टेपवर्म डाइट से लेकर फुट बाइडिंग: महिलाओं को 'सुंदर' बनाने के पितृसत्तात्मक तरीकों का इतिहास
टेपवर्म डाइट से लेकर फुट बाइडिंग: महिलाओं को 'सुंदर' बनाने के पितृसत्तात्मक तरीकों का इतिहास
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आम तौर पर हर व्यक्ति स्वस्थ शरीर और सुंदर दिखने की चाह रखता है। स्वस्थ शरीर की परिभाषा भले साधारण हो, सुंदरता हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। किसी व्यक्ति के हिसाब से सुंदरता की परिभाषा जितनी जटिल होगी, उसके सुंदर दिखने के प्रयास या प्रक्रिया उतने ही कठिन हो सकते हैं। हमारा समाज पितृसत्तात्मक नियमों के अनुसार चलता आ रहा है। इसलिए सुंदरता के मानदंड महिलाओं और पुरुषों के लिए बिलकुल अलग रहे हैं। चूंकि पितृसत्ता महिला के शरीर को ओब्जेक्टिफ़ाई करती है, इसलिए ये मानदंड महिलाओं के लिए कहीं अधिक कठिन और अवास्तविक रहा है।

इतिहास में जांए तो, महिलाओं के लिए इजात हुए सभी सुंदरता के पैमाने पितृसत्तात्मक समाज ने बनाए थे, जो महिलाओं को एक निर्दिष्ट रूप में देखना चाहते थे और सिर्फ उस रूप को ही सुंदर मानता रहा। अलग-अलग दौर में, अलग-अलग समुदायों ने महिलाओं को सुंदर दिखने के लिए नियम बनाए और महिलाओं का उन नियमों का अनुसरण करना सुनिश्चित किया। जहां पुरुषों के लिए मूलतः ‘मर्दाना’ होना ही पर्याप्त रहा, महिलाओं को सुंदर माने जाने के लिए अलग-अलग मानदंड बनते रहे। मसलन, विक्टोरियन युग में एक निश्चित वजन पाने के लिए महिलाएं टेपवर्म सिस्ट गोली के रूप में लेती थी। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में अक्सर महिलाओं के प्राकृतिक रूप से सफ़ेद दांतों को काला कर दिया जाता था। ऐसा माना जाता था कि यह परिपक्वता और सुंदरता का प्रतीक है। दुनिया भर में महिलाओं की सुंदरता के लिए अपनाए गए विभिन्न नुस्खों की बात हम इस लेख के ज़रिये कर रहे हैं।

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1- टेपवर्म डाइट

विक्टोरियन युग में महिलाएं एक निश्चित वज़न पाने और सुंदर दिखने के लिए टेपवर्म सिस्ट को गोली के रूप में लेती थी। इसके पीछे यह अवधारणा थी कि आंतों में टेपवर्म उन कैलोरी का उपभोग कर लेगा, जो मानव शरीर के लिए ज्यादा हो सकता है। हालांकि, टेपवर्म खाने के कई दुष्परिणाम थे, लेकिन यह प्रथा काफी समय तक चलती रही। टेपवर्म के खाने से खतरों में आंतों में रुकावट, ब्रेन, लिवर और आंखों को स्थायी नुकसान जैसे खतरे शामिल थे।

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2- हानिकारक केमिकलों का सौन्दर्य उत्पादों के तरह इस्तेमाल

विक्टोरियन युग में सौन्दर्य उत्पादों के इस्तेमाल का प्रचलन हो चुका था। अमरीकी न्यूज़ वेबसाइट बिज़नस इंसाइडर में छपे एक लेख के अनुसार विक्टोरियन इंग्लैंड में क्रीम और पाउडर जैसे सौंदर्य उत्पादों में लीड पाया जाता था। इसके अलावा उस दौर में आर्सेनिक और अमोनिया जैसे हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल का प्रचलन था। विक्टोरियन इंग्लैंड में महिलाएं अपनी सुंदरता के लिए कई नुस्खे अपनाती थीं जहां उन्हें ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करना होता था। उस युग के सौंदर्य प्रसाधन ऐसे केमिकलों से भरे होते थे जो हानिकारक ही नहीं, अन्य शारीरिक तकलीफों का कारण भी थे।

