी महिलाओं को हमेशा यात्राओं के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

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तस्वीर साभार: India Someday

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