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अमेरिका के एक शीर्ष अस्पताल क्लीवलैंड क्लीनिक के शोधकर्ताओं नें स्तन कैंसर पर रोक लगाने के लिए एक नये टीके का ट्रायल शुरू कर दिया है। यह टीका स्तन कैंसर को रोकने के लिए बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर को रोकना है। यह कैंसर का सबसे आक्रामक और घातक रूप है। यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने हाल ही में क्लीवलैंड क्लीनिक और उसके सहयोगी एनिक्सा बायोसाइंसेज़ को वैक्सीन के लिए नयी दवा के अध्ययन करने की अनुमति दी है। क्लीवलैंड क्लिनिक के रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्राइमरी वैक्सीन आविष्कारक और स्टाफ इम्यूनोलॉजिस्ट विंसेंट टुहे के अनुसार, “यह टीका स्तन कैंसर को रोकने के नये तरीकों का प्रतिनिधित्व करता है।”

इस ट्रायल की क्यों है ज़रूरत                             

स्तन कैंसर के सभी मामलों में से 12 से 15 फीसद केस ट्रिपल-नेगेटिव कैंसर के होते हैं। यह स्तन कैंसर का सबसे भयानक प्रकार होता है। इस स्तन कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या भी बहुत अधिक होती है और इसके दोबारा होने की संभावना की दर भी अधिक है। इसके सबसे अधिक मामले अफ्रीकन और अमेरिकन देशों की महिलाओं में सामने आते हैं। इसके अलावा बीआरसीए-1 जीन वाली 70 से 80 प्रतिशत महिलाओं में ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर होने का खतरा रहता है। कैंसर के इस खतरनाक प्रकार से बेहतर उपचार के लिए इस तरह की वैक्सीन की दुनिया में बहुत ज्यादा आवश्यकता है।

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स्तन कैंसर वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल

इस वैक्सीन के ट्रायल के पहले चरण में 18 से 24 साल के उन मरीजों को शामिल किया, जिन्होंने पिछले तीन साल में ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर के प्रारंभिक चरण का इलाज पूरा करा लिया है। जो वर्तमान में ट्यूमर मुक्त हैं और जिनमें दोबारा कैंसर होने का खतरा है। इसके तहत शामिल लोगों को वैक्सीन की तीन खुराक दी जाएगी। इसके पहले चरण में टीके की खुराक को निर्धारित करना और शरीर पर होने वाली प्रतिक्रिया की पहचान करना भी शामिल है। दो हफ्तों तक वैक्सीन के असर और उसके शरीर पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव पर भी नज़र रखी जाएगी। यह पूरा ट्रायल सितंबर 2022 तक पूरा होगा।

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इसके आने के क्या हैं फायदे

दुनिया में हर साल स्तन कैंसर का सामना करने वाली महिलाओं की संख्या तेज़ी से बढती जा रही है। ऐसे में इसके उपचार के लिए नये उपायों की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पिछले साल में 2.3 मिलयन महिलाओं ने स्तन कैंसर का उपचार कराया और दुनियाभर में 6,85,000 की मौतें हुईं। एक प्रभावी टीके के बाजार में आने से इस हानिकारक बीमारी पर रोकथाम लगाई जा सकती है। साथ ही वैक्सीन के बनने से वर्तमान में कैंसर से निजात पाने के लिए की जानी वाली सर्जरी जैसे जटिल इलाज से भी बचा जा सकता है।

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भारत में स्तन कैंसर की स्थिति

भारत जैसे देश में जहां चिकित्सा व्यवस्था का पूरा ढांचा जर्जर हालात में है, वहां स्तन कैंसर के आंकड़े स्थिति को और अधिक गंभीर करते हैं। स्तन कैंसर भारत में महिलाओं में होने वाली एक आम बीमारी बनती जा रही है। भारत के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में महिलाओं को स्तन कैंसर की समस्या देखने को मिल रही है। ब्रेस्ट कैंसर इंडिया के मुताबिक महिलाओं में होने वाले सभी कैंसर में 27.7 प्रतिशत स्तन कैंसर होता है। भारत में महिलाओं में होने वाली सभी कैंसर से संबंधित मौतों में से स्तन कैंसर से होने वाली मौत का लगभग 23.5 प्रतिशत का हिस्सा है। इसका यह मतलब है कि भारत में महिलाओं में कैंसर से होने वाली चार में से लगभग एक मौत स्तन कैंसर के कारण होती है।

स्वास्थ्य प्रणाली की नाजुक हालात और जागरूकता की कमी के कारण भारत में इसमें अधिक मौत होती है। देश में सर्वाइवल रेट भी अन्य देशों के मुकाबले कम है। इसके पीछे जागरूकता न होना, इलाज में देरी और स्क्रीनिंग तक पहुंच न होने जैसे कारण ज़िम्मेदार हैं। इसके साथ ही भारत में 25 से 49 साल की महिलाओं में स्तन कैंसर की समस्या ज्यादा देखने को मिल रही है। साल 2018 में कैंसर के अनुमानित कुल 1,86,965 मामलों मे से 61,264 मामलें इसी आयुवर्ग में मिले थे। इसी उम्र की स्तन कैंसर से मरने वाली महिलाओं की संख्या 21,892 है।

इसके अलावा द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक एक अध्ययन के अनुसार सिसजेंडर पुरुष के मुकाबले ट्रांस महिलाओं में स्तन कैंसर होने का खतरा अधिक बढ़ गया है। इसका मुख्य कारण उनके शरीर में हार्मोन, सिलिकॉन इंजेक्शन, सर्जरी जैसे बदलाव हैं। भारत के संदर्भ में यदि बात की जाए तो भारत में ट्रांस महिलाओं के बीच स्तन कैंसर को लेकर कोई जानकारी और जागरूकता का अभाव है। जागरूकता की कमी होने के साथ-साथ समाज में ट्रांस समुदाय को लेकर मौजूद पूर्वाग्रह भी एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से ट्रांस महिलाएं सामने आने से कतराती हैं।

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जागरूकता ही एक उपाय

भारत जैसे देश में महिलाओं में खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही, सलाह न लेने की आदत और जागरूकता की कमी सामान्य है। स्तन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचने के लिए जागरूकता होना बहुत ज़रूरी है। अमूमन स्तन कैंसर का शुरुआती लक्षण स्तन में गांठ होना है। इस लक्षण के बाद अधिकतर महिलाएं चिकित्सीय परामर्श लेने जाती हैं। लेकिन बहुत से मामलों में यह बीमारी बहुत से विस्तृत लक्षण दिखने के बाद सामने आती हैं। इसलिए स्तन में हल्का-सा भी दर्द, सूजन, गांठ या फिर आकार में बदलाव जैसी कोई भी एक शिकायत महसूस हो तो तुंरत डॉक्टर के पास जाना बेहद आवश्यक है।

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तस्वीर साभार: Counterview.org

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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