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हरियाणा के रोहतक ज़िले से निकली एक लड़की जिसे घर पर यह सिखाया गया था कि तुम्हें ‘अच्छी’ लड़की बनकर रहना है लेकिन वह जान बूझकर ‘बिगड़ी’ हुई लड़की बनना पसंद करती है। किसी लड़के का हाथ पकड़कर साथ चलना, उसे बाहों में भर लेना और आशिकों की तरह चूमना। बेवजह और बेकाम गलियों में घूमना, लड़कों से बातें करना, ये सब पितृसत्तात्मक समाज द्वारा परिभाषित एक ‘अच्छी’ लड़की के काम नहीं हो सकते बल्कि ऐसा ‘बिगड़ी’ हुई लड़कियां ही करती हैं। यह लड़की ढेरों सपने आंखों में संजोए और पंख फैलाए आसमान में उड़ती है और ‘अच्छी’ लड़की न बनकर समाज द्वारा उपेक्षित की जाने वाली ‘बुरी’ लड़की बन जाती है। यह पितृसत्ता को ठेंगा दिखाने में कामयाब होती है। यह लड़की अनुराधा बेनीवाल है जिसने अपने बहुचर्चित यात्रा वृत्तांत ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ में आज़ादी के पंख लगने का शानदार वर्णन किया है।

अनुराधा पुणे में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं और यहीं से वह अपनी पहली उड़ान भरती हैं। देश के कई हिस्सों का एक छोटा सा भ्रमण। इस दौरान वह कई लड़कियों और लड़कों से मिलती हैं। उन्हीं में से रमोना नाम की इक्कीस साल की एक इटालियन लड़की उस पर गहरी छाप छोड़ जाती है। रमोना के अपनी निजी ज़िंदगी को लेकर किए जाने वाले फैसलों में सतर्कता, लड़कों से बातें करना, क्या पहनना चाहिए क्या नहीं ये सब उसके अपने फैसले थे जिन्हें देखकर अनुराधा बिलकुल हैरान हो गई थी। ऐसा इसलिए क्योंकि जिस समाज में अनुराधा पाली बढ़ी थी उसमें ये सभी लक्षण एक अच्छी लड़की होने के नहीं थे। अनुराधा जान चुकी थी कि वह भी अब बुरी लड़की बनना चाहती है। अपने फैसले आप लेना, खाने से लेकर ओढ़ने पहनने तक के, शादी से लेकर सेक्स तक सब निजी जीवन के निजी फैसले हो ऐसा वह समझ चुकी थी।

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लेखिका ने रमोना के साथ बिताए पलों में से एक घटना का ख़ास ज़िक्र किया जिसका उनके दिलों-दिमाग पर गहरा असर पड़ा। अनुराधा लिखती हैं, ‘मैंने तब तक बिकनी में भी कोई लड़की नहीं देखी थी और यहां मेरे सामने रमोना एकदम नंगी खड़ी थी हमारे होने से ऐसे बेपरवाह। जैसे वह भूल गई हो कि कमरे में उसके अलावा हम भी हैं या जैसे कि उसे दूसरे खाने से कपड़े पहनकर निकलने का ध्यान नहीं रहा हो लेकिन नहीं वह हमसे बात करती रही और एक-एक कपड़ा ऐसे पहनती रही, जैसे यह कोई आम बात हो। वह ना तो हमारा वहां होना भूली थी, और ना ही कपड़े पहनना। वह अपनी रोज़मर्रा की सहजता में थी। एकदम कंफर्टेबल! लेकिन मैं? मैं जैसे सब कुछ भूल गई थी! खुद की हालत यह थी कि उसे देख भी लेना चाहती थी और नहीं भी देखना चाहती थी यह उसकी सुंदरता का सम्मान था।’

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अपनी किताब के साथ अनुराधा बेनीवाल, तस्वीर साभार: Indian Women Blog

