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देश की अर्थव्यवस्था में एक बड़ी भागीदारी सुनिश्चित करने के बाद भी शहरी भारत में डोमेस्टिक वर्कर यानि घरेलू कामगारों के रूप में काम करनेवाली महिलाओं को सम्मानजनक व्यवहार नहीं हासिल है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 75.6 मिलियन डोमेस्टिक वर्कर्स हैं जिसमें से 76.2 फ़ीसद महिलाएं हैं। ओपी जिंदल इंस्टिट्यूट द्वारा 260 डोमेस्टिक वर्कर्स जो दिल्ली, मुंबई और कोची में रहते हैं के साथ एक स्टडी की गई। मार्च-जून 2020 में हुए जिंदल इंस्टिट्यूट के सेंटर फ़ॉर न्यू इकोनॉमिक्स स्टडीज के इस सर्वे में पाया गया कि इन घरेलू कामगारों में से 57 फ़ीसद ने कार्यस्थल पर भेदभाव झेला है। कोरोना लॉकडाउन के दौरान डोमेस्टिक वर्कर्स की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ा। तनख्वाह में कमी या शून्य कर दिया जाना, काम की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं।

ज्यादातर महिलाएं जो डोमेस्टिक वर्कर के रूप में काम करती हैं वर्ग और जातिगत पहचान में शोषित तबक़े से होती हैं। घर में शुरू से संसाधनों की कमी के कारण पढ़ाई लिखाई से वंचित रह जाती हैं, उनके पास आर्थिक रूप से परिवार या खुद को सहारा देने के लिए लोगों के घरों में काम करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता है। दिल्ली के साकेत मोहल्ले में रहनेवाली 23 वर्षीय रीना (बदला हुआ नाम) पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव से आती हैं। साकेत के सईद-उल-अज़ाएब मोहल्ले में वह अपने पति और चार साल की एक बच्ची के साथ रहती हैं। उनका एक छोटा लड़का पश्चिम बंगाल में बाकी परिवार के साथ रहता है। रीना बताती हैं, “पहले मैं और मेरे पति केरल काम करने गए थे। हमारी तरफ़ से कई लोगों को एजेंट लेकर जाते हैं। वहां कंस्ट्रक्शन साइट पर सीमेंट ढोने का काम करती थी। वह काम कभी दोबारा न करूं! बहुत मेहनत लगती थी। हम सभी को एक-एक कमरा मिला था रहने, एक कॉमन बाथरूम सभी के लिए।”

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रीना की उम्र अभी ज़्यादा नहीं है, 23 की उम्र में ही काम की तलाश में उन्होंने कई कठिन परिस्थितियों को पार किया है। जब वह घरों में काम करने जाती हैं तो बच्ची को अपने घर में बंद करके जाती हैं। पति क्या काम करता है, इसके जवाब में वह कहती हैं , “आजकल तो केवल मैं ही कमाती हूँ।” केरल में अपने काम के अनुभवों को याद करते हुए वह सहम जाती हैं। सांस्कृतिक रूप से केरल उनके लिए एकदम नया था। रीना के अनुसार उस जगह पर वह ‘अपनापन’ महसूस नहीं करती थीं। हालांकि, दिल्ली में भी रीना की आर्थिक हालात बहुत ठीक नहीं है। वह और काम की तलाश में हैं लेकिन मिलना मुश्किल लग रहा है।

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घरेलू कामगारों को अपमानित करते हुए ऐसे और कई रील्स आपको इंस्टाग्राम पर मिल जाएंगे। एक तरह से वर्किंग क्लास का मज़ाक बनाना इन लोगों के लिए आम है। ये अपनी सुविधाओं के बाहर कुछ देखना नहीं जानते। इस तरह का भद्दा, मज़ाकिया रील बनाने और देखनेवाले समाज के लोग डोमेस्टिक वर्क्स को किसी कर्मचारी की तरह देखते होंगे और उनके साथ वैसे ही पेश आते होंगे सोचना मुश्किल लगता है।

