फ़ूड हैबिट या भोजन प्रणाली
तस्वीर: सुश्रीता बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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फूड हैबिट या भोजन प्रणाली का अध्ययन सामजिक शोधकर्ताओं के लिए नया नहीं है, पर भोजन को एक सामाजिक विशेषाधिकार के तौर पर अध्ययन करना ज़रूर नया है। भोजन किसी भी समाज के लिए एक आवश्यक तत्व है। बीते कुछ वर्षों में भोजन के आसपास होने वाली बहस जिसमे व्यक्तियों के पहचान से संबंधित प्रश्न छिपे हैं जिससे इस बहस को अधिक बढ़ावा मिला है। अब वह पोहे खाने के तरीके की बात हो या किसी मंत्री के किसी गरीब व्यक्ति के घर जाकर भोजन करने की बात। अनाज का संरक्षण मानव सभ्यता के लिए एक क्रांति की तरह था, जो मनुष्य को बाकी जीव सत्ता से अलग करती है। आज हम उस समाज में हैं जहां वीगनिज्म एक बड़ी बहस का मुद्दा है। हमारे आस-पास एक ऐसा समाज तैयार किया जा रहा है जहां मांस खाने को सामाजिक बुराई के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है और इस प्रवृत्ति के चलते कई सारे मानवीय समूहों का अपराधीकरण किया जा रहा है। 

हम सबने वह कहावत सुनी होगी, “जैसा खाए अन्न वैसा बने मन।” भोजन के साथ शुचिता का प्रश्न बहुत पुराना है, जिसके चलते इस जातिवादी समाज में कुछ जातियों को उच्च और कुछ को निम्न का दर्जा दिया गया है। साल 2018 में यह खबर सुर्ख़ियों में थी कि कुंभ मेले में सिर्फ उन्हीं पुलिसकर्मियों की ड्यूटी होगी जो मांसाहार और शराब का सेवन नहीं करते हो।

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अगर आप सवर्ण जाति के शाकाहारी परिवारों से हैं तो विशेष रूप से अपने घरों में यह बातें ज़रूर सुनी होगी कि मांसाहार का सेवन करनेवाले व्यसनी होते हैं। उनका चरित्र ख़राब होता है, जैसे वे बेरहमी से जानवर को मारके खा सकते है वैसे वे इंसानों की भी हत्या करने से पीछे नहीं हटेंगे।” यथार्थ के धरातल पर ये सब बातें सच से कोसों दूर होती हैं। मैं अगर खुद की बात करूं तो एक वक्त मांसाहार भोजन करना और घर पर ये बात स्वीकार करना ही मुझे क्रांति लगती थी।

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फूड हैबिट या भोजन प्रणाली का अध्ययन सामजिक शोधकर्ताओं के लिए नया नहीं है, पर भोजन को एक सामाजिक विशेषाधिकार के तौर पर अध्ययन करना ज़रूर नया है। भोजन किसी भी समाज के लिए एक आवश्यक तत्व है। बीते कुछ वर्षों में भोजन के आसपास होने वाली बहस जिसमे व्यक्तियों के पहचान से संबंधित प्रश्न छिपे हैं जिससे इस बहस को अधिक बढ़ावा मिला है।

यह बात सिर्फ जो सुनने में इतनी सी लगती है दरअसल है नहीं। इसके द्वारा किसी भी समाज के साथ एक स्टिग्मा जोड़ा जाता है और यह आज से नहीं है। यदि आप इतिहास की ओर देखेंगे तो पाएंगे कि एक धर्म और समुदाय के खिलाफ़ नफरत बढ़ाने के लिए उनके खाने-पीने के ढंग पर हमले किए जा रहे हैं। किसे याद नहीं है कि गाय के मांस खाने की अफवाह ने कितने ही लोगों की जान एक भीड़ ने ले ली। यह नफ़रती प्रोपेगंडा हमारे दिमागों में भोजन और चरित्र की शुद्धता के विचार के चलते ही आता है। यह प्रोपगंडा उतना ही पुराना है,,जितना पुराना हिन्दू खतरे में हैं का विचार।

अगर हम इतिहास के पीछे जाते हैं तो १९२० से ६० के दौरान ऐसे वक़्त था जबकि हिन्दू महासभा द्वारा इस बात का प्रचार जोर पर था कि मांसाहार का सेवन व्यक्ति के चरित्र को कमज़ोर करता है। वे व्यसनी होते हैं। मांसाहार को एक तामसिक गुण का भोजन बताया गया। इस दौर में बुकलेट छापी गई कि हिन्दुओं को अपनी स्त्रियों की रक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने होंगे। चारु गुप्ता अपनी किताब, सेक्सुअलिटी, ओब्सिनिटी, कम्युनिटी; वीमेन मुस्लिम्स एंड हिन्दू पब्लिक इन कोलोनियल इंडिया में भोजन को जेंडर, जाति और संप्रदाय के प्रश्न से जोड़ती हैं।

