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प्रकृति का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा तो मनुष्य का स्वास्थ्य खुद-ब-खुद बेहतर रहेगा। लेकिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ न केवल मनुष्य के भविष्य के लिए बल्कि वर्तमान के लिए भी खतरा साबित हो रहा है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। हाल ही में कनाडा की एक बुजुर्ग महिला बिगड़ते पर्यावरण के कारण बीमार पड़ीं। जलवायु परिवर्तन के कारण बीमार पड़ने वाली दुनिया की वह पहली मरीज हैं। इस महिला को सांस लेने में कठिनाई के साथ कई अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

कनाडा से प्रकाशित टाइम कॉलोनिस्ट अखबार के अनुसार कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के कूटनी लेक हॉस्पिटल, नेल्सन में एक डॉक्टर ने जलवायु परिवर्तन को एक मरीज़ के बीमार होने का कारण बताया है। महिला के स्वास्थ्य को लेकर जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार इसलिए ठहराया जा रहा है क्योंकि पहले से अस्थमा से पीड़ित उस महिला की सभी समस्याएं और गंभीर हो गई हैं। डॉक्टर जांच के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि गर्म हवा और वायु की खराब गुणवत्ता के कारण महिला की हालात ज्यादा खराब हो रही है। कूटनी लेक हॉस्पिटल, नेल्सन के कंसल्टिंग डॉक्टर काइल मैरिट के अनुसार 10 सालों में उन्होंने पहली बार किसी मरीज़ के डायग्नोसिस में जलवायु परिवर्तन शब्द का इस्तेमाल किया है।

डॉक्टर के अनुसार महिला लगातार हाइड्रेटेट रहने की कोशिश कर रही हैं क्योंकि गर्मी और लू के कारण उनकी सेहत पर बहुत ही बुरा असर पड़ रहा है। स्थानीय डॉक्टरों की टीम के अनुसार मरीज के लक्षण का इलाज करना समाधान नहीं है। हमें इसके पीछे छिपे कारणों की पहचान करके उन्हें हल करने की जरूरत है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सत्तर साल की उम्र में पीड़ित महिला को बिना एयर कंडीशनिंग के ट्रेलर मे रहना पड़ रहा है। देश में चल रही गर्म हवाएं उनके नाजुक स्वास्थ्य के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक है। जून के बाद से कनाडा के तापमान में भारी परिवर्तन देखने को मिला है। कनाडा में गर्मी के रिकॉर्ड को तोड़ने वाली तेज गर्म हवाएं चलीं। ब्रिटिश कोलंबिया में गर्म हवाओं के कारण 500 लोगों की मौत हो चुकी है।

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विश्व की तमाम बड़ी एजेंसियां यह बात मान चुकी हैं कि पर्यावरण की बिगड़ती सेहत सामाजिक असमानता को बढ़ाती है। खराब पर्यावरण के कारण उपजी स्थितियां, पहले से ही समाज में हाशिये पर रह रही महिलाओं के लिए असमानता की खाई को और अधिक बड़ा कर रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य में अनदेखी, हिंसा और बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का सामना करना पड़ता है। 

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2021 और महिलाएं

यूनाइटेड किंगडम के ग्लासको शहर में 31 अक्टूबर से 12 नवंबर तक संयुक्त राष्ट्र की ओर से 26वें जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में पर्यावरण के बिगड़ते स्वास्थ्य की गंभीरता को लेते हुए दुनियाभर के नेता एक मंच पर विचार-विमर्श के लिए इकट्ठा हुए। इसे कॉप-26 का नाम दिया गया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य यह था कि धरती के बढ़ते तापमान को धीमा कैसे किया जाए। इसी सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से महिलाओं पर होने वाले असर व जलवायु कार्यवाही में उनकी जरूरतों को शामिल करने के मुद्दे पर चर्चा हुई। इस चर्चा में शामिल प्रतिभागियों ने ध्यान दिलाया कि जलवायु की बिगड़ती स्थिति पहले से मौजूद विषमताओं को और बढ़ाती है और इसकी बड़ी कीमत लड़कियों और महिलाओं को सबसे ज्यादा चुकानी पड़ती है।

