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“ढोल पीटने और दुहाई देने के लिए तो ज़रूर प्रजातंत्र था, पर उसकी असलियत यह कि प्रजा बिल्कुल बेमानी और तंत्र मुट्ठी भर लोगों की मनमानी।” महाभोज उपन्यास में मन्नू भंडारी। 1950-60 के दशक में जब हिंदी साहित्य में गिनती भर की लेखिकाएं मुख्यधारा में उभरकर आ रहीं थीं उनमें मन्नू भंडारी शामिल थीं। मन्नू भंडारी का बीते 15 नवंबर 2021 को गुरुग्राम में 90 वर्ष की उम्र में लंबे समय से बीमार रहने के कारण देहांत हो गया। उनका जन्म 3 अप्रैल 1931 को ब्रिटिश इंदौर में भानपुरा जिले में एक मारवाड़ी परिवार में हुआ था। हालांकि आर्थिक तंगी का सामना करने की वजह से परिवार अजमेर, राजस्थान में जाकर रहना लगा जहां मन्नू का बचपन और बुनियादी पढ़ाई पूरी हुई। घर में पढ़ने लिखने का माकूल माहौल था क्योंकि पिता सुखसंपत राय भंडारी खुद पहली अंग्रेजी से हिंदी और अंग्रेजी से मराठी शब्दकोश के निर्माता था। घर का माहौल किसी भी व्यक्ति में मूल सिद्धांतों के संचार का वाहक होता है; इसीलिए हम पाते हैं मन्नू के पिता जब सामाजिक कार्यकर्ता थे और आज़ादी की लड़ाई में भी शामिल थे तब परिणामस्वरूप हम उनकी रचनाओं में और उनके जीवन में भी राजनीति में अच्छी खासी संलग्नता देखते हैं।

मसलन कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्नातक करने के दौरान आज़ादी की लड़ाई के लिए वे आंदोलनों में, हड़तालों में शामिल रहीं जिसकी वजह से उनकी अपने पिता से भी खटपट रही क्योंकि उन्हें अपनी बेटी का लड़कों के साथ मिलकर फेरी, आंदोलनों में शामिल होना खटक रहा था। मन्नू ने साल 1946 में अपनी अध्यापिका शीला अग्रवाल के साथ मिलकर हड़ताल को भी अंजाम दिया था जिसके बाद उनकी दो सहपाठी को कॉलेज ने सुभाष चन्द्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल होने के आरोप के चलते बर्खास्त कर दिया था। उन्होंने अपना स्नातकोत्तर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में पूरा किया था। मन्नू निजी जीवन में भी सशक्त, स्वतंत्र और विद्रोही किस्म की महिला थीं। उन्होंने अपने पिता के विरोध में जाकर लेखक राजेंद्र यादव, जो हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध नाम हैं, से शादी रचाई थी। मन्नू भंडारी आज़ाीदी के दौर बाद की लेखिका हैं, ऐसा वक्त जब इंडस्ट्रियलाइजेशन, अर्बेनाइजेशन अपने पैर पसार रहा था और अलग अलग तरह का डिस्कोर्स समाज में जगह बन रहा था। मन्नू इस सबको बहुत गौर से देख और महसूस कर रही थीं।

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साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है यानि अगर आपको किसी भी वक्त के समाज को पढ़ना हो तो उस समय के साहित्य को पढ़िए, साहित्य के पास समाज को बदलने के तरीके नहीं होते, लेकिन वह उसकी हकीकत दिखाता है ताकि जिनका काम सामाजिक ढांचे को बेहतर करने का है, बदलने का है, वे अपना काम करें। मन्नू भंडारी ने वही किया, उन्होंने 1950 के बाद के समय को अपनी रचनाओं में उतारा। इस दशक में मध्यम वर्गीय परिवार, कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी, स्त्री अधिकार, लिंगभेद, जैसे मुद्दे लोगों के मध्य अपनी जगह बना रहे थे। परिणामस्वरूप हम मन्नू भंडारी का बहुचर्चित उपन्यास ‘आपका बंटी’ हिंदी साहित्य में मील का पत्थर बनते हुए देखते हैं। इस उपन्यास के 31 से ज्यादा संस्करण बाज़ार में आ चुके हैं। एक ऐसी कथा जिसमें मां पिता के तलाक के बाद बच्चे के ट्रॉमा को दिखाया गया है।

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मन्नू भंडारी आज़ादी के दौर बाद की लेखिका हैं, ऐसा वक्त जब इंडस्ट्रियलाइजेशन, अर्बेनाइजेशन अपने पैर पसार रहा था और अलग अलग तरह का डिस्कोर्स समाज में जगह बन रहा था। मन्नू इस सबको बहुत गौर से देख और महसूस कर रही थीं।

मन्नू की स्वतंत्र रूप से कहानी ‘मैं हार गई’ साल 1957 में पहली बार ‘कहानी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी जिसके बाद उनकी लघु कथाएं छपने का सिलसिला शुरू हो चुका था; शमशान, अभिनेता, आदि कहानियां अलग अलग पत्रिकाओं में छपना शुरू हुईं। इससे पहले राजेंद्र यादव और मन्नू जी ने उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ पर साथ काम किया था जो हिंदी साहित्य में एक अलग तरह का एक्सपेरिमेंट था। इसी 1950 के दशक में हिंदी साहित्य में नई कहानी आंदोलन की शुरुआत हुई जो राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर ने मिलकर शुरू किया था जिसमें बाद में मन्नू भंडारी भी शामिल हुईं और आंदोलन को आगे ले जाने का काम किया। उनकी कहानियां, उपन्यास न सिर्फ़ किताबों के माध्यम से लोगों के मध्य पहुंचे बल्कि सिनेमा के माध्यम से भी लोगों ने उनके किरदारों को जीवंत होते देखा।

उनकी कहानी ‘यही सच है’ पर 1974 में रजनीगंधा फिल्म बनी, बासु चटर्जी ने साल 1977 में फिल्म ‘स्वामी’ बनाई जिसकी स्क्रिप्ट राइटर भी मन्नू भंडारी थीं। उपन्यास ‘आपका बंटी’ पर भी 1986 में ‘समय की धारा’ नाम से फिल्म बन चुकी है जिसके अंत पर मन्नू भंडारी ने रोष जताया था, मामला कोर्ट तक भी पहुंचा। मन्नू भंडारी ने पटकथा लेखन भी किया था जिनमें दूरदर्शन पर ‘रजनी’ धारावाहिक बहुचर्चित रहा। उनकी रचनाओं में महिला किरदार गिड़गिड़ाए नहीं बल्कि सशक्त तरीके से अपनी बातें रखीं, महिला को कहानी में केंद्र बिंदु बनाने का काम मन्नू भंडारी ने तब किया जब हिंदी साहित्य में पुरुष लेखकों का दबदबा था। उन्होंने “महिलाओं को राजनीति से दूर रहना चाहिए” मानक को भी अपने उपन्यास ‘महाभोज’ के माध्यम से तोड़कर रख दिया। महाभोज दलितों के बेलछी नरसंहार पर कथानक था जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार, कूटनीति, राजनीति के अपराधीकरण पर साफ़ शब्दों में अपनी बात रखी। यह उपन्यास 1979 में प्रकाशित हुआ, देश भर इसका नाट्य मंचन भी किया गया। महाभोज का मंचन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली ने किया था।

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मन्नू भंडारी का लेखन सामाजिक राजनीतिक मुद्दों को लेकर तो हमेशा प्रासंगिक रहेगा ही साथ ही वह हिंदी साहित्य में आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ में लिखती हैं कि लोकप्रियता कभी भी रचना का मानक नहीं बन सकती। असली मानक तो होता है रचनाकार का दायित्वबोध, उसके सरोकार, उसकी जीवन-दृष्टि। ऐसा समय जब हिंदी साहित्य नई हिन्दी आंदोलन को बाजारवाद से जोड़ता जा रहा है और लेखक की लोकप्रियता ही उसके लेखन की लोकप्रियता का मानक बन रही है तब हमें एक पाठक होते हुए, मन्नू भंडारी का पाठक होते हुए यह विचारने की ज़रूरत है कि जिस तरह मन्नू भंडारी ने अपने समय को साहित्य में उतारा; क्या आज के लेखक यह सब कर रहे हैं? आलोचकों का कहना है कि मन्नू भंडारी ने बहुत सामान्य लेखन किया, उसमें रचनात्मकता, कलात्मकता आदि का बहुत अभाव था लेकिन वोल्टेयर की बात याद करें, “सामान्य ज्ञान बहुत सामान्य नहीं है” तब हम पाते हैं कि मन्नू भंडारी ने सामान्य मानकर छोड़ दिए जाने वाले मुद्दों पर लिखकर अपने लेखन का एक नया फॉर्म निर्मित किया।

उनकी रचनाओं में महिला किरदार गिड़गिड़ाए नहीं बल्कि सशक्त तरीके से अपनी बातें रखीं, महिला को कहानी में केंद्र बिंदु बनाने का काम मन्नू भंडारी ने तब किया जब हिंदी साहित्य में पुरुष लेखकों का दबदबा था।

इंडियन एक्सप्रेस में हिंदी उपन्यासकार प्रभात रंजन मन्नू भंडारी को याद करते हुए कहते हैं, “हमें यह याद रखने की आवश्यकता है कि मन्नू भंडारी ने हिंदी साहित्य जगत को उन नायिकाओं को दिया जो एक ही समय में व्यावहारिक और साहसी थीं। वह अपने फैसले खुद करती थीं और वे कामकाजी महिलाएं भी थीं। यह 60-70 के दशक में, जब भंडारी लिख रही थीं, यह बहुत नया था। हमने ऐसी नायिकाओं के बारे में पहले कभी नहीं देखा या सुना था।” मन्नू भंडारी जी ने बतौर हिंदी अध्यापिका कलकत्ता बैलीगंज शिक्षा सदन में बाद में दिल्ली विश्विद्यालय के मिरांडा हाउस में साल 1991 तक पढ़ाया। मिरांडा के परिसर में ही उन्होंने आपका बंटी उपन्यास पूरा किया था। मन्नू भंडारी विक्रमशिला विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की अध्यक्ष भी रही थीं और उनकी आत्मकथा ने उन्हें केके बिड़ला फाउंडेशन का प्रतिष्ठित व्यास सम्मान दिलाया था। इसके साथ हिंदी अकादमी, दिल्ली शालाखा सम्मान, आदि सम्मानों से वे सम्मानित की गई थीं।

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तस्वीर साभार : ट्विटर

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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