नारीवाद बात साल 2021 में हुए नारीवादी आंदोलनों, संघर्षों और उपलब्धियों की

बात साल 2021 में हुए नारीवादी आंदोलनों, संघर्षों और उपलब्धियों की

साल 2021 चुनौतीपूर्ण साल रहा है। कॉविड-19 महामारी की दूसरी लहर ने न सिर्फ़ हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें उधेड़ दीं बल्कि पूरा समाजिक ढांचा एकदम लचर अवस्था में आ गया। आईए नज़र डालते हैं इस साल की कुछ नारीवादी घटनाओं, उपलब्धि और आंदोलनों पर जिन्होंने साल 2021 में अपनी जगह बनाई।

साल 2021 चुनौतीपूर्ण साल रहा है। कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर ने न सिर्फ़ हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें उधेड़ दीं बल्कि पूरा समाजिक ढांचा एकदम लचर अवस्था में आ गया। इन चुनौतियों के बीच यह साल नारीवादी नज़रिये से कैसा रहा। आईए नज़र डालते हैं इस साल की कुछ नारीवादी घटनाओं, उपलब्धियों और आंदोलनों पर जिन्होंने साल 2021 में अपनी जगह बनाई।

1- किसान आंदोलन में महिलाएं

कानून वापस होने तक जारी रहेगा हमारा विरोध: प्रदर्शन में शामिल महिला किसान
तस्वीर साभार: जागीषा अरोड़ा

इस साल ने ऐतिहासिक किसान आंदोलन भी देखा। ऐसे वक्त में जब जनता सिर्फ सरकारी फैसलों को आखिरी रास्ता समझकर स्वीकार कर रही है, इस आंदोलन ने लोकतंत्र में आंदोलन के भविष्य को लेकर उम्मीद पैदा की है कि जनता चाहे तो उन फैसलों को वापस करा सकती है जो मुट्ठीभर उद्योगपतियों के हक़ में लिए जा रहे हैं। किसान आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा महिलाएं भी रहीं जो अपने अधिकारों के लिए दिल्ली की सड़कों तक आईं। इस पूरे साल को समयानुसार देखें तो बहुत कुछ ऐसा होता रहा जिसने वर्तमान समय में भारतीय नारीवादी आंदोलन को मजबूती देने के साथ-साथ अलग-अलग तरह से विचार-विमर्श करने पर उसके समावेशी होने की आवश्यकता को और बढ़ा दिया है। 

2- सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायधीशों की नियुक्ति

तस्वीर साभार: NDTV

इस वर्ष सुप्रीम कोर्ट में 33 जजों में से चार महिला जज की नियुक्ति की गई जिसमें जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस बीवी नगरथना और जस्टिस बेला त्रिवेदी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जिसे न्यायिक व्यवस्था में लैंगिक समानता की ओर बढ़ते हुए कदम की तरह देखा गया है। निसंदेह न्यायिक व्यवस्था में लैंगिक समानता के लिए यह एक अच्छा फैसला था। लेकिन इससे एक सवाल यह भी उपजता है कि सुप्रीम कोर्ट में अधिकतर महिला जजों की नियुक्ति होने में सत्तर साल से ज्यादा का वक्त लगा है जिसमें हाशिए पर गए समुदाय से अभी भी महिलाएं न्यायिक संस्थाओं की मुख्यधारा में जगह नहीं बना पाईं हैं। इसीलिए जब हम सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं की हिस्सेदारी पर खुश हैं तब न्यायिक व्यवस्था के समावेशी ढांचे पर सवाल करना भी बहुत ज़रूरी है। 

3- टोक्यो ओलंपिक्स और वंदना कटारिया

हमारा जातिवादी समाज किस हक से महिला खिलाड़ियों को 'बेटी' कहकर पुकारता है?
तस्वीर साभार: Asianet

