FII Hindi is now on Telegram

साल 2019 में ऑक्सफैम द्वारा किए गए एक सर्वे से मालूम हुआ कि दुनिया भर की औरतों द्वारा साल भर में किए गए घरेलू कामकाज का अगर वैतनिक आधार पर  मूल्यांकन किया जाए तो वह दस ट्रिलियन डॉलर होगा, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी ऐपल के सालाना टर्नओवर से 43 गुना अधिक है, मगर औरतें यह काम ‘हाउसवाइफ़’ बनकर अवैतनिक रूप से करती रहती हैं। यह आंकड़ा कई सवाल उठाता है। जैसे, घरेलू कामकाज करने की पूरी जिम्मेदारी औरतों पर ही क्यों है? क्या यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है? क्या औरतें घरों में रहने के लिए ही बनी हैं, क्या वे सिर्फ किचन तक ही सीमित रहने के लिए जीती हैं और औरतों को उनके श्रम का मूल्य क्यों नहीं दिया जाता? दरअसल, यह कोई प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि पितृसत्त्ता की एक सोची-समझी चाल है, जो औरतों को घरों तक सीमित करती है और उनके श्रम का मुफ़्त में दोहन करती है। पितृसत्त्ता नहीं चाहती कि औरतें आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो क्योंकि उनकी आर्थिक स्वतंत्रता में सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के रास्ते छिपे हुए हैं।

इसे समाजशास्त्री एमिल दुर्ख़ाइम के ‘डिवीजन ऑफ लेबर’ सिद्धांत से समझा जा सकता है। किसी भी समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए श्रम का विभाजन किया जाता है, ऐसे में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर निर्भर होता है। हालांकि यहां यह तय नहीं होता कि कौन सा काम ज़्यादा महत्वपूर्ण है और कौन अपेक्षाकृत कम, लेकिन पितृसत्त्ता पहले महिलाओं को घरों तक सीमित करती है, फिर उनके द्वारा किए गए काम को कमतर निर्धारित करती है। ऐसा करके यह सामान्यीकरण स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि औरतें पुरुषों से कमतर हैं, नीचे हैं। घरेलू कामकाज के बदले औरतों को कुछ नहीं मिलता और परिणामस्वरूप वे आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर हो जाती हैं। इस प्रकार, पितृसत्ता अपना एजेंडा आसानी से उनपर थोप देती है और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

क्या आपने ध्यान दिया है, होटलों और रेस्तरां में शेफ़ की भूमिका में पुरुष होते हैं। एक ओर तो पितृसत्त्ता यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि घरेलू कामकाज और खाना पकाना औरतों के काम हैं, वहीं बाहरी कार्यक्षेत्र में, जहां पैसे मिल रहे हैं, वहां वही काम पुरुष कर रहा है। इससे साफ तौर पर समझ आता है कि पूरी कोशिश केवल औरतों को बाहरी कार्यक्षेत्र में जाने से रोकने और आर्थिक रूप से निर्भर बनाने के लिए है और ऐसा करके ही पुरुष घरों में स्त्रियों का मानसिक व शारीरिक दोहन कर पाता है।

और पढ़ें : महिलाओं को मिलना चाहिए उनके घरेलू श्रम का हिसाब

Become an FII Member

इस साल रीलीज़ हुई मलयालम फ़िल्म ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ में समाज द्वारा पुरुषों की इसी साज़िश के अंश दिखाए गए हैं। यह फ़िल्म आम भारतीय घरों की औरतों के रोज़मर्रा के जीवन की असलियत के महीन परतों को उधेड़कर सामने रखती है। यह दिखाती है कि उनका कोई सामाजिक परिवेश नहीं होता, घरों की चारदीवारी के भीतर ही उन्हें अपनी दुनिया बनानी होती है और उनका ‘सेल्फ’ हमेशा पुरुषों के बाद आता है। इस मुद्दे के सभी पहलुओं को इतनी सशक्तता से दिखाने वाली निश्चित तौर पर यह पहली भारतीय फ़िल्म होगी। फिल्म में किचन से लेकर बिस्तर और आंगन तक घटने वाली घटनाओं में पुरुषों की ‘हिपोक्रेसी’ और क्रूरता को इतने साफ तौर पर दिखाया गया है कि महसूस होता है, मानो फ़िल्म नहीं, कोई भारतीय घर ही है, जहां ये सब कुछ हमारी आंखों के सामने घट रहा है। इस फ़िल्म का टाइटल अपने आप में बहुत प्रभावी है― ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, यह व्यंग्य है, महान भारत की कथित महान परंपराओं पर, जिनके अनुसार औरतें देवी का रूप हैं, पूज्य हैं, लेकिन उनकी महानता चूल्हों पर पतीली रखने और खाने की मेज़ पर पुरुषों द्वारा गिराया जूठन उठाने में है। यही उनका कर्तव्य है, यही धर्म है। अगर वे कुछ बोलने या अपने कर्तव्य से विमुख होने का ‘दुस्साहस’ करती हैं तो उनके जलाए चूल्हे की लपटें उन्हें खा जाएंगी और इस तरह इस महान देश की औरत आग में जलकर अंततः ‘पवित्र’ हो जाएगी।