यूएन की ओर से इस सम्मेलन में कहा गया कि महिलाएं सदियों से अपने समुदायों के कल्याण और टिकाऊ विकास के साथ-साथ पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्रों, जैविक विविधता और प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख में अहम योगदान देती रही हैं। आज जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले बदलाव उन्हें बहुत प्रभावित कर रहे हैं। कॉप 26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा, “आज जेंडर दिवस है क्योंकि जेंडर और जलवायु दोनों आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। जलवायु परिवर्तन का महिलाओं और लड़कियों पर गहरा असर पड़ता है। महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करने में जलवायु सकंट एक बाधा है।”

खासतौर से विकासशील देशों में महिला अपने दैनिक जीवन के कामकाज को पूरा करने के लिए प्रकृति के सम्पर्क में ज्यादा आती हैं। भोजन और साफ-सफाई के काम के लिए पानी, मवेशियों के लिए जमीन का प्रयोग और चारे के प्रबंध से लेकर ईधन के लिए लकड़ी इकठ्ठा करने के अलावा अन्य जिम्मेदारियों को निभाने के लिए महिलाएं दैनिक जीवन में प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्रों पर निर्भर हैं और प्रतिदिन इसके सम्पर्क में आती हैं। 

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संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और अन्य यूएन एजेंसियों के अनुसार, महिलाएं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को सबसे पहले महसूस करेंगी क्योंकि पारिवारिक जरूरतों को दूर करने के लिए महिलाओं को लंबी से लंबी दूरी तय करनी होगी। वैसे तो पर्यावरण में होते बदलाव पूरी मानव जाति के लिए एक बड़ा संकट है, लेकिन विशेष रूप से समाज के कमजोर क्षेत्र और मुख्य रूप से महिलाओं के लिए यह गंभीर संकट पैदा करता है। गर्भावस्था और मातृत्व के दौरान महिलाओं की सेहत बहुत नाजुक होती है।

विश्व की तमाम बड़ी एजेंसियां यह बात मान चुकी हैं कि पर्यावरण की बिगड़ती सेहत सामाजिक असमानता को बढ़ाती है। खराब पर्यावरण के कारण उपजी स्थितियां, पहले से ही समाज में हाशिये पर रह रही महिलाओं के लिए असमानता की खाई को और अधिक बड़ा कर रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण लड़कियों व महिलाओं की शिक्षा व स्वास्थ्य में अनदेखी, हिंसा और बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का सामना करना पड़ता है। 

विस्थापन की मार और हिंसा झेलती महिलाएं

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई केवल पृथ्वी को जीवित रखने का संघर्ष नहीं है। कई महिलाओं के लिए यह हिंसा का एक कारण भी है। साल 2019 में यूनडीपी की युगांडा के एक समुदाय पर की गई रिसर्च से यह पता चलता है, कैसे प्रकृति पर अधिक निर्भर उस समुदाय की महिलाओं को जलवायु परिवर्तन के कारण हिंसा का सामना करना पड़ा। मौसम के बदलते मिजाज़ से उपजी समस्याओं जैसे सूखे के कारण महिलाओं और लड़कियों को भोजन के प्रबंध के लिए लंबी दूरियां तो तय करनी पड़ती हैं, साथ ही उन्हें जमींदारों, किसानों और विक्रेताओं के द्वारा किए जानेवाले यौन शोषण का भी सामना करना पड़ता है। इस शोध से यह निष्कर्ष भी सामने निकलकर आया कि लंबी दूरियों और काम के अधिक बोझ से महिलाओं की सेक्स में रूचि घटी है। कई महिलाओं ने यह बताया है कि थकावट की वजह से सेक्स न करने की इच्छा के कारण उनके पति उनके साथ मारपीट करते हैं। दूसरी ओर यह भी बताया गया है कि गरीबी, भोजन उपलब्ध करने के दबाव की वजह से पुरुष नशा करके घर में हिंसा करते हैं। तूफान और चक्रवात से घरों के उजड़ जाने के कारण विस्थापन और शिविरों में रहने वाली महिलाओं को अजनबी पुरुषों के द्वारा भी हिंसा का सामना करना पड़ता है।

गरीबी और समाज में लड़कियों के लिए असुरक्षा का माहौल होने के कारण बहुत से परिवार लड़कियों की बहुत ही कम उम्र में शादी कर देते हैं। यूरो न्यूज में छपी खबर के अनुसार बांग्लादेश में बाढ़ से विस्थापित परिवारों ने अपनी बेटी की शादी बेहद कम उम्र में करने की वजह उसे सुरक्षित स्थान मिलना और भोजन बताया। प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले विस्थापन और तबाह हुए घर-परिवार लड़कियों की सुरक्षा के लिए उनकी छोटी उम्र में ही शादी कर देते हैं।

