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इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘जब वी मेट’ में एक डायलॉग सुनने में आता है, “अकेली लड़की खुली तिज़ोरी की तरह होती है।” अकेली लड़की को खुली तिज़ोरी मानना पर्दे तक सीमित एक संवाद का हिस्सा भर नहीं है, इसी सोच के कारण पितृसत्ता महिलाओं के किसी भी मामले में चयन के अधिकार को नियंत्रित करना अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी मानती है। महिलाओं की स्वायत्ता को स्वीकारने में और इस कॉन्सेप्ट को असल ज़िंदगी में होनेवाली घटना मानने में परिवार से लेकर समाज को सालों लग जाता है। भारतीय जनमानस स्क्रीन की दुनिया को मायावी और बहुत ‘खुला’ मनाता है। लेकिन स्क्रीन पर दिखनेवाली महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर, एक वयस्क और एक स्वतंत्र नागरिक होने के बावजूद अपने निजी जीवन में मोरल पुलिसिंग झेलती रही हैं। मोरल पुलिसिंग किसी भी विचारधारा, राजनीतिक या ग़ैर-राजनीतिक समझ रखने वाली महिला के साथ हो सकती है।

जैसे कंगना रनौत जो दक्षिणपंथी विचारधारा मानती और हिन्दू अतिवाद के समर्थन में ट्वीट करती थीं, उनकी बिकनी पहनी एक फ़ोटो पर एक दक्षिणपंथी समर्थक ने लिखा था, “आपने आज ऐसी फ़ोटो क्यों डाली है? भारत के लोग आपको हिन्दू शेरनी कहते हैं उनका क्या?” ऐसे कई अन्य कमेंट्स थे जो कंगना से उनकी ड्रेस को लेकर खफ़ा दिख रहे थे। कंगना ने कई बार अन्य अभिनेत्रियों को लेकर आंतरिक स्त्रीद्वेष से भरी टिप्पणियां की हैं, तब उनके समर्थक दक्षिणपंथ के समर्थन में उन टिप्पणियों को देखते हुए कंगना के साथ खड़े होते थे। लेकिन कंगना व अन्य दक्षिणपंथ की समर्थक महिलाएं इस बात को समझने में चूक जाती हैं कि उनके ऐसे समर्थक उनसे पहले ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के वाहक हैं। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता महिलाओं को अपनी जड़ें मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल में तो ला सकता है। लेकिन उन्हें कभी चयन की पूर्ण स्वतंत्रता या उनके जीवन और शरीर से जुड़ी नैतिक बहसों को उनके हिसाब से निर्धारित करते नहीं देख सकता है। 

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महिलाओं और मोरल पुलिसिंग के लंबे रिश्ते को और गहराई से जानने से पहले समझते हैं कि मोरल पुलिसिंग होती क्या है? मोरल पुलिसिंग में समाज और संस्कृति का हवाला देकर किसी एक इंसान को डराया धमकाया जाता है। डराने धमकाने का स्तर कुछ भी हो सकता है। मोरल पुलिसिंग भारत के संविधान की आत्मा के ख़िलाफ़ है। मोरल पुलिसिंग में आप सामने वाले के तर्कों और अनुभवों को खारिज़ करते हुए ख़ुद को एक समुदाय की संस्कृति का रक्षक-वाहक मानते हैं और उसे दूसरे पर थोपने की पूरी कोशिश करते हैं। महिलाओं का शरीर मोरल पुलिसिंग का सबसे बड़ा टारगेट रहा है।

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आपको इसका उदाहरण अपने घर से देखने मिल जाएगा। किसी बच्ची या लड़की को किसी तरह के कपड़े पहनने पर या मोबाइल रखने पर केवल इसलिए दिक़्क़त दी गई हो क्योंकि वह लड़की होकर ऐसा कर रही है। बिहार स्थित हरला गांव में मेरी बात 26 साल के आसपास के एक लड़के से हुई जिसका मानना था कि लड़कियों को मोबाइल फ़ोन देने से वे उसका दुरुपयोग करती हैं। हालांकि पढ़ने के लिए उन्हें मोबाइल फ़ोन दिया जा सकता है। लड़का जिस घर से आता है उस घर की बहू इस साल फिर से गर्भवती है। औरत की दो बेटियां हैं, एक 14 साल की, एक 9 साल की, लेकिन परिवार में बेटे की चाहत बनी रही। इस बार उसके गर्भ में एक लड़का है ये बात अल्ट्रासाउंड कर के पता लगा लिया गया है।

मोरल पुलिसिंग भारत के संविधान की आत्मा के ख़िलाफ़ है। मोरल पुलिसिंग में आप सामने वाले के तर्कों और अनुभवों को खारिज़ करते हुए ख़ुद को एक समुदाय की संस्कृति का रक्षक-वाहक मानते हैं और उसे दूसरे पर थोपने की पूरी कोशिश करते हैं। महिलाओं का शरीर मोरल पुलिसिंग का सबसे बड़ा टारगेट रहा है।