आज के दौर की तरह, सुंदरता के ऐसे उपचारों के फायदे और उपयोग के तरीकों की सलाह उस युग के लोकप्रिय पत्रिकाओं के कॉलम में दिए जाते थे। उस युग की महिलाएं चेहरे को तरोताजा रखने के लिए चहरे पर रातभर अफीम का लेप लगाती और सुबह अमोनिया से धोती थी। विक्टोरियन युग के सुंदरता के मानकों और आदर्शों में उच्च वर्ग की श्वेत महिलाओं के त्वचा का रंग गोरा होने की धारणा प्रचलित था। यह उनके कभी भी धूप में काम न करने के विशेषाधिकार का प्रतीक माना जाता था। जिन महिलाओं की भौहें और पलकें पतली होती थी, उन्हें अक्सर रात में मरक्युरि (पारा) लगाकर उसके उपचार की सलाह दी जाती थी।

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3- फुट बाइंडिंग

तस्वीर साभार: My Med.Com

फुट बाइंडिंग किशोरियों के पैरों के आकार को बदलने के लिए उन्हें कसकर बांधने और तोड़ने का चीनी रिवाज़ था। ऐसा माना जाता था कि पैरों के आकार को बदलने से; बदला हुआ आकार महिलाओं को अधिक सुंदर बनाएगा। पांवों को बांधकर आकार बदलने को लोटस फीट और इन बदले हुए पैरों के लिए बनाए गए जूतों को लोटस शूज़ कहा जाता था। चीन के शाही क्षेत्रों में यह प्रथा महिलाओं के सौंदर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना रहा। गौरतलब हो कि पैर बांधना एक दर्दनाक प्रक्रिया है जिससे न सिर्फ महिलाओं की गतिशीलता सीमित हो जाती थी, बल्कि यह विकलांगता का कारण भी था। 18वीं शताब्दी में कुछ चीनी लेखकों ने इस प्रथा का विरोध करना शुरू किया। 19वीं शताब्दी में ताइपिंग विद्रोही समूह के कई विद्रोही नेता चीन के हक्का हैन क्षेत्र से थे, जहां महिलाएं अपने पैर नहीं बांधती थीं। हालांकि साल 1912 में, चीनी सरकार ने आखिरकार फुट बाइंडिंग पर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन इस प्रथा को पूरी तरह खत्म होने में कई साल लगे।

4- ब्यूटी माइक्रोमीटर

तस्वीर साभार: The Guardian

मैक्स फैक्टर सीनियर के नाम से प्रचलित मैक्सिमिलियन फक्टोरोविक्ज़ पोलिश-अमेरिकी व्यवसायी और ब्यूटीशियन थे। उन्होंने ब्यूटी माइक्रोमीटर या ब्यूटी कैलिब्रेटर नामक यंत्र का आविष्कार किया था। यह किसी महिला के चेहरे की कमियों की पहचान करने के लिए बनाया गया उपकरण था। इसके माध्यम से महिला के चेहरे की कमियों को बारीकी से देखा जाता था और मेकअप के जरिए ठीक करने की कोशिश की जाती थी। ब्यूटी माइक्रोमीटर का आविष्कार साल 1930 की शुरुआत में हुआ था। ब्यूटी माइक्रोमीटर को सिर और चेहरे के चारों ओर एक ढांचे के तरह फिट कर महिला के चेहरे के साथ मिलाकर और नाप कर यह तय किया जाता था कि चेहरे पर कहां कितनी मेकअप की ज़रूरत है।  

5- विनीशियन सेरूस का इस्तेमाल

विनीशियन सेरूस या स्पिरिट्स ऑफ सैटर्न 16वीं सदी का एक कॉस्मेटिक था जिसका इस्तेमाल स्किन वाईटनर या चेहरे को गोरा करने के लिए किया जाता था। तत्कालीन समय में इसकी बहुत मांग थी। उस समय के उपलब्ध सौन्दर्य प्रसाधनों में इसे सबसे अच्छा माना जाता था। यह पानी, सिरका और लीड का मिश्रण था; जिसे चेहरे को गोरा करने के लिए लगाया जाता था। इंग्लैंड में जन्मी, अपनी सुंदरता और सुंदरता के नुस्खों के लिए प्रसिद्ध मारिया कोवेंट्री की मृत्यु कथित रूप से ऐसे कॉस्मेटिक के इस्तेमाल से हुई थी। मारिया अपनी सुंदरता को बरकरार रखने के लिए ऐसे खतरनाक और विषैले सौन्दर्य उत्पादों के इस्तेमाल के लिए जानी जाती थी। उनकी मौत महज 27 साल में हो गई थी।  

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6- लाइसोल का स्वच्छता उत्पाद की तरह इस्तेमाल

तस्वीर साभार: Huffpost

आज जिस केमिकल को हम अपने बाथरूम या घर की गंदगी को साफ करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसे कभी स्वच्छता उत्पाद के रूप में बताया गया था। लाइसोल निर्माता लेहन और फिंक ने बीसवीं शताब्दी में कीटाणुनाशक लाइसोल को गुप्तांगों को साफ करने के उत्पाद के रूप में विज्ञापन देना शुरू किया। अमेरिकी समाचार एग्रीगेटर हफपोस्ट के एक लेख में लाइसोल कंपनी के उस आपत्तिजनक विज्ञापन का ज़िक्र किया गया, जहां कंपनी खराब वैवाहिक रिश्तों का कारण महिलाओं का अपने गुप्तांगों के स्वच्छता को नज़रअंदाज़ करना बता रही थी। कंपनी के अनुसार महिलाओं के पति का खुद को उनसे दूर करने की वजह उनके निजी अंगों के स्वच्छता की कमी बताई गई। इसलिए उन्हें लाइसोल से खुद को साफ रखने की आवश्यकता थी। कंपनी ने यह दावा किया कि लाइसोल से गुप्तांगों को साफ करने से संक्रमण और दुर्गंध को रोका जा सकता है।

7- ब्रेस्ट आयरनिंग

तस्वीर साभार: The Indian Express

ब्रेस्ट आयरनिंग किशोरियों के स्तनों को सख्त या गर्म वस्तुओं से मालिश करने या दबाने की प्रक्रिया है, जिसमें स्तनों को विकसित होने से रोकने या पूरी तरह समतल करने की कोशिश की जाती है। पारंपरिक रूप से यह मां, दादी, चाची या कोई ऐसी महिला करती है जो खुद को किशोरी की रक्षक समझती हो। यह माना जाता था कि यह किशोरी को कम उम्र में गर्भावस्था, अनचाहे पुरुषों की नजरों से, यौन उत्पीड़न और बलात्कार से बचाएगा। यह पद्धति अक्सर सप्ताह में एक बार या हर दो सप्ताह में एक बार या तब तक किया जाता था जबतक कि स्तनों का बढ़ना रुक न गया हो। द गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि संयुक्त राष्ट्र ने इसे लिंग आधारित वैश्विक हिंसा की पांच सबसे कम रिपोर्टेड अपराधों में से एक के रूप में चिन्हित किया है।

सुंदरता को न सिर्फ एक निश्चित दायरे में रखने की कोशिश होती है बल्कि इसे जाति, नस्ल, सामाजिक और आर्थिक हैसियत से भी जोड़ दिया जाता है। ऐतिहासिक रूप से सुंदरता के कई नुस्खों का इस्तेमाल किसी विशेष जाति या नस्ल के ऊपर सिर्फ इसलिए होता रहा क्योंकि समाज उन्हें सुंदर नहीं मानता। किसी जाति या नस्ल को सामाजिक तौर पर बहिष्कार करने के लिए विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का सबसे आसान तरीका ही उन्हें हर मायने में नीचा दिखाना है। यह पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी समाज की कन्डीशनिंग ही है, जो हमारे सोच को संकीर्ण बनाए हुए है।

भारत में आज के दौर के सुंदर मानी जानेवाली अभिनेत्रियों को मद्देनजर रखें, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि सुंदर माने जाने के लिए आज भी पतला शरीर और गोरा रंग होना एक आवश्यक कारक है। साधारणतः सुंदर महिला की बात होते ही हम लंबे बाल, गोरा रंग और छरहरा शरीर की कल्पना करने लगते हैं। इस धारणा को गढ़ने में पितृसत्ता ने साल दर साल अपनी भूमिका निभाई है। हालांकि, आज कई लोग सुंदरता की रूढ़िवादी मानदंड से अलग सोचने का साहस दिखा रहे हैं, लेकिन आज भी हम सुंदरता के सदियों पुराने मानदंडों पर खुद को और दूसरों को आंकते हैं। आज सुंदरता को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है जहां यह किसी जाति, नस्ल, जेंडर, सामाजिक और आर्थिक स्थिति तक सीमित न रहे।  

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कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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