ब्रा की स्ट्रैप तक को छिपाने वाली लड़की के सामने एक लड़की बगैर किसी कपड़े निसंकोच खड़ी थी; खुली हुई, सजीव और स्वाभाविक। मेरा स्कार्फ जो मैंने अपनी टाइट टीशर्ट पर ढक रखा था मेरा मजाक उड़ा रहा था। मेरी ब्रा का हुक मेरी पीठ में चुभने लगा था। कपड़े पहनते हुए वह हमसे बातें किए जा रही थी लेकिन मुझे उसकी आवाज़ सुनाई पड़ना बंद हो गई थी। बस कानों में एक गूंज भर उतर रही थी। एक भीनी भीनी खुशबू ने मुझे चौतरफा घेर लिया था।। शायद यह आज़ाद आदम इच्छाओं की खुशबू थी जिसे मैं प्राणों में सोते हुए महसूस कर रही थी उसने मेरे भीतर कुछ बदल दिया उस पल इतने सालों से अच्छी लड़की बने रहने की मेरी सारी मेहनत पर खुशबू फिर गई, एकदम पानी की तरह ‘ i was corrupted! ‘ मुझे अपने सामने सिर्फ वही लड़की नहीं दिखी थी जो देश की इज्ज़त को कपड़ों में समेटकर नहीं जीती मुझे व्यक्तित्व की ऐसी आज़ादी दिखी थी जिसमें शरीर लज्जा और इज्ज़त की गडमग ग्रंथियों से परे था।’

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कुछ दिनों बाद उसकी सहेली रमोना अपने देश वापिस चली गई और अनुराधा के लिए कई सवाल छोड़ गई। अब लेखिका जिंदगी को अपने हिसाब से जीना चाहती है और एक लंबी कोशिश के बाद अपने वर्ल्ड टूर पर निकल पड़ती हैं। उसे ना पैसों की परवाह होती है, ना ठिकानों की और ना राह भटकने की। इस घुमक्कड़ी के दौरान उसने लंदन, पेरिस, ब्रसल्स, एम्सटर्डम, बर्लिन, प्राग, ब्रातिस्लावा, बुडापेस्ट, म्यूनिख, इन्नसब्रुक्क और बर्न की यात्रा पूरी की। सबसे मुख्य बात कि वह एक भी दिन किसी होटल या हॉस्टल में नहीं रुकी बल्कि हर नए शहर या देश में नए लोकल परिवारों के पास रुकी। उनका मानना है कि यदि कोई शहर को करीब से जानना और जीना है तो होटल में नहीं बल्कि लोकल लोगों के पास रुको ताकि वहां के खानपान, रहन- सहन, लोक व्यवहार आसानी से समझ आ सके। 187 पन्नों की यह किताब घर बैठे अनुराधा के साथ विश्व घूमने जैसा महसूस करवाने में सफल रही है। किताब का आख़िरी पन्ना पढ़ने तक इसे पढ़ते रहने को ही मन करता है। मैंने दूसरे ही दिन इसे पूरा पढ़कर दोबारा पढ़ना शुरू कर दिया था। लेखिका पुरुषवाद की दीवार नहीं गिराती बल्कि उन पर कीलें ठोक कर चुपके से उनपर पांव रख दीवार फांदती है।

किताब के अब अंत में लेखिका द्वारा हमवतन लड़कियों के नाम एक पैगाम भी दिया गया है। ‘मेरी ट्रिप यहीं खत्म होती है लेकिन मेरी यात्रा अभी शुरू हुई है और तुम्हारी भी। तुम चलना। अपने गांव में नहीं चल पा रही तो अपने शहर में चलना। अपने शहर में नहीं चल पा रही तो अपने देश में चलना। अपना देश भी मुश्किल करता है चलना तो यह दुनिया भी तेरी ही है, अपनी दुनिया में चलना। लेकिन तुम चलना। तुम आजाद बेफिक्र, बेपरवाह, बेकाम, बेहया हो कर चलना। तुम अपने दुपट्टे जलाकर, अपनी ब्रा साइड से निकालकर, खुले फ्रॉक पहन कर चलना। तुम चलना जरूर! तुम चलोगी तो तुम्हारी बेटी भी चलेगी, और मेरी बेटी भी। फिर हम सबकी बेटियां चलेंगी। और जब सब साथ चलेंगी तो सब आजाद, बेफिक्र, बेपरवाह ही चलेंगी। दुनिया को हमारे चलने की आदत हो जाएगी।’

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रवि सम्बरवाल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र से बीए मास कम्युनिकेशन में अंतिम वर्ष के छात्र हैं। इन दिनों स्वतंत्र लेखन जीवन का हिस्सा है। किताबें पढ़ने का शौक है। वह जाति विरोधी, आंबेडकरवादी, पत्रकार हैं। आप उन्हें फेसबुक पर फॉलो कर सकते हैं।

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