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‘मम्मी कहां हैं? किचन में’ किसी रिश्तेदार के फ़ोन पर यह सवाल पूछने पर अमूमन यही जवाब होता था। बचपन में इस बात पर हैरत भी नहीं होती थी। मम्मी ‘किचन में और पापा ड्राइंग रूम में’, यही सामान्य लगता था। बड़े होने और कुछ जानने-समझने पर पता चला कि कैसे हम लोग ने अलग-अलग जगहों को भी जेंडर से निर्धारित कर लिया है। 

जनवरी 2021 में रिलीज़ हुई मलयाली फ़िल्म- ‘द ग्रेट इंडियन किचन’। देखने में जितनी सुंदर फ़िल्म है, उतनी ही झकझोर देने वाली भी। डायरेक्टर जीओ बेबी बताते हैं कि फिल्म के टाइटल में व्यंग्य है कि कैसे घर की इतनी मुख्य जगह भी महिलाओं के लिए जेल बन सकती है। फ़िल्म की मुख्य पात्र अपने पति और ससुर के लिए सुबह से शाम स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। घर का हर काम करती हैं, वह भी अकेले। उसके ससुर उसे घर के लिए ‘शुभ’ बताते हैं। जब मुख्य पात्र से ये सब और सहन नहीं किया जाता, वह बस अपने पति का घर छोड़कर चली जाती है, कभी वापस न आने के लिए।

फ़िल्म में कई बातें ग़ौर करने लायक हैं। उनमें से दो हैं, मुख्यपात्र का पति और उसके ससुर बहुत ही शांत स्वभाव के हैं। वे मुस्कुरा कर बात करते हैं और कभी गुस्सा नहीं हुए, कभी हाथ नहीं उठाते। यह दिखाता है कि उत्पीड़न के कई रूप होते हैं। दूसरा यह कि फ़िल्म में किसी भी किरदार को नाम नहीं दिया गया है। उन किरदारों में हम सबकी झलक है। हमारे परिवार की झलक है। हमें पता है हम खुद कौन से पात्र हैं। 

काफी लोग कहते नज़र आते हैं, ‘कौन कहता है पुरुष खाना नहीं बनाते? किसी बड़े रेस्टोरेंट में जाकर देखो! आदमी ही तो सारे शेफ हैं!’ ठीक है! सही बात है पर उन पुरुषों को घर आकर क्या हो जाता है?

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महिलाओं को किचन तक सीमित क्यों रखा जाता है?

काफी लोग कहते नज़र आते हैं, ‘कौन कहता है पुरुष खाना नहीं बनाते? किसी बड़े रेस्टोरेंट में जाकर देखो! आदमी ही तो सारे शेफ हैं!’ ठीक है! सही बात है पर उन पुरुषों को घर आकर क्या हो जाता है? इसके साथ ही हमें उतनी ही महिलाएं शेफ के रूप में क्यों नहीं दिखतीं? इस बात से यह तो साफ है कि खाना किसी जेंडर पर आधारित काम नहीं है। तो माजरा क्या है? माजरा है घर और बाहर की दुनिया का!

सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी पितृसत्ता ने एक मॉडल बना दिया है कि मर्द घर से बाहर जाकर कमाएगा और औरत घर संभालेगी। यह हमारी मानसिक ‘पावर पॉलिटिक्स’ को दिखाती है। प्राइवेट जगहें, जैसे घर और किचन, महिलाओं के लिए उचित बताई जाती हैं। वहीं, सारी पब्लिक जगहें- ऑफिस, खेल का मैदान, सड़क आदि अमूमन मर्दों के लिए बेहतर मानी जाती हैं। कोई औरत इन क्षेत्र में अपन नाम बनाना चाहे तो उसे ‘मर्दाना’ करार देते हैं। 

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जो मर्द खाना बना भी सकते हैं उनके पास एक ‘चॉइस’ होती है। जब मन किया बना लिया, नहीं तो माँ/बीवी/ बेटी तो है ही बनाने के लिए। यह ‘चॉइस’ महिलाओं के पास नहीं है।

सालों की चली आ रही कंडीशनिंग

जुडिथ बटलर, एक अमेरिकी दार्शनिक बताती हैं कि जन्म से ही ‘सेक्स’ के आधार पर समाज लोगों को एक ढांचे में ढाल देता है। लड़का है तो बंदूक से खेलेगा, गुलाबी कपड़ा नहीं पहनेगा आदि। लड़की किचन-किचन खेलेगी, श्रृंगार करेगी वगैरह। समाज में फिट के लिए हम इन रोल को निभाते भी हैं, ताकि हमें औरों से अलग न देख जाए। कहने का मतलब है कि जेंडर और कुछ नहीं सिर्फ समाज के द्वारा निर्मित एक ढांचा है। बायोलॉजिकल रूप से इसका कोई प्रमाण नहीं है। सदियों से हमलोग ने ‘माँ के हाथ का खाना’, ‘नानी के हाथ के लड्डू’ इत्यादि को ग्लोरिफाई कर रखा है। वक़्त है अब इन नैरेटिव को बदलने का। 

क्या मर्द वाकई खाना नहीं बना सकते?

जो मर्द खाना बना भी सकते हैं उनके पास एक ‘चॉइस’ होती है। जब मन किया बना लिया, नहीं तो माँ/बीवी/ बेटी तो है ही बनाने के लिए। यह ‘चॉइस’ महिलाओं के पास नहीं है। देखा जाए तो चॉइस होना ही आज़ादी है और आज़ादी पावर है और महिलाओं को इन सब से वंचित रखा गया है। कहीं वे पुरुष के बराबर साबित न हो जाएं! आपने कई बार पुरुषों को कहते सुना होगा, ‘पूरा दिन आफिस का काम करके आता हूं, अब ‘इतना तो’ महिलाएं कर ही सकती हैं!’

‘चॉइस’ न होने के कारण कई महिलाओं को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ती है तो कइयों को बच्चे पैदा होने के बाद अपनी नौकरी भी छोड़नी पड़ती है। मेरा एक दोस्त बताता है कि कैसे उसकी दादी ने ही उसके पापा को कभी किचन में न घुसने की हिदायत दी है! सदियों से माना जाता रहा है कि महिलाओं का खाने से ज़्यादा गहरा संबंध है। आखिर दोनो ही प्रजनन और अपनो को पोषित करते हैं! हमें ऐसे एकतरफा नज़रिये को बदलना होगा और समानता की ओर हर छोटा-बड़ा कदम उठाना होगा। अभी भी वो वक़्त दूर है जब हमें एक मर्द को किचन में देखकर हैरत न हो!

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तस्वीर साभार : The Scroll

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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