इंसानों और जानवरों के मतभेद को समझ कैसे जागरूकता फैला रही हैं डॉ. कृति करंथ
तस्वीर साभार: The Weather Channel
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पर्यावरण परिवर्तन वास्तविकता है और वैश्विक चिंता का विषय है। मानव आबादी न केवल जानवरों और पर्यावरण के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है बल्कि खुद अपनी प्रजाति के लिए भी संकट पैदा कर रही है। इससे मानव-पर्यावरण और जानवरों के बीच का संबंध अस्थिर होता है जिससे वर्तमान और भविष्य के लिए अनेक चिताएं उत्पन्न हो रही हैं। हालांकि, यह बेहतरीन है कि अब लोगों में पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है। वे जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को समझ रहे हैं और इसके प्रति दूसरो को भी जागरूक कर रहे हैं। आज हम बात करेंगे ऐसी ही एक महिला के विषय में जो पर्यावरण संरक्षण पर लोगों को जागरूक करने का काम रही हैं।

कृति करंथ एक भारतीय संरक्षणवादी, जीवविज्ञानी वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् हैं। हाल ही में वह ‘वाइल्ड इनोवेटर अवार्ड’ जीतने वाली पहली भारतीय महिला और पहली एशियाई महिला बनी है। वर्तमान में वह बेंगलुरू स्थित ‘सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज’ की निर्देशक हैं और लगभग ढाई साल से वह मुख्य संरक्षण वैज्ञानिक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। उनकी टीम मुख्य रूप से तीन प्रोजेक्ट पर काम करती है वाइल्ड सेव, वाइल्ड सुरक्षा और वाइल्ड शाले। वाइल्डसेव के तहत वन्यजीवों द्वारा होने वाले नुकसान में लोगों को जल्द से जल्द मुआवज़ा दिलाया जाता है। वाइल्ड संघर्ष के तहत दूरस्थ समुदायों को शिक्षित किया जाता है और उनको सुरक्षित रहने के तरीके समझाए जाते हैं। वाइल्ड शाले प्रोजेक्ट के तहत अगली पीढ़ी को पर्यावरण और वन्य-जीवन और को अलग-अलग नज़रिये से देखने में शिक्षित किया जाता है।

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शुरुआती जीवन

कर्नाटक के मंगलौर शहर में जन्मी कृति करंथ जानी-मानी कंजर्वेशन बायोलॉजिस्ट हैं। उनका जन्म 3 मार्च 1979 को हुआ। उनकी माता प्रतिभा करंथ एक भाषण भाषा विज्ञानी और पिता पद्मश्री के.उल्लास करंथ मशहूर कंजर्वेशन जूलॉजिस्ट हैं। उनके दादा कोटा शिवराम कारंथ भी एक प्रतिष्ठित कन्नड लेखक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता थे। पिता जूलॉजिस्ट थे, इसलिए बचपन से ही कृति ने वन्यजीवों को बहुत करीब दे देखा था। कृति जब तीन साल की थी तब उन्होंने पहला तेंदुआ देखा था। आठ साल की उम्र में वह अपने पिता के साथ बाघों को ट्रैक करने लगी थी। एक इंटरव्यू में कृति बताती हैं कि वह कभी बायोलॉजिस्ट नहीं बनना चाहती थीं। अपने पिता के बारे में बात करते हुए कृति कहती हैं, ” मुझे घंटो जानवरों को देखने का मौका मिलता था। मुझे बाहर रहना और जानवरों को देखना पसंद था, लेकिन मैंने उन कठिन संघर्षो को भी देखा था जिनका मेरे पिता और उनके सहयोगी सामना करते थे इसलिए मैं एक पेशे के रूप इसे नही अपनाना चाहती थी।”

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कृति का बचपन काफी प्रभावशाली लोगों के बीच गुज़रा। अपने पिता के करियर या नाम से प्रभावित न होकर कृति ने खुद को बेहतर ढंग से समझने के लिए अपना समय लिया। 22 साल की उम्र तक अपनी रुचि को समझते हुए उन्होंने इस रास्ते को अपने करियर के तौर पर चुना और तय किया कि वह लोगों और वन्यजीवों के बेहतर जीवन के लिए काम करेंगी।

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शिक्षा और काम

कृति ने पर्यावरण विज्ञान में अपनी पढ़ाई की। साल 2001 में कृति ने फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी से बीएस और बीए की डिग्री प्राप्त की। साल 2003 में येल यूनिवर्सिटी से एम.ई.एससी की डिग्री ली। इस दौरान उन्होंने अपना शोध कार्य भारत में किया। जहां से इस फील्ड में इनकी रूची और गहरी हुई। साल 2008 में ड्यूक यूनिवर्सिटी से पीएच.डी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पोस्ट डॉक्टरेट किया। पीएचडी के दौरान, कृति ने भारत में जानवरों की प्रजातियों पर बड़े पैमाने पर अध्ययन किया, विशेष रूप से स्तनधारी जानवरों पर जो 1850 और 2000 के बीच विलुप्त हो गए थे।

उन्होंने कई शोधकार्य किए हैं। प्रजातियों के वितरण और विल्पुत होने के पैटर्न, वन्यजीव पर्यटन के प्रभाव, मानव-वन्यजीव संबंध आदि विषयों पर आंकलन करते हुए कई अध्ययन किए हैं। उनके लगभग 100 से अधिक वैज्ञानिक लेख प्रकाशित हुए हैं। वह मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते मुठभेड़ पर भी काम कर करती हैं। वह वन्यजीवों से लोगों को होनेवाले नुकसान का मुआवजा दिलाने में मदद करती हैं। ‘वाइल्डसेव’ प्रोजेक्ट के तहत वे लगभग 10,000 से अधिक लोगों को वन्यजीवों से होने वाले नुकसान का मुआवजा दिलवा चुकी हैं। कृति लगभग 150 से अधिक युवा वैज्ञानिकों को वन्य जीवन के अध्ययन पर प्रशिक्षित कर रही हैं। उनके द्वारा किए गए कार्यों को नेशनल और लगभग 150 से अधिक बडे इंटरनेशनल मीडिया द्वारा कवर किया जाता है।

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तस्वीर साभार : The Weather Channel

I am Monika Pundir, a student of journalism. A feminist, poet and a social activist who is giving her best for an inclusive world.

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