टीचर बनना ही महिलाओं के लिए एक सुरक्षित विकल्प क्यों मानता है हमारा पितृसत्तात्मक समाज
तस्वीर साभार: Huffpost
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“लड़कियों के लिए टीचर की नौकरी सबसे अच्छी है।” यह बात टीचिंग प्रोफेशन को लेकर सब ने ज़रूर सुनी होगी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में टीचिंग प्रोफेशन किस तरह पितृसत्ता के हित में काम करता है। दरअसल टीचर हर वह व्यक्ति बन सकता है जो खुद इतना शिक्षित हो चुका हो कि बच्चों को पढ़ा सके। लेकिन पितृसत्तात्मक समाज ने टीचिंग के पेशे को लिंग के आधार पर बांट दिया है। औरतों के लिए टीचर की नौकरी सबसे बेहतर मानी जाती है। पितृसत्तात्मक समाज ने अपनी उदारता दिखाते हुए औरतों का घरों से निकलकर नौकरी करने के फैसले को हज़म तो कर लिया है पर महिलाओं के लिए पितृसत्ता ने नौकरी के क्षेत्र और विकल्पों को सीमित रखा। जितनी आज़ादी पुरुष को मनचाही नौकरी करने की है, उसकी आधी आज़ादी भी महिलाओं को नहीं है।

पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं के हर क्षेत्र में नौकरी नहीं करने के लिए कई तरह की दलीलें भी देता है। साथ ही टीचिंग जॉब को महिलाओं के लिए उचित बताते हुए इसकी खूबियां भी बताता है। उदाहरण के तौर पर हम लड़कियों ने यह बात अपने घर-परिवार और बाहरवालों से ज़रूर सुनी ही होगी, “बेटा टीचर ही बनना ,’बीएड’ कर लो टीचर बन जाओ, नौकरी और घर दोनों संभाल लोगी।” ये बातें कभी किसी मर्द के लिए नहीं कही जाती क्योंकि पितृसत्ता घर-परिवार संभालने की ज़िम्मेदारी केवल महिलाओं के कंधे पर डालना जानती है। पितृसत्तात्मक सोच में रचा-बसा यह समाज समय के साथ पितृसत्ता के रूढ़िवादी सोच को मॉडर्न ढांचे में फिट कर चुका है जहां नौकरी को भी लिंग के आधार पर बांट दिया गया है।

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पितृसत्ता एक अच्छी औरत होने की यही पहचान मानता है कि जो औरत अपना परिवार संभालती है, जिसका जीवन केवल पुरुष और उसके परिवार तक सीमित होता है। अपना करियर चुनने से पहले औरतों को अपनी पहली प्राथमिकता अपने परिवार को ही बनाना पड़ता है। वे अपने परिवार के हिसाब से ही अपनी पेशेवर जिंदगी को चुनती हैं। शिक्षकों का काम ज्यादातर सुबह से दोपहर तक का ही होता है। इसके बाद स्कूल से घर आकर अपना समय परिवार और बच्चों के बीच बिता सकते हैं। इसी का फायदा उठाते हुए पितृसत्तात्मक समाज ने सभी महिलाओं के लिए शिक्षक की नौकरी को सबसे बेहतरीन बताया।

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औरतों के लिए टीचर की नौकरी सबसे बेहतर मानी जाती है। पितृसत्तात्मक समाज ने अपनी उदारता दिखाते हुए औरतों का घरों से निकलकर नौकरी करने के फैसले को हजम तो कर लिया है पर महिलाओं के लिए पितृसत्ता ने नौकरी के क्षेत्र को सीमित रखा। जितनी आजादी पुरुष को मनचाही नौकरी करने की है, उसकी आधी आज़ादी भी महिलाओं को नहीं है।