दरअसल, भारतीय समाज में लड़की का जीवन और रसोईघर एक-दूसरे से ज़रा भी अलग नहीं हैं। बचपन से ही सीख दी जाती है कि ‘पति के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है’ और औरतों की ज़िम्मेदारी तो है ही पति को खुश करना, उसका दिल जीतना, इसलिए शुरुआत से ही उसकी ट्रेनिंग मिलने लगती है। 2019 में भारत के अलग-अलग राज्यों के 1000 घरों में ऑक्सफैम द्वारा किए सर्वे से मालूम हुआ कि तक़रीबन 41 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि अगर कोई औरत पति के लिए खाना नहीं बनाती है तो उसे मारा-पीटा जाना चाहिए, यानि केवल दिल जीतने के लिए ही नहीं, ज़िंदा रहने के लिए भी औरतों का खाना बनाना ज़रूरी है। इस बात कि पुष्टि करती है यह ख़बर भी करती है जो बीते 14 फरवरी 2021 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुई थी, जिसके अनुसार, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में पति के लिए खाना नहीं बनाने पर एक औरत की हत्या कर दी गई। 

क्या औरतें घरों में रहने के लिए ही बनी हैं, क्या वे सिर्फ किचन तक ही सीमित रहने के लिए जीती हैं और औरतों को उनके श्रम का मूल्य क्यों नहीं दिया जाता?

‘द ग्रेट इंडियन किचन’ इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह स्थानीय भाषा (मलयालम) में बनी फिल्म है जो भारत के मुख्यधारा सिनेमा द्वारा स्थापित किचन की रोमैंटिसिज़्म वाली छवि को तोड़ती है। अधिकतर कमर्शियल हिंदी फिल्मों में ऐसा दिखाया जाता है कि औरतें खाना बनाने को ‘एन्जॉय’ कर रही हैं। वहां किचन के अलग-अलग भाग, आटा गूंधती औरत को पीछे से पकड़े पुरुष और भोजन के खूबसूरत शॉट्स होंगे, लेकिन कहीं भी बजबजाती सिंक, पाइप से रिसते पानी और जूठे-गंदे बर्तन नहीं दिखाए जाते, न ही मुख्यधारा का सिनेमा यह ज़िम्मेदारी लेना चाहता है कि बता सके कि व्यंजन बनाने के बाद परोसती भी स्त्री है, बजबजाते सिंक में हाथ डालकर जूठन भी स्त्री ही निकालती है और रिसते पाइप से बहते पानी की बदबू भी स्त्री ही झेलती है।

और पढ़ें : पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं हर दिन संघर्ष करती हैं

इसकी सबसे ख़ास बात है कि इसमें बहुत सारे डायलॉग्स नहीं हैं। पात्रों के बीच संवाद भी बहुत अधिक नहीं है। अलग-अलग शॉट्स ही सच्चाई को दर्शकों तक पहुंचाने में सफ़ल होते हैं। सुबह का एक दृश्य है, जिसमें एक पुरुष योग कर रहा है और दूसरा समाचार पत्र पढ़ रहा है। वहीं, दोनों औरतें रसोइएं में हैं, जिनमें एक सिलबट्टे पर नारियल पीस रही है और दूसरी डोसा बना रही है। पुरुष की सुबह चाय पीने, फ़्रेश होने, न्यूज़पेपर पढ़ने और योग करने से होती है, औरत की सुबह नहाने, पुरुष के लिए चाय बनाने, पुरुष के लिए नाश्ता बनाने, नाश्ता परोसने, उसका जूठन उठाने, टेबल पोछने और जूठे बर्तन धोने से होती है।

