जेंडर समानता
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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ग्रामीण स्तर पर हम अक्सर अलग-अलग तरह की जेंडर आधारित असमानता और हिंसा की घटनाएं देखते हैं। जैसा कि हम लोग जानते हैं पितृसत्ता ने महिला-पुरुष के बीच ग़ैर-बराबरी को बनाने और बनाए रखने में जेंडर को एक मज़बूत हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है और जो आज भी जारी है। ऐसे में जब हम सामाजिक बदलाव की बात करते हैं तो हमें उन बुनियादी कदमों की पहचान करना ज़रूरी है, जिससे हम अपने परिवार और समाज में जेंडर असामानता और जेंडर आधारित हिंसा को रोकने की दिशा में आगे बढ़ा सकते हैं।

1- लड़का-लड़का के भेद और इसके भाव को समझना

प्रकृति ने भले ही लोगों की शारीरिक बनावट में कुछ भेद किए हैं, लेकिन जब हम इस भेद को आधारित करके जेंडर के आधार पर भेदभाव की बात करते हैं तो ये लैंगिक असमानता होती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम ये समझें कि जब हम जेंडर के आधार पर किसी को अच्छा-बुरा बनाते हैं या किसी को कमतर आंकने लगता हैं तो यह बड़ी समस्या का रूप लेने लग जाता है।

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2- घर और बाहर के काम में समान सुनिश्चित भागीदारी

हम लोगों को बचपन से ही अपने बच्चों को ये सीखाना होगा कि कोई भी काम किसी जेंडर से जुड़ा नहीं है। अगर महिलाएं रोटी बना सकती हैं तो पुरुष भी रोटी बना सकते हैं और यह बेहद सामन्य है। इसके लिए ज़रूरी है कि घर के और बाहर के काम में लड़का-लड़की की भागीदारी समान हो। यह भी ज़रूरी है कि हम समझें कि कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं है और किसी भी काम का जेंडर से कोई लेना-देना नहीं है। इस विचार को तब तक हम लागू नहीं कर सकते हैं जब तक ये हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ये नहीं जुड़ेगा। इसलिए परिवार में महिला-पुरुष दोनों को हर काम में भागीदारी तय करनी होगी।

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3- लड़का-लड़की दोनों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा

जब भी लैंगिक समानता की बात करते हैं तो इसके लिए ज़रूरी है कि लड़का-लड़की दोनों की तैयारी एक समान हो, मतलब कि उन्हें विकास का एक समान अवसर मिले। अक्सर हम लोगों के परिवार में लड़कियों को ‘पराया धन’ और लड़कों को ‘कुल का दीपक’ बताया जाता है। इसकी वजह से समय के साथ यह सोच पक्की होने लगती है कि पैसे कमाने का काम पुरुष का और घर संभालने का काम महिला का होगा। इसके साथ ही, लड़कियों को उनके सम्पत्ति के अधिकार से दूर किया जाने लगता है। वह यह सोच भी नहीं पाती कि उनकी पैतृक सम्पत्ति में उनका भी लड़के की तरह समान अधिकार है। इसलिए ज़रूरी है कि हम बचपन से ही लड़के-लड़की दोनों को आत्मनिर्भर बनने की तरफ़ प्रेरित करें, जिससे न कोई पराया धन के नाम पर अपने गुम अस्तित्व की चुनौती का सामना करे और न कोई कुल का दीपक कहे जाने पर परिवार का भार ढ़ोने को मजबूर हो।

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4- जेंडर संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल

हम जब भी किसी बदलाव के बारे में सोचते हैं तो इसमें भाषा की भूमिका बहुत अहम होती है। हमारी भाषा हमेशा हमारे विचार से प्रेरित होती है। इसलिए जब हम लैंगिक समानता की बात कर रहे हैं तो हमें अपनी भाषा को भी जेंडर आधारित संवेदनशील बनाया जाए। एक साधारण उदाहरण है-जब कोई बेटी अपने माता-पिता का ध्यान रखती है और हर वह काम करती है जिसकी उम्मीद हमारा समाज बेटे से रखता है। ऐसी स्थिति में कई बार परिवारवाले कहते हैं, “ये उनकी बेटी नहीं, बेटा है।” यह बहुत आम है लेकिन जाने-अनजाने में ये फिर से माता-पिता की देखरेख करने की क्षमता को पुरुष के जेंडर से जोड़ देता है। ऐसे में ज़रूरी है कि हम किसी भी योग्यता-काम को किसी विशेष जेंडर से ही जोड़कर न देखे और न प्रस्तुत करें।

5- लड़का-लड़की के भावों का समान हो सम्मान

बचपन से ही लड़कों को ये सिखाया जाता है कि लड़के रोते नहीं हैं। वहीं, लड़की को सिखाया जाता है कि लड़कियां ज्यादा बोलती नहीं हैं। ये दोनों बातें बचपन से ही लड़का-लड़की के भावों को पितृसत्तात्मक मायनों में बांधने का काम करते हैं, जिससे एक समय के बाद पुरुष हिंसक होने लगते हैं और महिलाएं हिंसा सहने की अभ्यस्त होनी लगती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि परिवार में लड़की का रोना जितना सामान्य माना जाता है, उतना ही लड़कों के रोने को सामान्य समझा जाना चाहिए। रोने के साथ-साथ, अपनी बातों को रखने और अपने ग़ुस्से को ज़ाहिर करने की जगह हम लोगों को अपने घर में लड़का-लड़की को समान रूप से तय करनी होगी। ये घर में जेंडर समानता को लागू करने में बेहद मददगार साबित होता है।

6- मर्दानगी और सुंदरता के मानकों को चुनौती

पितृसत्तात्मक समाज हमेशा ये उम्मीद करता है कि पुरुष अपनी मर्दानगी के अनुसार ख़ुद को तैयार करें और सुंदरता के मानकों में लड़कियां फंसी रहें। मर्दानागी और सुंदरता का विचार हमेशा लड़का-लड़की में ग़ैर-बराबरी को बढ़ावा देने का काम करती है। एक ‘अच्छा’ मर्द कैसा होता है, बचपन से ही पूरा समाज लड़कों की कंडिशनिंग इसी के अनुसार करता है। वहीं, महिलाएं हमेशा सुंदर होती हैं या उन्हें हमेशा सुंदर होना चाहिए, लड़कियों की कंडिशनिंग उसी के अनुसार की जाती है, जिसे अपने परिवार के स्तर पर हमें चुनौती देना ज़रूरी है।

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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