किसी भी महिला के लिए उसका परिवार और समाज तब चुनौती बन जाता है जब वह शिक्षक की नौकरी न करके किसी और पेशे में जाना चाहती है। किसी और क्षेत्र में जाना की सोचने पर ही महिलाओं के लिए पितृसत्तात्मक समाज मुश्किलें खड़ी कर देता है। दबाव में आकर कई महिलाओं को अपनी मर्ज़ी के बिना टीचिंग जॉब को ही चुनना पड़ता है। अक्सर किसी और फील्ड की जॉब करने पर पितृसत्तात्मक समाज अपनी दलीलें पेश करते हैं। जैसे, वर्कप्लेस में महिलाओं के साथ होनेवाले शोषण, देर रात काम करके घर आने में सुरक्षा का मुद्दा, परिवार का ध्यान न रखना, घर के काम न पूरे कर पाना आदि। ऐसी कई नकारात्मक बातें हैं जो महिलाओं के किसी दूसरे क्षेत्र में नौकरी करने पर कहीं जाती हैं।

वहीं, पुरुषों के लिए ऐसी कोई बात नहीं कही जाती। मर्दों पर न तो किसी ख़ास तरह की नौकरी करने के लिए दबाव दिया जाता है और न ही उसके फायदे गिनाए जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पितृसत्ता मानती है कि घर संभालना केवल औरत का काम होता है पुरुष का नहीं। चाहे पुरुष नौकरी करें या न करें फिर भी उनकी ज़िम्मेदारी परिवार या बच्चों को संभालने की नहीं होती। पितृसत्तात्मक समाज की संरचना में काम ‘लिंग के आधार’ पर बांटे गए हैं। ऐसे में भले ही महिलाएं कोई भी नौकरी क्यों न करती हो, उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे नौकरी करने के साथ-साथ घर भी संभालें। पितृसत्तात्मक सोच मैं यह टैबू है कि पुरुषों की भूमिका केवल औरतों के साथ मिलकर परिवार बनाने में है। इसके बाद उनकी ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है और परिवार को संभालना केवल महिलाओं का कर्तव्य है। इसके कारण उन्हें टीचिंग, बैंकिंग जैसी नौकरी करने के लिए ही शिक्षा दिलवाई जाती है ताकि वे दिन के उजाले में घर आ जाएं और अपना परिवार भी संभाले।

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लेकिन शिक्षक बनने का विशेषाधिकार भी उन्हीं महिलाओं तक सीमित रह जाता है जिनके पास उच्च शिक्षा होती है। समाज में आज भी पितृसत्ता की पुरानी जड़ें फैली हुई हैं जिसका असर कुछ यूं महिलाओं पर पड़ता है कि बहुत कम ही ऐसी औरतें होती हैं जिन्हें परिवार द्वारा उच्च शिक्षा दिलवाई जाती है। अधिकतर देखा यह जाता है कि महिलाओं को मैट्रिक या इंटर तक पढ़ाकर उनकी शादी कर दी जाती है। भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में औरतों की शादी जल्द से जल्द करा देना उचित समझा जाता है।

ऐसे में महिलाएं उच्च शिक्षा ले नहीं पाती न वे आगे नौकरी कर पाती हैं। बहुत कम महिलाएं हैं जो पितृसत्ता के खोखले नियमों से ऊपर उठकर उच्च शिक्षा ले पाती हैं और टीचर बन पाती हैं। भले ही आज महिलाएं पुरुषों की तरह बाहर जाकर काम करती है लेकिन पुरुषों के मुकाबले उनके अधिकार सीमित हैं। चाहे वह अधिकार नौकरी चुनने का हो या घर-परिवार , समाज आदि में ही अपने अस्तित्व को लेकर। भारतीय महिलाएं आज भी इस आधुनिक युग में हर रोज़ सामना करती हैं पितृसत्तात्मक सोच के नए-नए रूपों का।

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पेशे से एक पत्रकार ,जज्बातों को शब्दों में लिखने वाली 'लेखिका'
हिंदी साहित्य विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से BA(Hons) और MA(Hons) मे शिक्षा ग्रहण की फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में शिक्षा ली । मूलतः उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध रखती हूँ और दिल्ली में परवरिश हुई । शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेशों में नारी आस्मिता पर पितृसत्ता का प्रभाव देखा है जिसे बेहतर जानने और बदलने के लिए 'फेमनिज़म इन इंडिया' से जुड़ी हूँ और लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहतीं हूँ।

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