'अपना खून' कितनी जातिवादी और पितृसत्तात्मक है यह सोच!
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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चित्रसेनपुर गाँव की पार्वती (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उसके ससुराल वाले और पति अक्सर उसके साथ बुरी तरह मारपीट करते हैं। जब से उसकी बेटी का जन्म हुआ तब से उसके साथ मारपीट का सिलसिला शुरू हो गया। यहां लग रहा होगा कि मारपीट की वजह लड़की का जन्म होगा। लेकिन ऐसा है नहीं। दरअसल, पार्वती के साथ मारपीट का कारण है उसकी बेटी की रंगत। पार्वती की बेटी का रंग अपने पिता से काफी अलग है। इसलिए उसके ससुराल वालों का मानना है कि पार्वती की बेटी का पिता कोई और है, क्योंकि उसकी रंगत उसके पिता से नहीं मिलती। इसलिए आए दिन पार्वती के साथ मारपीट की जाती है। इतना ही नहीं छोटी बच्ची के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है।

‘रक्त की शुद्धता’ के बारे में हमलोग अक्सर सुनते हैं जिसे आम बोलचाल में ‘अपना खून’ भी कहा जाता है। आज जब हम लोग शिक्षा, विज्ञान और तकनीक की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं लेकिन अभी भी ‘अपनी जाति, अपना खून’ जैसे दकियानूसी विचारों की वजह से महिलाओं के साथ हिंसा होना आम है। पार्वती के साथ होनेवाली हिंसा ‘रक्त की शुद्धता’ की बजाय अज्ञानता का ही प्रतीक है, जिसमें बच्ची के रंगत के आधार पर उसके साथ हिंसा हो रही है। यहां भी एक विचार साफ़ हो जाता है कि जब बच्चे माँ की रंगत, शक्ल-सूरत के हो तो उसे हमारा समाज उतने खुले दिल से स्वीकार नहीं करता है। अगर बच्चे की रंगत उसकी शक्ल-सूरत पिता की तरह हो तो इससे किसी को भी कोई दिक़्क़त नहीं होती। यह बात किसी को भी परेशान नहीं करती कि बच्चे में माँ की रंगत या शक्ल-सूरत से मिलता-जुलता कुछ नहीं है।

“जब इस रक्त की शुद्धता या अपना खून वाली बात को अपने आसपास की ज़िंदगी में भी देखने की कोशिश करती हूं तो यही समझ में आता है कि यह ‘अपना खून’ की सोच ही है जो लोग बच्चे गोद लेने से कतराते हैं। कई बार ऐसे दंपतियों को देखा है जिनकी कोई संतान नहीं है और वे सिर्फ़ इस आधार पर बच्चे गोद नहीं लेते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि गोद लिया हुआ बच्चा उनका अपना खून नहीं है।”

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रक्त की शुद्धता या अपने खून होने का विषय बहुत मज़बूती से आज भी हम लोगों की ज़िंदगी में क़ायम है। यह अलग-अलग तरीक़े से हम लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करती है। यह जातिवादी, पितृसत्तात्मक विचार समाज के कई पहलुओं को सिरे से प्रभावित करता है। पार्वती से बात करने के बाद जब मैंने और भी कई महिलाओं के साथ इस विषय पर बात की तो उन्होंने ने भी ऐसे कई अनुभव बताए जहां बच्चे की शक्ल-सूरत पिता से न मिलने पर महिलाओं को चरित्रहीन मान लिया जाता है। इसके बाद, उनके साथ हिंसा करने की मानो सभी को एक वाजिब वजह मिल जाती है।

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हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह विचार ही महिलाओं को शादी के बाद माँ बनने का मुख्य आधार बन जाता है, क्योंकि कहीं न कहीं ये आधार ही महिलाओं के चरित्र की शुद्धता को बताता है। ‘अपना खून’ का मुद्दा किस तरह महिलाओं की यौनिकता पर पितृसत्ता का शिकंजा क़ायम रखने का काम करता है वो इससे साफ़ पता चलता है।

जब इस रक्त की शुद्धता या अपना खून वाली बात को अपने आसपास की ज़िंदगी में भी देखने की कोशिश करती हूं तो यही समझ में आता है कि यह ‘अपना खून’ की सोच ही है जो लोग बच्चे गोद लेने से कतराते हैं। कई बार ऐसे दंपतियों को देखा है जिनकी कोई संतान नहीं है और वे सिर्फ़ इस आधार पर बच्चे गोद नहीं लेते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि गोद लिया हुआ बच्चा उनका अपना खून नहीं है। कहीं न कहीं यही वजह है कि गाँव-शहर की दीवारों पर एक तरफ जहां निसंतान दम्पति मिले के इश्तहार देखने को मिलते हैं और दूसरी तरफ़ अनाथ बच्चों की बड़ी संख्या हमारे सामने आती है। यह पितृसत्तात्मक सोच ही है जो बच्चों की चाह रखनेवाले लोगों को अनाथ बच्चों को अपनाने से रोकते हैं।

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वैसे तो हमारा संविधान देश के नागरिकों को अपनी मर्ज़ी से शादी करने का अधिकार देता है। लेकिन हमारा समाज इस अधिकार को सीधे से नकारता है। इसीलिए अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह को हमारा समाज स्वीकार नहीं करता, जिसकी वजह से आए दिन हम लोग न्यूज़ में ऑनर किलिंग के मामले देखते हैं। अब जब हम लोग इस हिंसा की जड़ को देखे तो कहीं न कहीं ये रक्त की शुद्धता का मुद्दा ही है जो दूसरे धर्म या जाति में शादी करने को ग़लत मानता है। यह साफ़ है कि किसी भी जाति-धर्म के खून की शुद्धता तब तक क़ायम रहेगी जब तक लोग जाति व्यवस्था को कायम रखेंगे। ऐसे में जब अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादी होती है तो उसके बाद जन्म लेनेवाले बच्चों को हमारा पितृसत्तात्मक समाज स्वीकार नहीं करता है।

रक्त की शुद्धता का मुद्दा ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से जुड़ा हुआ है, जो समाज में महिला-पुरुष जेंडर के आधार पर ही समाज की कल्पना करता है। साथ ही एक ही जाति-धर्म से पैदा होने वाले बच्चों को स्वीकार करता है। लेकिन ये विचार अलग-अलग स्तर पर हिंसा को बढ़ावा देने का काम करता है, जिससे शिक्षा, तकनीक और विज्ञान के नाम पर आगे बढ़ते समाज में भी पितृसत्ता का मूल्य क़ायम रहता है और न चाहते हुए भी हमें इसे स्वीकार करना पड़ता है। किसी भी बदलाव के लिए ज़रूरी है कि हम पहले उन तमाम जड़ताओं को तलाशें जो समाज के विकास को प्रभावित करती है, उसके बाद ही हम किसी बदलाव की तरफ़ सतत कदम उठा पाएंगें। इसलिए इस पितृसत्तात्मक सोच को अपनी ज़िंदगी में तलाशिए और उसे चुनौती दीजिए।

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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