बेटियों से नहीं करनी चाहिए ये छह बातें
तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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बेटियों के जन्म लेने पर आज भी परिवार को उतनी ख़ुशी नहीं होती जितनी बेटा पैदा होने पर होती है। कई परिवार ऐसे भी होते है जहां बेटी के जन्म लेते ही घर में मातम फैल जाता है। यह अपने पितृसत्तात्मक समाज की कड़वी सच्चाई है। परिवार के मन की यह कसक समय के साथ-साथ बढ़ती चली जाती है, जिसका असर लड़कियों पर होता है। आज जब हम लोग लैंगिक समानता की बात करते हैं जिससे लड़कियों के अधिकार सुरक्षित हो और वे आगे बढ़ें, लेकिन इसे हम अपनी ज़िंदगी में कैसे लागू करें यह सवाल अक्सर हम लोगों के मन में आता है। इस लेख में हम ऐसी छह बातों के बारे में बात करेंगे जो परिवार को अपनी बेटियों से नहीं करनी चाहिए।

1- लड़की के लिए ‘इज़्ज़त’ ही सब कुछ है  

‘इज़्ज़त’ एक ऐसा शब्द है वह बचपन से हम लोगों के मन में बिठाया जाता है। उठने-बैठने के तरीक़े से शुरू होता इस इज़्ज़त का सिलसिला लड़की की पूरी ज़िंदगी को कितनी बुरी तरह प्रभावित करता है कि यौन उत्पीड़न की किसी भी घटना के बाद हमेशा लड़की को दोषी माना जाता है और कहते हैं कि लड़की की इज़्ज़त चली गई है। इस बात का डर बचपन से लड़कियों के मन में बैठाया जाता है, जिसकी वजह से वह हमेशा अपने कदम बढ़ाने से डरती है। इसलिए अगर हम वाक़ई में लैंगिक समानता चाहते है तो लड़की को उसके सपने, शिक्षा और अवसर के प्रति प्रेरित करें न कि उसकी पूरी ज़िंदगी को इज़्ज़त की उस खूंटी से बांधें जिससे वह दूसरों पर आश्रित होकर ही सुरक्षित महसूस करें। साथ ही लड़कियों को उनकी इज़्ज़त के मानक ख़ुद तय करने देने चाहिए।

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2- लड़कियों को घर का काम तो आना ही चाहिए

घर का काम सिर्फ़ लड़कियों को ही नहीं लड़कों को भी सीखना चाहिए। घर के काम का जेंडर से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन जब हम इसे लड़कियों के लिए सबसे ज़रूरी काम मानते है तो ये सबसे बड़ी गड़बड़ होती है। इसलिए अब से घर के काम को सिर्फ़ लड़कियों के नाम न करें। घर में महिला-पुरुष की साझेदारी घर के काम में सुनिश्चित करें।

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सामाजिक बदलाव का आधार सोच है, इसलिए सोच को बदलना ज़रूरी है, जिसकी पहल हमें व्यवहार से करनी होगी।

3- टीचर, डॉक्टर जैसी नौकरियां लड़कियों के लिए अच्छी है बिज़नेस नहीं

लड़कियों के लिए हमेशा कहा जाता है कि वे अच्छी टीचर और डॉक्टर होती हैं। मीडिया, राजनीति, खेल, सेना जैसे क्षेत्र महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं और बिज़नेस तो बिल्कुल भी नहीं। अगर आप भी ये मानते हैं और अपने घर में ऐसा कहते हैं तो इसे कहना बंद करें। जब हम लैंगिक समानता की बात करते हैं तो बेटा-बेटी दोनों को अपनी मर्ज़ी से अपना करियर चुनने की छूट दें। लड़कियों को प्रेरित करें कि वे अपने लिए करियर चुने और आगे बढ़ें, जिससे उनकी पहचान बने और वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनें।

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4- शादी के बिना लड़की की ज़िंदगी अधूरी है

हम लोगों का समाज अपनी पूरी ताक़त सिर्फ़ लड़कियों की शादी में झोंक देता है। बचपन से ही हाथ में गुड़िया की शादी वाला खेल थमाकर लड़कियों के दिमाग़ में शादी की ज़रूरत की सोच उनके मन में डाली जाती है। जब हम ऐसा करते हैं तो यह सोच लड़कियों की बढ़ती उम्र के साथ और भी मज़बूत कर दी जाती है। उनकी पूरी सफलता उनकी शादी से तय होने लगती है। जो लड़कियों को पति पर आश्रित होना सीखाती है, उनकी ज़िंदगी किचन में समेटने का काम करती है। हमें समझना होगा कि शादी ज़िंदगी का एक हिस्सा हो सकता है और यह वह चयन है जो व्यक्ति पर निर्भर करता है। शादी करना जितना सामान्य है, शादी न करना भी सामान्य है। शादी लड़की की पूरी ज़िंदगी नहीं होती है, ये बात हमें बचपन से ही अपनी बेटियों के दिमाग़ में डालनी चाहिए, जिससे वह शादी की जगह अपनी शिक्षा और विकास के बारे में सोचे और आगे बढ़े।

5- लड़की का ससुराल ही उसका सब कुछ होता है

सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों को पैतृक सम्पति में अधिकार दिया है यानि कि लड़कियों की उनकी पिता की सम्पत्ति में हक़ है, ये उनका क़ानूनी अधिकार है। पर जब हम लोगों के घर में लड़कियों को ये कहा जाता है कि उनका ससुराल ही उनका सब कुछ है तो इससे वे सम्पत्ति में अपने अधिकार से वंचित कर दी जाती हैं। समय आने पर कभी भी अपने हक़ की माँग नहीं कर पाती हैं। यही वजह है कि महिलाओं का कोई आर्थिक रूप से मज़बूत आधार नहीं बन पाता है। इसलिए लड़कियों को बचपन से ये बताएं कि जिस घर में उसने जन्म लिया है वह उसका अपना घर है और ये उसका क़ानूनी अधिकार है।

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6- लड़कियाँ, लड़कों के कमतर होती हैं

कभी भी हमें लड़कियों को लड़कों से नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि इससे लड़कियों के मन में हमेशा ये बात बैठने लग जाती है कि लड़के, लड़कियों से बेहतर हैं। इसलिए हर काम में लड़कों से बराबरी करने की बात की जाती है और धीरे-धीरे ये बात लड़कियों के आत्मविश्वास को प्रभावित करता है। वास्तविकता यही है कि लड़कियां और लड़के अपने आप में ख़ास है, दोनों को एक-दूसरे से आंकने की ज़रूरत नहीं है और न ही कोई कम या ज़्यादा है।

ये कुछ ऐसी बातें है जिन्हें अगर हम अपने घर में लागू करना शुरू करें तो एक बड़े बदलाव की छोटी, पर मज़बूत शुरुआत हो सकती है क्योंकि सामाजिक बदलाव का आधार सोच है, इसलिए सोच को बदलना ज़रूरी है, जिसकी पहल हमें व्यवहार से करनी होगी।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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