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सोचिए कि एक पितृसत्तात्मक ढांचे में बंधे घर में महिलाएं रोज़मर्रा के जीवन में किन-किन स्तरों पर मोरल पुलिसिंग झेलती होंगी। कुछ सवाल जो उस लड़के या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे लोगों से पूछा जाना चाहिए। आख़िर कौन निर्धारित कर रहा है कि मोबाइल का ‘सदुपयोग’ या ‘दुरुपयोग’ क्या होता है। ‘सदुपयोग’ या ‘दुरुपयोग’ की यह परिभाषा क्या लड़कों पुरुषों पर लागू नहीं होती? इंसान देवत्व प्राप्त कर चुका जीव तो नहीं है लेकिन ग़लती करने का जो स्पेस, रिस्क लेकर नयी चीजें जानने-बूझने और उस दौरान कई बार असफ़ल होने का अधिकार क्या लड़कियों-बच्चियों के पास है? ज़मीन पर स्थितियां आज भी इतनी बद्तर हैं कि मोरल पुलिसिंग संबंधित ख़बरें आश्चर्य में नहीं डालती हैं। 

बात केवल एक तरह के कपड़ें न पहनने, मोबाइल न रखने या एक तरह से बाल नहीं काटने के बारे में नहीं है। बात ये है कि महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण करना पितृसत्ता का अव्वल हथियार रहा है। जैसे किसी पार्क में प्रेमी जोड़ों को देखकर उन्हें परेशान किया जाना महिला या दोनों लोग को लेकर हितकारी सोच से प्रेरित नहीं होती। बल्कि यह दृश्य समाज की उस स्थिति को भयभीत करता है जहां महिलाएं अपने चुनाव, कि वह किस के साथ सार्वजनिक स्थान पर बैठें, प्रेम ज़ाहिर करें, प्रेम में रहें, इन सबकी मनाही है। समाज का डर है कि एक आज़ाद ख़्याल महिला या किसी न किसी पड़ाव पर ऐसा होने की कोशिश कर रही महिला आसपास की कई महिलाओं को ‘बिगाड़’ सकती है। अभी रात ही में मेरे रिश्तेदारों में से एक दूर के रिश्तेदार से कल मुलाकात हुई जिन्होंने आख़री बार मुझे बचपन में देखा था।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता महिलाओं को अपनी जड़ें मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल में तो ला सकता है। लेकिन उन्हें कभी चयन की पूर्ण स्वतंत्रता या उनके जीवन और शरीर से जुड़ी नैतिक बहसों को उनके हिसाब से निर्धारित करते नहीं देख सकता है। 

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समाज में महिलाएं ग़ैर बराबरी झेल रही है इस बात को 40 वर्ष के उच्च-मध्यवर्गीय पुरुष, दो बच्चियों के पिता ने नकार दिया। फिर ‘महिला कैसे महिला’ की दुश्मन होती है यह समझाने के लिए मुझे एक कहानी सुनाई गई। कहानी में एक औरत अपने भाई के बेहद क़रीब थी। शादी के बाद औरत अपने पति के साथ कहीं गई जहां उसका भाई भी मौजूद था। रात में औरत भाई के पास चटाई पर सो गई। इससे कई महिलाएं उसके चरित्र पर बातें बनाने लगीं और आखिरकार उसे उसके पति ने छोड़ दिया। उस रिश्तेदार ने इस कहानी का शीर्षक ‘मैं बर्बाद हो गई बताया।’ मेरे लिए ये पूरी बातचीत बैठकर सुनना, उन्हें इस कहानी में ग़लती बताना या अपना पक्ष रखना बहुत ही ट्रिगरिंग अनुभव था।

ऐसे कई अधेड़ उम्र के पुरूष हमारे परिवारों में मौजूद हैं। ऊपर ऊपर से भले व्यक्ति जान पड़ते हैं क्योंकि इनके पहले सवाल ‘पढ़ाई-लिखाई’ संबंधित होते हैं। लेकिन इनके अंदर से पितृसत्ता निकलने को तैयार नहीं होती। लड़कियों को पढ़ाना नौकरी करवाने भर से सीमित नहीं है। बल्कि एक समझने-बूझने वाली इंसान अपने लिए कोई फैसला ले भले उससे परिवार के लोग सहमत हों न हों, उसे उस फैसले के लिए केवल उसके जेंडर की पहचान के कारण ट्रिगर किया जाना, खारिज़ किया जाना, परेशान किया जाना इत्यादि इस बात का प्रमाण है कि परिवार लड़की को एक नागरिक मानने से इनकार करता है। इसलिए उसके नागरिक अधिकारों को भी परिवार के ढांचे के लिए ख़तरे की तरह देखता है। 

खाप पंचायतों की पूरी कहानी इसी तरह की होती थी। साल 2021 में ही पिपलशाह गांव, मुज़्ज़फ़रनगर के खाप पंचायत ने गांव की लड़कियों को स्कर्ट और जीन्स पहनने से रोक दिया। उनके अनुसार इससे ‘समाज दूषित’ हो रहा था। विक्टिम बलेमिंग और गैस लाइटिंग एक साथ। ग्रामीण समाज में लड़कियों को एक छोटे-छोटे बुनियादी चयन के विकल्पों से बेदख़ल रखा जाता है। इसलिए जरूरी है कि महिलाओं शिक्षा को केवल नौकरी लेने के ज़रिए की तरह नहीं बल्कि उससे मिली आर्थिक स्वतंत्रता का उपयोग नैतिकता की बहस में खड़े होकर स्त्री अनुभव और स्त्री पक्ष रखने में करें। इसकी शुरुआत आपके घरों से होनी चाहिए।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है। फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से फिलॉसफी में मास्टर्स कर रही हूँ। और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई।  नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है।

साल 2021 में रिज़नल और नेशनल लाड़ली मीडिया अवार्ड मिला।

कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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