इस साल टोक्यो में ओलंपिक्स हुए जिसमें भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया, कुल सात ओलंपिक मेडल भारत के नाम आए जिसमें एक गोल्ड, दो सिल्वर और चार ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। ब्रॉन्ज मेडल में महिला हॉकी टीम भी शामिल है। महिला हॉकी टीम सेमी फाइनल तक पहुंची लेकिन ब्रिटेन से ब्रॉन्ज मेडल मैच हार गई। इस खेल में टीम प्लेयर वंदना कटारिया ने हैट्रिक लगाई थी। लेकिन जिस समाज की नसों में जातिवाद दौड़ता है वह खिलाड़ी को खिलाड़ी की तरह बाद में, जाति के तौर पर पहले देखता है। हरिद्वार में वंदना कटारिया के परिवार को कुछ लोगों ने जातिसूचक गालियां यह कहते हुए दीं कि हार की जिम्मेदार वंदना कटारिया और उन जैसे दलित खिलाड़ी हैं।

वंदना कटारिया की जाति से उन्हें पहचाना गया और उन पर तोहमतें लगाई गईं। वे लोग जो खेल पर गोष्ठियां करते हैं, सोशल मीडिया पर भारत के ओलिंपिक प्रदर्शन पर खुश होते नहीं समा रहे थे वे उतनी ही ताकत से वंदना कटारिया के साथ खड़े होते नज़र नहीं आए जबकि यह एक देश के रूप में हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए कि हमें अपने देश के खिलाड़ियों को बेहतर ट्रीट करना भी नहीं आता। जहां महिला खिलाड़ियों के सशक्तिकरण आदि की बात होती है वहां खिलाड़ियों के साथ होते भेदभाव को बारीकी से समझने की जरूरत है। महिलाएं जो अनेक समुदायों से आती हैं उसमें भी एक समुदाय की तरक्की और दूसरे तमाम समुदायों का पिछड़ जाना लैंगिक समानता के समावेशी न होने पर सवाल खड़े करता है। 

4- शैक्षणिक संस्थानों में जातिगतगत भेदभाव के खिलाफ दीपा मोहनन का संघर्ष

संस्थागत जातिवाद के ख़िलाफ़ एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरीं दीपा मोहनन
तस्वीर साभार: Bhim Army Kerala Facebook

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार बीते पांच वर्षों में उच्च शिक्षा में महिलाओं का प्रतिशत 18 प्रतिशत बढ़ा है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के अनुसार लड़कियों का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 27.3% है जो पुरुषों के 26.9% से बेहतर रेशियो है। यह अच्छी ख़बर है कि शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है लेकिन हाशिए पर किए गए समुदायों से आनेवाली महिला छात्रों के लिए चुनौतियां बढ़ ही रही हैं। हाल ही में फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ वीमेन, फोरम फॉर मेडिकल एथिक्स सोसाइटी, मेडिको फ्रेंड सर्कल और पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज, महाराष्ट्र द्वारा ‘द स्टडी ड्रमबीट ऑफ इंस्टीट्यूशनल कास्टिज्म‘ शीर्षक से एक अध्ययन किया गया था। इसमें यह स्पष्ट हुआ कि अलग-अलग तरीकों से संस्थानों में जातिगत भेदभाव किया जा रहा है जिसे ‘नॉर्मलाइज़’ भी किया जा रहा है।

ऐसे ही एक भेदभाव के खिलाफ़ महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी, कोट्टायम, केरल की दलित पीएचडी स्कॉलर दीपा मोहनन ने ग्यारह दिन की भूख हड़ताल की। दीपा इस तरह के प्रोटेस्ट के साथ दस साल के लंबे भेदभाव से जूझते हुए आखिरी रास्ते की तरह आईं। इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर नेनोसाइंस एंड नैनोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉक्टर नंदकुमार कालरिक्कल ने खुलेआम दीपा मोहनन के साथ जातिगत भेदभाव एक दशक तक जारी रखा। इतने समय में एडमिनिस्ट्रेशन ने गंभीरता से नहीं लिया और आखिरकार दीपा को भूख हड़ताल करनी पड़ी जिसे ग्यारह दिन बाद नेशनल न्यूज की तरह दिखाया गया। महिला सशक्तिकरण, शिक्षा की बात करने वाले इस समाज में दलित छात्रों को, शोषित वर्ग से आनेवाले छात्रों को अपने बुनियादी अधिकार के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है। ऐसी तमाम घटनाएं ये सवाल छोड़ती हैं कि क्या सभी महिलाएं भारतीय परिपेक्ष्य में एक समान हैं? क्या उनके संघर्ष एक समान हैं? अगर नहीं हैं तब न्याय के हर मुद्दे को हर समुदाय की नज़र से देखने, समझने की ज़रूरत है। 