हालांकि भारत के शहरी परिवेश के जिन घरों में डोमेस्टिक वर्कर्स काम करते होंगे उन घरों के लोगों की उनके प्रति मानसिकता सोशल मीडिया पर आए दिन दिख जाती है। हाल ही में nidhisharma.life नाम के अकाउंट जिसके पास एक बड़ी ऑडियंस है, इस यूज़र ने ‘कामवाली आंटी’ को ‘शेडी’ लिखते हुए एक रील बनाई है। रील में किसी के आसपास न होने पर उन्हें पैसे छिपाकर रखते दिखाया गया है। घरेलू कामगारों को अपमानित करते हुए ऐसे और कई रील्स आपको इंस्टाग्राम पर मिल जाएंगे। एक तरह से वर्किंग क्लास का मज़ाक बनाना इन लोगों के लिए आम है। ये अपनी सुविधाओं के बाहर कुछ देखना नहीं जानते। इस तरह का भद्दा, मज़ाकिया रील बनाने और देखनेवाले समाज के लोग डोमेस्टिक वर्कर्स को किसी कर्मचारी की तरह देखते होंगे और उनके साथ वैसे ही पेश आते होंगे सोचना मुश्किल लगता है।

कोरोना में जब जो लोग सक्षम थे, अपने आसपास मदद का हाथ बढ़ाने की बात कर रहे थे, हर कोई मानवतावादी बातें कर रहा था, संसाधनों को बांटकर इस्तेमाल करने की तरफदारी हो रही थी तब डोमेस्टिक वर्कर्स इतनी बड़ी संख्या में नज़रअंदाज़ क्यों हुए होंगे। कारण, मदद करते हुए भी वर्ग और जाति का पूर्वाग्रह बना रह गया हो।

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कोरोना महामारी के समय रोज़गार में गिरावट हर क्षेत्र में देखने को मिला। लेकिन पहले से ही कम संसाधन और कमज़ोर आर्थिक वर्ग के लोगों के लिए आमदनी बंद हो जाने के कारण सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ा है। द स्क्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले 56.9 फ़ीसद घरेलू कामगार 3001 रुपये से 6000 रुपये तक कमा पाते थे। लॉकडाउन में इनकी भागीदारी मात्र 22.8 फ़ीसद रह गई।

बिज़नस स्टेंडर्ड में छपी एक रिपोर्ट में घरेलू कामगार सरस्वती आर बताती हैं, लॉकडाउन के दौरान उनके बच्चे नहीं समझ पा रहे थे कि वे भूखे क्यों हैं। सरस्वती के तीन बच्चे हैं, महीने के 500 रुपये में उनका पेट भर पाना नामुमकिन था। मार्च 2020 में पहले लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी। EPW में प्रकाशित नई दिल्ली और गुरुग्राम में किए गए टेलिफोनिक सर्वे के मुताबिक़, दिसंबर 2020 तक 31 फ़ीसद वर्कर्स को दोबारा कोई काम नहीं मिला पाया था। इनमें से बहुत कम लोगों को उन घरों से मदद मिली जिनके लिए वे काम करते थे। 

डॉमेस्टिक वर्क करने वाले लोगों पहले से ही आर्थिक मार झेल रहे हैं और इसी बीच नया वायरस म्यूटेंट ओमनीक्रोन आ चुका है। दुनिया के कई देश बढ़ते केस की संख्या देखते हुए फिर से लॉकडाउन लगाने की बात कह रहे हैं। भारत में जिस हिसाब से डोमेस्टिक वर्कर्स को मुश्किलें उठानी पड़ी हैं, जरूरत है कि लोग उनके प्रति संवेदनशील और सम्मानजनक व्यवहार रखें। नारीवाद की बात करते हुए वर्किंग क्लास की इन महिलाओं को इस चर्चा और हक़ की लड़ाई में अनदेखा किया जाना ग़ैर समावेशी है। 

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तस्वीर साभार : Qrius

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है। फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से फिलॉसफी में मास्टर्स कर रही हूँ। और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई।  नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है।

साल 2021 में रिज़नल और नेशनल लाड़ली मीडिया अवार्ड मिला।

कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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