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दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि बड़े शहरों में ऑफलाइन से लेकर ऑनलाइन हर तरह के मेंस्ट्रुअल प्रॉडक्ट आसानी से मिल जाते हैं लेकिन यह सुविधा अभी बड़े शहरों तक ही सीमित है। भारत की एक बड़ी आबादी ग्राणीण क्षेत्र में रहती है। अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में वे विकास और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं जो आधुनिक भारत के शहरों में है। भारत की एक बड़ी आबादी की तरह बड़े शहरों में रहनेवाले सुविधा-संपन्न लोगों को पीरियड्स में कपड़ा इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती। इन लोगों को सेनेटरी नैपकिन, टैम्पन, मेंस्ट्रुअल कप ,पीरियड्स पैंटी जैसी तमाम चीजें जिन्हें पीरियड्स के दौरान उपयोग किया जा सकता है, आसानी से मिल जाती हैं। लेकिन जितनी आसानी से ये सुविधाएं हमें शहरों में मिलती हैं, इनकी पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों में न के बराबर है।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में औरतों को दोयम दर्जा प्राप्त है। ऐसे में औरतों के स्वास्थ्य के बारे में समाज में खुलकर बात करना ही एक चुनौती है। भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में औरतों के हितों के लिए अहम कदम न के बराबर उठाए जाते हैं। पीरियड्स जैसे अहम मुद्दे पर तो परिवारों में लोग आपस में बात करने से मुंह चुराते हैं। एक घर में माँ ही अपनी बेटी को पीरियड्स के बारे में बताती हैं। पीरियड्स पर इस तरह दबे मुंह बात की जाती है जैसे यह कोई अपराध हो जिसके बारे में कानों-कान किसी को खबर न लगे।

जिस जैविक प्रक्रिया के बारे में समाज यह सोचता है कि वह रक्त अशुद्ध है इस दौरान लोग अपवित्र होते हैं। इस पितृसत्तात्मक सोच के कारण पीरियड्स को लेकर कई तरह की चुनौतियों का सामना लोगों को करना पड़ता है। आज भी बड़ी संख्या में लोग पीरियड्स में पुराने कपड़े का उपयोग करते हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हाइजीनिक प्रॉडक्ट्स को लोगों के बीच सरकार और अन्य संस्थाओं द्वारा उपलब्ध कराया गया है। लेकिन आज भी बड़ी संख्या में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग पीरियड्स में गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। बहुत हद तक कई गैर-सरकारी संस्थाओं और सरकार के प्रयासों से कुछ ग्रामीण इलाकों तक सैनिटरी नैपकिन इन्हें उपलब्ध कराया गया है।

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यह सवाल बरकरार है कि क्या सेनेटरी नैपकिन की तरह मेंस्ट्रूअल कप जैसे प्रॉडक्ट्स भी हर तबके के लोगों के बीच आसानी से उपलब्ध हैं तो जवाब है नहीं। सबसे पहले तो यह मेंस्ट्रुअल कप ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहुंच बना नहीं पाया है। इसके पीछे वजह कई हैं जैसे जागरूकता की कमी, इन प्रॉडक्ट्स का महंगा होना और सबसे अहम वजह मेंस्ट्रुअल कप को लेकर लोगों के मन में संशय।

बात मेंस्ट्रुअल कप की पहुंच की

हमेशा से कपड़ा इस्तेमाल कर रहे लोगों ने धीरे-धीरे नैपकिन की तरफ रुख़ किया है। हालांकि आज भी एक बड़ा वर्ग पुराने कपड़ों के इस्तेमाल पर निर्भर है। एक भारी जनसंख्या के सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने से पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। सेनेटरी पैड्स से पैदा होनेवाला कचरा ऐसा कचरा है जो अपने आप खत्म नहीं होता। इसे खत्म होने में पांच सौ से आठ सौ सालों का समय लगता है।

पर्यावरण के साथ-साथ सेनेटरी पैड से लोगों की सेहत पर भी असर पड़ रहा है। इस्तेमाल किए हुए सेनेटरी नैपकिन में लगे ब्लड से सूक्ष्म जीवाणु फैलने लगते हैं जो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डालता है। इस समस्या से निपटने के लिए अन्य पर्यावरण और स्वास्थ्य हितैषी ईको-फ्रेंडली मेंस्ट्रुअल प्रॉडक्ट की तरफ रुख किया जा रहा है जिसमें मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है। बता दें कि मेंस्ट्रुअल कप एक कप के आकार का होता है जो सिलिकॉन या लेटेक्स से बनता है। मेंस्ट्रुअल कप किफायती और पर्यावरण के अनुकूल है। साथ ही इसे लगातार पांच से आठ साल तक के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

शहरों में शिक्षित लोगों का लगभग एक बड़ा वर्ग सहजता से मेंस्ट्रुअल कप पीरियड्स के दौरान उपयोग करने लगा है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के लोग ऐसी सुविधाओं से अभी भी वंचित हैं। मेंस्ट्रुअल कप, कपड़े से बने पैड, पीरियड्स पेंटी ये सभी ईको फ्रेंडली प्रॉडक्ट्स बड़े शहरों के बाज़ारों में सहजता से मिल जाते हैं। लेकिन महानगरों की भागदौड़ से काफी पीछे भारतीय ग्रामीण समाज में अभी इनकी पहुंच न के बराबर है। ग्रामीण महिलाएं कपड़े और सेनेटरी पैड पर निर्भर हैं।