5- डिजिटल स्पेस में महिलाओं का संघर्ष

सुल्ली डील्स: मुस्लिम महिलाओं की 'बोली' लगाता सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज
तस्वीर साभार: ट्विटर

भारत में सभी महिलाएं एक समान नहीं हैं, उनके संघर्ष समान नहीं हैं क्योंकि वे अलग-अलग जाति, धर्म, वर्ग से आती हैं। उच्च वर्ग/जाति, बहुसंख्यक धर्म से आती महिलाओं के अपने-अपने विशेषाधिकार हैं। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर महिलाएं लगातार शोषण और हिंसा का सामना कर रही हैं। इस साल मुस्लिम समुदाय की औरतों को ऑनलाइन सेल में डाल दिया गया। सुल्ली डील्स नाम के एक ऐप पर बिना अनुमति के तमाम मुस्लिम महिलाओं के फोटोज़ अपलोड किए गए और ‘सुल्ली ऑफ द डे’ के तौर पर महिलाओं की बोली लगाई गई।

सुल्ली शब्द महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अपमानजनक शब्द है। ज़ाहिर ही यह मुस्लिम महिलाओं का मानसिक सामाजिक शोषण करने के लिए किया गया था। एक लोकतांत्रिक देश में धर्म विशेष की औरतों के लिए कोई डिजिटल सुरक्षा न होना गंभीर समस्या है। डिजिटल एरा में जीते हुए यह सरकारी ज़िम्मेदारी है कि वह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को सुरक्षित भी बनाए लेकिन ऐसा कुछ भी होता नज़र नहीं आया है। आखिरी अक्टूबर 2021 तक भी मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। जिस मामले में जल्द से जल्द कार्रवाई होनी चाहिए थी अब वह सालों साल खिंचता रहेगा। महिला अधिकारों की बात करते हुए अगर हम महिला की पृष्ठभूमि को दिमाग में नहीं रखते हैं तो नीतियों में, कानून में, कार्यवाही में समावेशी नहीं हो रहे हैं। 

6- हिडमे मरकाम की गिरफ्तारी

हिड़मे मरकाम: जेल में बंद महिलाओं के अधिकारों की आवाज़ उठाने वाली एक्टिविस्ट
तस्वीर साभार: The Wire

तमाम पॉलिटिकल एक्टिविस्ट्स, पत्रकार अलग-अलग तरह के केस में जेलों में बंद हैं। इस साल मार्च में आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाली राजनीतिक और पर्यावरण एक्टिविस्ट हिडमे मरकाम को तमाम केस जिसमें यूएपीए भी शामिल है, के तहत गिरफ्तार किया गया। बीते नौ मार्च को दंतेवाड़ा में जब वह उन आदिवासी महिलाओं की शोक सभा में शामिल थीं जिन्हें बलात्कार के बाद मार दिया गया था, हिडमे को पैरामिलिट्री फोर्सेज ने वहां से गिरफ्तार कर लिया। यह सच है कि तमाम एक्टिविस्ट जो जेलों में बंद हैं उनके लिए निरंतर मुख्यधारा से आवाजें उठती रही हैं लेकिन हिड़मे मरकाम के लिए वे आवाज़ें तीव्रता से नहीं उठीं तब क्या यह भी समझ लेना चाहिए कि सत्ता विरोधी आवाजें भी हाशिए किए गए समुदायों की लड़ाइयों में भेदभाव करती हैं?

नारीवादी आंदोलन निरंतर चलने वाला कोई वीडियो जैसा नहीं होता है, समय-समय पर घटती घटनाएं उसमें कुछ न कुछ इसमें जोड़ती जाती हैं, डिस्कोर्स को और फैलाती हैं, सोचने-समझने और सुधार करने की ओर अग्रसर करती हैं। मौजूद हालातों के मध्य, महिलाओं की नज़र से, शोषित वर्ग की नज़र से हमें हर घटना समझने की जरूरत है और उसमें सुधार लाने के लिए एक्शन की भी जरूरत है। 


About the author(s)

आशिका

मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है और फिलफाल स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हूं।

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