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जलवायु परिवर्तन के कारण बड़ी संख्या में लड़कियां और महिलाएं अपने मौलिक अधिकारों से तो वंचित हो ही रही हैं साथ ही आकस्मिक मृत्यु का भी सामना कर रही हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने और पर्यावरण के स्वास्थ्य को संतुलित करने के लिए ज्यादा महिलाओं को नेतृत्व पदों पर होना बेहद जरूरी है। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जारी लड़ाई में महिलाओं की कितनी अहम भूमिका है इसे भी समझना ज़रूरी है।

जलवायु संकट और महिला स्वास्थ्य

महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों पर जलवायु परिवर्तन की बड़ी मार पड़ रही है। महावारी, गर्भावस्था और मातृत्व स्वास्थ्य को जलवायु परिवर्तन अधिक प्रभावित करता है। एमएसआई रिप्रॉडक्टिव च्वॉइस के विश्लेषण से यह सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव झेल रहे 26 देशों में साल 2011 के बाद से अनुमानित 11.5 मिलियन महिलाओं के पास गर्भनिरोधक साधनों की पहुंच प्रभावित हुई है। एमएसआई के अनुमान के मुताबिक आने वाले एक दशक में गर्भनिरोधक साधन तक पहुंच न होने के कारण 6.2 मिलयन अनिच्छुक गर्भाधारण, 2.1 मिलियन असुरक्षित गर्भसमापन, और 5800 मातृत्व मृत्यु हो सकती है। जलवायु परिवर्तन की मार महिलाओं को उसके प्रजनन अधिकारों से दूर कर रही है। उदाहरण के तौर पर गर्भानिरोधक गोलियां, साफ पानी, मातृत्व स्वास्थ्य पोषण की पहुंच विस्थापित महिलाओं के लिए न के बराबर उपलब्ध है।

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शिक्षा पर पड़ती मार

जब परिवार जलवायु परिवर्तन के कारण होनेवाली परेशानियों का सामना कर रहा होता है तो वे सबसे पहले लड़कियों की शिक्षा को बंद करते हैं। इथोपिया में रहनेवाली 14 साल की दावेले को सूखे की वजह से अपना स्कूल छोड़ना पढ़ा। उनका कहना है कि उन्हें पानी लाने के लिए रोजाना आठ घंटे से ज्यादा का सफर तय करना पड़ता है। इस कारण वह अपने स्कूल नहीं जा पाती हैं।

शिक्षा लड़कियों में जागरूकता और आत्मविश्वास पैदा करती है। शिक्षा की वजह से लड़कियां बाल विवाह, कम उम्र में मां बनना, हिंसा आदि से अपना बचाव करने में समर्थ होती हैं। यहीं नहीं वे शिक्षा की वजह से अपने समुदाय की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ाती हैं। इसके अलावा शोध यह भी बताते हैं कि शिक्षित लड़कियां जलवायु रणनीतियों को बनाने और बढ़ावा देने में मदद करती हैं। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण लड़कियों की शिक्षा पर पड़ने वाली बाधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो साल 2025 तक लगभग 12.5 मिलियन लड़कियों की स्कूली शिक्षा इससे प्रभावित होगी।

प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवाती महिलाएं

हम यह बेहतर जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन का पुरुष के मुकाबले महिला की सेहत पर ज्यादा बुरा असर हो रहा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से मृत्यु और उनको लगनेवाली चोट की दर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में दो-तिहाई ज्यादा है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति और सांस्कृति बाधाएं, जलवायु परिवर्तन से होनेवाली दिक्कतें उनकी मौत के अधिक ज़िम्मेदार हैं। तेजी से बदलती जलवायु न्याय और समानता से जुड़ा एक ज़रूरी विषय है। जलवायु परिवर्तन के कारण बड़ी संख्या में लड़कियां और महिलाएं अपने मौलिक अधिकारों से तो वंचित हो ही रही हैं साथ ही आकस्मिक मृत्यु का भी सामना कर रही हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने और पर्यावरण के स्वास्थ्य को संतुलित करने के लिए अधिक से अधिक महिलाओं को नेतृत्व पदों पर होना बेहद जरूरी है। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जारी लड़ाई में महिलाओं की कितनी अहम भूमिका है इसे भी समझना ज़रूरी है।

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तस्वीर साभार : Asia Times

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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