एनजीओ और सरकारों द्वारा कई अहम कदम उठाए गए जिसके बाद महिलाओं के स्वास्थ्य पर न सिर्फ चर्चा शुरू हुई बल्कि उनके स्वास्थ्य समस्याओं के उपाय के तरीके भी निकाले गए। अब कई स्कूलों में किशोरियों को मुफ्त पैड दिए जाते हैं। कई एनजीओ गांव तक पहुंचकर लोगों को इस मुद्दे पर जानकारी देते हैं। हालांकि यह सवाल बरकरार है कि क्या सेनेटरी नैपकिन की तरह मेंस्ट्रुअल कप जैसे प्रॉडक्ट्स भी हर तबके के लोगों के बीच आसानी से उपलब्ध हैं तो जवाब है नहीं।

सबसे पहले तो यह मेंस्ट्रुअल कप ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहुंच बना नहीं पाया है। इसके पीछे वजह कई हैं जैसे जागरूकता की कमी, इन प्रॉडक्ट्स का महंगा होना और सबसे अहम वजह मेंस्ट्रूअल कप को लेकर लोगों के मन में संशय। सीमित संख्या में लोग पितृसत्ता के बनाए खोखले नियमों से ऊपर उठकर मेंस्ट्रुअल कप का उपयोग कर रहे हैं पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है बल्कि उन लोगों की संख्या ज्यादा है जो पितृसत्ता के रूढ़िवादी सोच से जन्मे नियमों को मानने को मजबूर हैं।

और पढ़ें : भारत में सस्टेनबल मेंस्ट्रुएशन को लागू करना क्यों चुनौतियों से भरा है

ग्रामीण क्षेत्र तक मेंस्ट्रुअल कप की पहुंच बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह पर्यावरण हितैषी तो है ही साथ ही लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं है। मेंस्ट्रुअल कप शहरों के साथ-साथ गांव में भी अपनी पहुंच बनाने लगे तो इससे स्वास्थ्य वह पर्यावरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव माना जाने लगेगा।

मेंस्ट्रुअल कप से जुड़े मिथ्य

मेंस्ट्रूअल कप को लेकर कई मिथ्य हमारे समाज में मौजूद हैं। जैसे मेंस्ट्रूअल कप का इस्तेमाल करने से दर्द होता है। इसे पहनकर काम करने या चलने में दिक्कत होती है। इसके साथ ही मेंस्ट्रुअल कप को लेकर मुख्य संशय यह है कि इसे इस्तेमाल करने से वर्जिनिटी खत्म हो जाती है। इस मिथ्य के पीछे वजह इसकी बनावट और इस्तेमाल की प्रक्रिया है। मेंस्ट्रूअल कप लचीला और मुलायम होता है इसे वजाइना में फिट किया जाता है। चूंकि सबकी वजाइना का साइज़ अलग होता है इसलिए मेस्ट्रुअल कप छोटे और बड़े साइज के आते हैं। इसे अपने साइज के हिसाब से इस्तेमाल किया जा सकता है। कप को वजाइना के अंदर डालने के लिए कप को फोल्ड करना होता है U या C शेप में मोड़कर वजाइना में फिट करना होता है। यह कप खून को पैड की तरह सोखता नहीं बल्कि कप में इकट्ठा करता है। करीब 6 घंटे तक इस्तेमाल के बाद इसे निकालकर धोकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

वर्जिनिटी या कौमार्य भारतीय महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी माने जाने के पीछे पितृसत्तात्मक समाज का एक नज़रिया है जो औरतों की वर्जिनिटी को उसके चरित्र से जोड़कर देखता है। विवाह के लिए वर्जिन लड़की होना जरूरी माना जाता है। इसके लिए वर्जिनिटी टेस्ट के कई शर्मनाक तरीके भारतीय समाज में अपनाए जाते हैं। समाज की इस संकुचित मानसिकता का प्रभाव महिलाओं पर इतना अधिक पड़ता है कि महिलाएं इसे सही मानती हैं। मेंस्ट्रुअल कप को जिस तरह वजाइना के अंदर डालकर पीरियड्स के दौरान उपयोग किया जाता है, इससे लोगों को अपनी तथाकथित वर्जिनिटी खत्म हो जाने का डर होता है पर ऐसा नहीं होता है।

ग्रामीण क्षेत्र तक मेंस्ट्रुअल कप की पहुंच बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह पर्यावरण हितैषी तो है ही साथ ही लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं है। मेंस्ट्रुअल कप शहरों के साथ-साथ गांव में भी अपनी पहुंच बनाने लगे तो इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव माना जाने लगेगा, क्योंकि यह छोटा सा पीरियड प्रॉडक्ट चोट करता है उस संकुचित मानसिकता को जो शरीर के एक अंग के बदलाव को लोगों के चरित्र से जोड़कर देखता है।

और पढ़ें : बात आदिवासी इलाकों में मौजूद पीरियड्स प्रॉडक्ट्स की पहुंच और टैबू की


तस्वीर साभार : SFGATE

पेशे से एक पत्रकार ,जज्बातों को शब्दों में लिखने वाली 'लेखिका'
हिंदी साहित्य विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से BA(Hons) और MA(Hons) मे शिक्षा ग्रहण की फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में शिक्षा ली । मूलतः उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध रखती हूँ और दिल्ली में परवरिश हुई । शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेशों में नारी आस्मिता पर पितृसत्ता का प्रभाव देखा है जिसे बेहतर जानने और बदलने के लिए 'फेमनिज़म इन इंडिया' से जुड़ी हूँ और लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहतीं हूँ।

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