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“एनसीईआरटी ने जेंडर ट्रेनिंग मैनुअल वापिस ले लिया है, इस पर आप कुछ लिख देंगे? ये मुद्दे हिंदी में रह जाते हैं।” फेमिनिज़्म इन इंडिया हिंदी के कहने पर मैंने हामी तो भर दी, लेकिन काफ़ी समय इसी उधेड़बुन में निकल गया कि आखिर इस बात को कैसे लिखा जाए कि बच्चों की सुरक्षा के नाम पर न केवल लाखों बच्चों को सही और वैज्ञानिक शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित रखा जा रहा है बल्कि सुप्रीम कोर्ट के दो फ़ैसलों नालसा (2014) और जौहर (2018), और भारतीय संसद में पारित कानून ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) एक्ट 2019 के साथ ही नई शिक्षा नीति 2020  का भी उल्लंघन किया जा रहा है? और यह काम एनसीपीसीआर कर रहा है।

बात लगभग दो हफ़्ते पहले की है जब एनसीईआरटी द्वारा जारी की गई टीचर ट्रेनिंग गाइडलाइन फ़र्स्टपोस्ट में एक लेख के चलते सुर्खियों में आई और हिन्दुत्ववादियों ने एनसीईआरटी के इस कदम पर संस्कार और धर्म के नाम पर हमले करने शुरू किए। एक महाशय ने इस बारे में शिकायत भी दर्ज़ कराई। इसके साथ ही गाइडलाइन तैयार करनेवालों को और खास तौर पर विक्रमादित्य सहाय को उनकी तस्वीरों के लिए बेहद परेशान और ट्रोल किया गया।

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संभवतः इस मैनुअल का विरोध करनेवाले नहीं चाहते कि हमारे देश में किसी भी तरह की कोई प्रगति हो। वे नहीं चाहते कि हमारे बच्चे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखें, और संवेदनशील बनें।

इस मैनुअल का विरोध करनेवाले लोगों का कहना है कि ये जानकारियां बच्चों को ट्रॉमा देंगी। न केवल यह एक कुतर्क है बल्कि ट्रांसजेंडर, जेंडर नॉन बाइनरी (जो केवल दो जेंडर की अवधारणा को नहीं मानते) और जेंडर नॉन कन्फ़र्मिंग (जो जेंडर के सामाजिक नियमों को नहीं मानते) बच्चों के इस जातिवादी पितृसत्तात्मक समाज और उसके संस्थानों में होनेवाले रोज़ के ट्रॉमा को नज़रअंदाज़ भी करता है। साथ ही यह बच्चों को जेंडर की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दूर रखने का निकृष्ट कार्य करता है। क्या आप चाहते हैं आपके बच्चे ऐसे अवैज्ञानिक माहौल में पढ़ें? उन्हें उनके हक की शिक्षा से दूर रखा जाए? क्या यह संविधान प्रदत्त शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन नहीं है?

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द प्रिंट में छपी खबर के अनुसार इस मैनुअल को बचाए रखने के लिए चेंज डॉट ओर्ग पर एक पीटीशन शुरू करने वाली नीलाक्षी रॉय मानती हैं कि यह मैनुअल उन बच्चों के लिए प्यार और करुणा ही बढ़ाएगा जो दूसरे बच्चों से थोड़े अलग हैं। रॉय ने न केवल यह मैनुअल बनाने के लिए एनसीईआरटी की सराहना की है बल्कि वह इस बात से भी खुश हैं कि जिस देश में औसत उम्र 24 है, उसमें खोये हुए समय की कुछ भरपाई होने के आसार दिख रहे हैं।

संभवतः इस मैनुअल का विरोध करनेवाले नहीं चाहते कि हमारे देश में किसी भी तरह की कोई प्रगति हो। वे नहीं चाहते कि हमारे बच्चे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखें, और संवेदनशील बनें। इसीलिए तो यह हास्यास्पद ही है कि एनसीपीसीआर ने एनसीईआरटी से मैनुअल में ‘खामियों’ को सुधारने को कहा है, लेकिन ये खामियां क्या है इस बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है।

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द हिन्दू में प्रकाशित खबर के अनुसार जिन महाशय ने शिकायत की थी उनका कहना है कि भारतीय समाज में एलजीबीटीक्यू लोगों के लिए इज़्ज़त है। यह बात कितनी झूठ है इसे सुप्रीम कोर्ट में जौहर (2018) फ़ैसले में की हुई टिप्पणी से समझा जा सकता है। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने इस निर्णय में कहा था, “समाज को एलजीबीटी समुदाय के लोगों और उनके परिवारों से अपने रवैये के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए।” अभी तक यह माफ़ी मांगना तो दूर, समाज उस रवैये को छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं है। खैर, महाशय आगे कहते हैं कि अगर प्रकृति ने आपका जेंडर तय किया है तो बच्चों को ये बताना कि वे जिस जेंडर में जन्मे हैं वह उनका जेंडर नहीं है, प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना है। अब इसमें महाशय का पहले तो यह कहना कि इज़्ज़त है और फिर जेंडर की भूमिका और अस्मिता पर सवाल करने को खिलवाड़ कहना किस तरह का रचनात्मक खेल है वही जानें, लेकिन खैर, उनकी यह बात अज्ञानता और अवैज्ञानिकता से भी भरी हुई है।

सबसे पहले तो मैनुअल का उद्देश्य शिक्षकों को जागरूक करना है, बच्चों को नहीं, तो बच्चे आहत होंगे और वह भी शिक्षकों की जागरूकता से ये लॉजिकल जंप क्यों और किस उद्देश्य से लिया गया? दूसरा, जागरूकता शिक्षा का उद्देश्य हमेशा यह बताना होता है कि जितना हम जानते हैं और समझते हैं जीवन की संभावनाएं उससे कहीं अधिक हैं। इस जागरूकता से शिक्षक ना केवल ट्रांस* बच्चों को संबल दे सकेंगे बल्कि गैर ट्रांस* (यानि सिसजेंडर) बच्चों को अपने ट्रांस* दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और सहोदरों को समझने में भी सहायता कर सकेंगे।

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कई शोधों में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि ट्रांस* बच्चे जितनी ही कम उम्र में अपने चुने हुए जेंडर के साथ ताल मेल बैठा लें वे उतने ही अधिक स्वस्थ और खुश रहते हैं। क्या एनसीपीसीआर की इन बच्चों के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं है? या हर किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे की शिकायत पर वे बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने को अपना धर्म समझने लगे हैं? क्या प्रियंक यह बात जानते हैं कि ट्रांसजेंडर और क्वीयर बच्चों के साथ स्कूलों में सबसे ज़्यादा हिंसा होती है? इन बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रियंक ने क्या कदम उठाए हैं?

हमें समझना होगा कि आखिर वे कौन सी ताकतें हैं जो हमारे ही बच्चों का हवाला देकर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं और इससे उनके कौन से निहित स्वार्थ सिद्ध हो रहे हैं। वो कौन सी ताकते हैं जो बच्चों से खाद्य सुरक्षा से लेकर स्वास्थ्य सुरक्षा के अधिकार छीनने के षडयंत्र रच रही हैं और व्यापक यौनिकता शिक्षा जैसे शिक्षा के ज़रूरी माध्यमों से हमारे बच्चों को अनभिज्ञ रखना चाहती हैं। जब हम ये सवाल करेंगे तभी हम ना केवल अपने बच्चों को एक सुरक्षित और संवेदनशील भविष्य दे पाएंगे, बल्कि उन्हें जीवन जीने और प्रेम करने की तमाम तरह की संभावनाओं के प्रति जागरूक भी कर पाएंगे।

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तस्वीर साभार : pointofview

धर्मेश ने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया है और वो सेफ़ एक्सेस और इंडिया फ़ेलो रह चुके हैं। वह इलाहाबाद में क्वीयर समुदाय के साथ काम कर रहे हैं।

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