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भोजन हमारे जीवन का इतना बड़ा सांस्कृतिक कारक है जिसकी छाप हमारे दिल और दिमाग में अधिक है। पिछले साल जब मैं राजस्थान में अपने फील्ड वर्क के लिए आंकड़े जुटा रही थी तब एक विशेष समुदाय बागरिया के लिए गाँव के ही कई लोगों ने कहा, “वे बहुत गंदे है और वे किसी भी जानवर का मांस खा लेते हैं।” इस समुदाय को गाँव में बहुत ही ख़राब तरीके से देखा जाता है। इस एक वाक्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि भोजन के आसपास का स्टिग्मा एक पूरे समुदाय को हाशिये पर धकेल देता है। यह बात भी बहुत ध्यान देने वाली है कि उस गाँव में अधिकतर समुदाय जनजाति समाज ही है और लगभग सभी परिवारों में मांसाहार का सेवन किया जाता है।

इसमें हमारी क्या भूमिका है और कहां हमें सोचने की ज़रूरत है? दरअसल यह सवाल है कि भारत जैसे देश में जहां कृषि युक्त भूमि है वहां लोग क्या केवल स्वाद के लिए मांसाहार का सेवन करते हैं जवाब है नहीं। हमारी सामुदायिक बनावट भी इस प्रकार की है कि एक विशेष समूह तक ही भोजन भी उपलब्ध हो पता है और बाकी का समुदाय अन्त्यज भोजन पर निर्भर करता है। जैसे मुसहर जाति के लोगों का भोजन चूहा इसलिए नहीं है कि उसमें स्वाद है बल्कि इसलिए है क्योंकि वे सवर्ण जातियों की तरह मांस का सेवन आर्थिक और सामाजिक तौर पर स्वाद के लिए कर नहीं सकते हैं। उन्हें तमाम बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। हमारे समाज में ऐसे कई आदिवासी घुमंतू समुदाय के लोग हैं जो स्थानीय आपूर्ति के अनुसार ही भोजन कर सकते है। जब हम भोजन को शुचिता से जोड़ते हैं तो उसमें हमारे ईश्वर की या हमारे विश्वास की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है और बतौर समाजशास्त्री मैंने प्रत्येक समाज में इस बात को पाया है कि, कोई भी समुदाय जिस प्रकार का भोजन करता है, उसी भोजन को अपने देवता को भी समर्पित भी करता है। तो कुल मिलाकर देवता को कोई दिक्कत है, ऐसा तो नहीं लगता है। 

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अतः यह भोजन और उसकी शुद्धता का प्रश्न बेहद एलिट और प्रिवलेज जगह से आता है। इसमें जाति, जेंडर और धर्म की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ऐसा एकदम नहीं है कि लोग अपने स्वाद के लिए मांसाहार का सेवन नहीं करते हैं। लेकिन इसके नाम पर किसी की हत्या कैसे की जा सकती है, क्योंकि मॉब लिचिंग भी वही समुदाय झेल रहा है, जो भोजन की इस श्रंखला में पहले से ही आखिर में हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि क्या विगनिज़्म और अन्य समुदाय के विकास का प्रश्न साथ-साथ जा सकता है? तो जवाब है विगनिज़्म एक बेहद खर्चीला उपाय है। इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को खाने के लिए पर्याप्त पोषण युक्त अनाज मिले। दूध की मात्र इतनी प्रचूर हो कि वह सभी व्यक्तियों तक पहुंचे। अब यदि मांस खाने के प्रश्न पर आए तो यह बेहद व्यक्तिगत प्रश्न है। इसको बड़े प्रश्न में रखकर देखे तो एक व्यक्ति के मांसाहार के सेवन के मुकाबले बड़ी कंपनियों द्वारा जानवरों के शोषण, बड़ी मात्रा में भोजन फेंका जाना बेहद कम है।

भोजन एक व्यक्तिगत, सामाजिक कारक है, जिसका चरित्र निर्माण में कोई योगदान नहीं है। साथ ही भोजन के पीछे अक्वायर्ड टेस्ट की भी भूमिका होती है। हम जिस समाज और परिवेश में पले-बढ़े होते हैं, उसी समाज के अनुसार हमारा भोजन और व्यवहार होता है। इसलिए विगानिज़्म किसी भी समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बने यह उसके पहले से चले आ रहे सांस्कृतिक कारकों से भी प्रभावित होता है जो कि प्रत्येक समाज के लिए अलग है और विभिन्नता का सम्मान भोजन के साथ ही शुरू होता है। 

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तस्वीर : सुश्रीता बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

स्रोत:

चारु गुप्ता- सेक्सुअलिटी, ओब्सिनिटी, कम्युनिटी; वीमेन मुस्लिम्स एंड हिन्दू पब्लिक इन कोलोनियल इंडिया

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