फ़िल्म में बहुत से दृश्य नायिका के पति और उसके ससुर के खाने की टेबल पर खाना खाते हुए दिखाए गए हैं। इन दृश्यों में पुरुष टेबल पर बचा खाना फैला देते हैं। पुरुषों के खाने के बाद घर की औरतों को उसी टेबल पर खाना खाना होता था। इसके विपरीत फ़िल्म में एक दृश्य है, जहां वे लोग एक रेस्तरां में खाना खा रहे होते हैं, वहां पुरुष सलीके के प्लेट में जूठन रखता है। इस बात को रेखांकित करते हुए पत्नी कहती है,’ यहां तुम टेबल मैनर्स को फॉलो कर रहे हो!’ इसपर वह नाराज़ हो जाता है और घर आकर कहता है, ‘अगर तुम मुझसे अपनी ग़लती के लिए माफ़ी मांग लो तो सब ठीक हो जाएगा!’  दरअसल फ़िल्म का यह भाग पुरुषों के उस अहंकार को दिखाता है जिसके चलते अपने घर में वे मनमानी करते हैं, क्योंकि वे यह मानते हैं कि घर की औरतें उनके अधीन हैं और उनका जूठन साफ़ करना औरतों का धर्म। इन सब के बीच अगर कोई स्त्री उनके इस व्यवहार पर सवाल उठाती है तो पुरुषों का अभिमान आहत हो जाता है।

और पढ़ें : श्रम बल में घटती महिलाओं की भागीदारी और कोविड-19 से उपजी चुनौतियां

यह फ़िल्म माहवारी और उससे जुड़े मिथकों को भी दिखाती है। समाज की अंतर्निहित हिपोक्रेसी और पितृसत्त्ता की गहरी जड़ें ही हैं जो देश के सबसे अधिक शिक्षित राज्य में भी इस क़िस्म के भेदभाव, अलगाव और छुआछूत को बढ़ावा देता है। फ़िल्म में एक शॉट है, जहां पुरुष स्कूल में परिवार की संस्था के बारे में बता रहा होता है। वह कहता है कि परिवार एक सार्वजनिक संस्थान है और यह विवाह पर केंद्रित है। इससे यह समझाने की कोशिश की गई है कि स्त्री के शोषण का आधार परिवार है, जो विवाह संस्थान की सहायता से संभव हो पाता है। इस फ़िल्म में दीवारों पर तस्वीरों के शॉट्स हैं, जिनमें औरतें पति के साथ हैं। ये तस्वीरें असली जीवन और तस्वीरों के बीच के विरोधाभास को दिखाती हैं, क्योंकि जब भी किसी औरत की शादी होती है, उसे एक ख़ुशनुमा दुनिया के सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में इसका ठीक उलटा होता है और उसके सारे सपने टूट जाते हैं।

इक्कीसवीं सदी की दुनिया में भी औरतों द्वारा किए जाने वाले अनपेड केयर वर्क के आंकड़े भयावह हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में औरतों की भागीदारी उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। वे आज भी पुरुषों के अधीन हैं और घरों तक सीमित होने के लिए बाध्य हैं। इस फ़िल्म में बहुत सी बातें हैं जो अलग-अलग शॉट्स में उठायी गयी हैं। यह समाज न कंसेंट की बात करता है, न ही यह औरतों को विकल्प देना चाहता है। पढ़ी-लिखी औरत भी घरों में रहने को मजबूर की जाती है। परिवार की इज़्ज़त और मान-मर्यादा का झूठा ढोंग औरतों के कंधे पर लटका दिया जाता है। यह सब एक बार में खत्म होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक चक्र है, जहां एक नहीं तो दूसरी औरत फंस जाती है और यह अचानक नहीं शुरू होता, बल्कि इसकी ट्रेनिंग बचपन से हो जाती है, जब भाई के प्यास लगने पर मां बहनों को पानी लाने भेज दिया करती हैं।

और पढ़ें : जेंडर पे गैप : वेतन में जेंडर के आधार पर होने वाला भेदभाव महिलाओं के विकास के लिए चुनौतीपूर्ण


तस्वीर साभार : The Scroll

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply