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अप्रैल 2017, लखनऊ

मेरे आस-पास क्वीयर लोगों का मेला लगा हुआ है। यह लखनऊ का पहला प्राइड मार्च/ गर्वोत्सव है। एक बड़े अख़बार के फ़ोटो जर्नलिस्ट साहब मेरे पास आते हैं और कहते हैं. “आप मास्क पहन लीजिए तो आपकी फ़ोटो खींच लेंगे।” मना करने पर साहब मुंह बनाकर चले जाते हैं। प्राइड मार्च के दौरान कई क्वीयर व्यक्ति अपनी पहचान छिपाने के लिए रंग-बिरंगे मास्क पहनते हैं। प्राइड एक स्पेक्टेकल है, एक प्रदर्शन, क्वीयर अस्मिता और अस्तित्व का। ज़ाहिर है मीडिया इसे अपने हिसाब से जगह देगा। वह तय करेगा कि कौन-सा क्वीयर बिकने लायक है, किसकी फ़ोटो फ्रंट पेज पर छपनी चाहिए जिससे पाठक उत्तेजित हो। एक बड़े लिबरल अख़बार ने यूं ही नहीं 6 सितंबर, 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जो लोग इस लड़ाई से पहले दिन से जुड़े रहे लोगों की तस्वीर की जगह एक होटल मालिक की फ़ोटो छापी थी।

इस बात से अपनी बात शुरू करने का मतलब यही सवाल पूछना है कि आखिर जो प्रदर्शन किया जा रहा है, जो दिखाया जा रहा है, प्राइड की सबसे चमकीली तस्वीर से लेकर जो नहीं दिखाया जा रहा, मसलन ट्रांस लोगों पर होने वाली हिंसा वह किस तरह की क्वीयर राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है। मीडिया में नज़र आने वाले, बड़े मीडिया संस्थानों की प्रगतिशील रिपोर्टिंग के अलावा जिसमें क्वीयर व्यक्ति अधिकतर एक वक्तव्य तक सीमित कर दिए जाते हैं, आख़िर वे कौन से अहम मुद्दे हैं जिनके लिए क्वीयर लोग सड़क से लेकर संसद तक मुखर हैं? अगर हम हिन्दुस्तान में क्वीयर डिस्कोर्स को समझने का प्रयास करें तो देखेंगे कि इसकी अधिकतर समझ और ज्ञान निर्मिति (नॉलेज प्रॉडक्शन) अमेरिकी और पश्चिमी क्वीयर परिचर्चा पर ही आधारित है। ज़ाहिर है वैश्विकरण के इस दौर में इसकी अहमियत को नकारा नहीं जा सकता है।

अगर हम हमारे समुदायों में देखें जहां जाति, धर्म के नाम पर अपने बच्चों की बर्बर हत्या को ‘ऑनर किलिंग’ कहा जाता है, जहां अपनी पसंद का पार्टनर चुनना तो दूर, हमें पढ़ने के लिए अपनी पसंद का विषय चुनने तक का हक नहीं है, और जहां समाज और सरकार ‘लव जिहाद’ के नाम पर इस नफ़रत से भरी दुनिया में प्रेम करने की हिम्मत करने वाले मुस्लिम लड़कों को अपराधी घोषित करने पर तुले हो, वहां अपनी जेंडर और यौनिकता की पहचान उजागर करने के खतरे कम नहीं हैं।

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लेकिन साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि कहीं क्वीयर डिस्कोर्स के अमेरिकीकरण या पश्चिमीकरण होने से हम अपनी मूल और स्थानिक क्वीयर परिचर्चा की संभावनाओं का गला तो नहीं घोंट रहे हैं? क्वीयर लोगों को अपनी ज़िंदगियों में कई बार पहचान, इज़्ज़त और ज़िंदा रहने में से किसी एक को चुनना पड़ता है। ऐसे में प्राइड, कमिंग आउट डे जैसे तमाम दिन और क्वीयर टीवी शो और फ़िल्में क्वीयर लोगों में शायद उम्मीद और आशा भर सकते हैं। कमिंग आउट के संदर्भ में हमें पहली बात तो यह समझनी होगी कि ये एक बेहद अंग्रेज़ी समस्या का अंग्रेज़ी ईलाज है। चूंकि पश्चिमी दुनिया में अधिकतर लोग या तो एकल परिवारों में रहते हैं या अपने मां-बाप से दूर और साथ ही काफ़ी हद तक अपना पार्टनर चुनने का अधिकार भी रखते हैं तो उनके लिए अपने परिवारों में अपने जेंडर और यौनिकता के विषय में बताना अपेक्षाकृत आसान है। 

ज़ाहिर है ये कोई एक दिन में नहीं हुआ है और रैडिकल क्वीयर आंदोलनों का इसमें बड़ा योगदान रहा है। साथ ही पश्चिमी देशों में रह रहे अप्रवासियों (इमिग्रेंट्स) और ब्लैक लोगों के लिए भी कम आउट करने के अपने अलग खतरे हैं। लेकिन अगर हम हमारे समुदायों में देखें जहां जाति, धर्म के नाम पर अपने बच्चों की बर्बर हत्या को ‘ऑनर किलिंग’ कहा जाता है, जहां अपनी पसंद का पार्टनर चुनना तो दूर, हमें पढ़ने के लिए अपनी पसंद का विषय चुनने तक का हक नहीं है, और जहां समाज और सरकार ‘लव जिहाद’ के नाम पर इस नफ़रत से भरी दुनिया में प्रेम करने की हिम्मत करने वाले मुस्लिम लड़कों को अपराधी घोषित करने पर तुले हों, वहां अपनी जेंडर और यौनिकता की पहचान उजागर करने के खतरे कम नहीं हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि कहीं क्वीयर डिस्कोर्स के अमेरिकीकरण या पश्चिमीकरण होने से हम अपनी मूल और स्थानिक क्वीयर परिचर्चा की संभावनाओं का गला तो नहीं घोंट रहे हैं?

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ऐसे में अपनी लड़ाईयां अपने तरीकों से लड़ना मुश्किल है। बाहर से लड़ाई का तरीका आयात करना ज़्यादा आसान है। तो वॉग, ड्रैग, प्राइड, कम आउट आदि धीरे- धीरे हमारी लड़ाई का ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं। यहां यह दोहराना ज़रूरी है कि इन तरीकों में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इन सब तरीकों को अपनाकर हम स्थानिक और मूल क्वीयर विरोध के तरीकों को कहां छोड़ रहे हैं? क्या ऐसे कोई तरीके हैं भी? हम इस सवाल का जवाब देने में तब सक्षम हो पाएंगे जब हम क्वीयर आंदोलन और परिचर्चा को डिकोलोनाइज़ करने के साथ साथ डिब्राम्हिनाइज़ भी करेंगे, यानि सोचने-समझने, आंदोलन और काम करने के तरीकों को न केवल अंग्रेज़ियत बल्कि ब्राह्मणवाद से भी मुक्त करना ज़रूरी है।

यहां हमें ये सवाल भी करना होगा कि जो क्वीयर लोग कम आउट नहीं करते, मीडिया जिनकी चमकीली तस्वीरें नहीं छापता, जिनके वक्तव्य नहीं लेता, उनके क्वीयरनेस का क्या वजूद है? जो क्वीयर लोग गेंहू बोते हैं, ईंट ढोते हैं, बच्चे पालते हैं और सेक्स वर्क करते हैं उनके लिए कम आउट करने के क्या मायने हैं? जब हम यह सवाल करेंगे तो हम समझेंगे कि हमारी पहचान और अस्मिता परिचर्चा के इन तमाम दायरों से कहीं अधिक बड़ी है। हम समझेंगे कि हमारा क्वीयर अस्तित्व औपनिवेशिक, सामंती और अकादमिक खांचों से बड़ा है और हमारी पहचान प्राइड, सतरंगी झंडे, कम आउट, ड्रैग, वॉग आदि के अलावा भी है।

और यह सब हम तब कर पाएंगे जब हम पश्चिमी क्वीयर आंदोलनों के नवउदारवादी सम्मोहन को छोड़कर अपनी लड़ाई के नए तरीके ईजाद करेंगे। जो अमेरिका या इज़रायल के जैसे ये ना कहें कि हम सभ्य हैं, तुम जाहिल हो, तुम हमारे जैसे बनो। हमारा सामान खरीदो, 30% ऑफ़ के साथ। हमारी फ़िल्म देखो, हमारे सीरियल देखो, हमारे जैसे बात करो, हमारे जैसे मज़ाक करो, हमारे जैसे गाना गाओ। नहीं बनोगे तो तबाह कर दिए जाओगे। हमें लड़ाई के ऐसे तरीके ईजाद करने होंगे जो ऐसी दुनिया का सपना देखें जहां आज़ादी की आवाज़ उठाने वाले ट्रांस लोगों को सवर्ण क्वीयर लोग ही गिरफ्तार कराने को ना आमादा दिखे। जहां हमारे शोषण का मज़ाक बना कर यह ना कहा जाए कि पहले अपना काम करो फिर अधिकार लेना। जहां हमें माइंडफुलनेस, रामायण देखने, थाली बजाने, दिया जलाने की सलाह ना दी जाए। जहां इस सामंती व्यवस्था पर जान लुटाने वाले ये ना कहें कि शर्म करो, जीने दे रहे हैैं ये क्या कम है, शुक्र मनाओ तुमको जान से नहीं मारा।

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तस्वीर साभार : AARP

धर्मेश ने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया है और वो सेफ़ एक्सेस और इंडिया फ़ेलो रह चुके हैं। वह इलाहाबाद में क्वीयर समुदाय के साथ काम कर रहे हैं।

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