लता मंगेशकर: सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षाओं को ध्वनि देती आवाज़
तस्वीर साभार: Indian Express
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‘लता मंगेशकर’ सिर्फ व्यावसायिक फिल्मों में गायन करनेवाली एक गायिका का नाम नहीं बल्कि हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर को विश्व के फलक पर प्रतिनिधित्व देने वाली एक सांस्कृतिक छवि है। लता के इस कालजयी व्यक्तित्व की आभा कभी कम होने का नाम नहीं लेती। भले ही फिल्मी सितारे आते और जाते रहें हो लेकिन लता की आवाज़ हमेशा बनी रही। लता की गायकी ने हिंदी सिनेमा के प्राण तत्व ‘संगीत’ के हर युग और हर पीढ़ी में अपनी आवाज़ दी है। हर बार देश और उसके जनमानस के हृदय को समान रूप से छुआ है।

यह लता के गायन की असीम संभावनाओं का प्रभाव ही था कि फिल्म संगीत के स्वर्णिम अध्याय में इस आवाज़ ने लगभग हर संवेदना और हर भाव को आवाज़ दी थी, जिसकी कल्पना मानवीय सम्बन्धों और व्यवहारों में की जा सकती है। सबसे चमत्कृत करने वाली बात यह है कि इन सभी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने में शत-प्रतिशत विश्वसनीयता और स्तर का ध्यान रखा गया था।

मसलन, एक मध्य वर्गीय नारी की सूक्ष्म से सूक्ष्म संवेदना, उसकी इच्छा और स्वप्न, उसकी मानसिक वेदना और पीड़ा, इन सब भावों को लता की आवाज़ ने जिस विश्वसनीयता और खरेपन के साथ उभारा था, वह उनकी आवाज़ के जादू का ही असर था। इसीलिए जहां एक ओर यह आवाज़ प्रेम की पहली बौछार को भी समेटती दिखती है। (तेरा मेरा प्यार अमर में साधना की आवाज़) तो वहीं यह आवाज़ एक अगाध प्रेम और समर्पण से भरी पत्नी की भी संवेदनाओं को दिखलाती है (आपकी नज़रों ने समझा, फिल्म अनपढ़ में माला सिन्हा की आवाज़) तो वहीं एक मां की असीम और विराट ममता की अभिव्यक्ति (चंदा है तू, मेरा सूरज है तू, फिल्म आराधना में शर्मिला टैगोर की आवाज़), और ज़रा और नज़र बढ़ाएं तो हम देखेंगे कि यह आवाज़ एक बहन के प्यार को भी ध्वनि देती है (चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे, फिल्म चंबल की कसम में फरीदा ज़लाल की आवाज़), तो वहीं कभी एक बच्चे की मासूम और निरपराध आवाज़ में भी गूंज जाती है (फूलों का तारों का सबका कहना है, फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा)

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न केवल मानवीय संवेदना के धरातल पर इस आवाज़ ने हर पात्र के साथ न्याय किया है बल्कि, गीत-संगीत की जितनी भी शैलियां/विधाएं हैं, इन सबको लता की आवाज़ ने अपने हुनर से छुआ है। मसलन- प्रेम, विरह, हर्ष-विषाद, भजन, ग़ज़ल, लोकगीत, त्योहारों के गीत, विवाह के गीत, बच्चों के गीत, लोरी, देशभक्ति के गाने, सामाजिक यथार्थ से भरे गीत। देखा जाए तो लता ने जीवन के हर उस क्षण और घटना से जुड़े भावों को अपनी आवाज़ दी जो भारतीय जनमानस के लिए एक सामूहिक प्रक्रिया थी।

अपनी आवाज़ के माध्यम लता ने केवल फिल्म संगीत बल्कि भारतीय संगीत की विविध लोक परंपराओं को भी समृद्ध किया। हम उनके मराठी लावणी, पंजाबी टप्पा और बंगाल के रवीद्र संगीत के गायन में सुनते हैं। इतना ही नहीं लता ने देश की 26 से ज्यादा भाषाओं में गायन करने के अलावा, नेपाली और सिंहली जैसे भाषाओं में भी खूब गाया है। भारतीय संगीत की इस धरोहर और विरासत को उसकी पूरी समग्रता में अपनी गायकी से जन-जन तक पहुंचाने के कारण ही लता की इस सार्वकालिक और सार्वजनिक, कभी न खत्म होने वाली लोकप्रियता को समझा जा सकता है।

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न केवल मानवीय संवेदना के धरातल पर इस आवाज़ ने हर पात्र के साथ न्याय किया है बल्कि, गीत-संगीत की जितनी भी शैलियां/विधाएं हैं, इन सबको लता की आवाज़ ने अपने हुनर से छुआ है।

हालांकि, लता के गायन की सफलता और लोकप्रियता को यदि हम दूसरी दृष्टि से समझने का प्रयास करेंगें तो पाएंगे कि लता की आवाज़ एक भारतीय मध्यवर्गीय स्त्री को उसके सर्वांग रूप में ग्रहण करने वाली आवाज़ थी। यह स्त्री जो एक साथ कई रूपों में भारतीय परिवार और समाजिक व्यवस्था के केंद्र में थी। जिसे एक मां, बहन, बेटी, पत्नी , प्रेमिका इन तमाम वर्गों में लगभग एक से ही गुण लिए हुए थी। ममता, दया, त्याग, प्रेम, बलिदान, कर्तव्य, धर्मपरायणता, एकनिष्ठता, पतिव्रता, सहनशीलता, भीरुता, जैसे गुणों से मिलकर इस मध्यवर्गीय स्त्री का निर्माण हुआ था।

लता की आवाज़ ने इसी मध्यवर्गीय स्त्री के कोमल चरित्र को वाणी दी थी। लता की आवाज़ में छिपी एक आंतरिक निष्कलुषता की वजह से ही इस आवाज़ को भारतीय सिनेमा की उन सभी अभिनेत्रियों के लिए मुख्य रूप से प्रयोग किया गया जो फिल्मों में मध्यवर्गीय भारतीय नारी का किरदार निभाती थीं। इसका एक उदाहरण हम फिल्म मुग़ल-ए-आजम के उस कव्वाली गीत में देख सकते हैं, जहां पर लता की आवाज़ को फिल्म की अभिनेत्री अनारकली (मधुबाला) के लिए प्रयोग किया गया है और ‘तथाकथित’ बुरी स्त्री बहार (निगार सुल्ताना) के लिए शमशाद बेग़म की आवाज़ को लिया गया था। इतना ही नहीं, लता की अपनी एक विशिष्ट गरिमा में ढकी हुई सार्वजनिक पहचान थीं। जिसकारण लता ने कभी भी कैबरे और तथाकथित ‘आइटम सॉन्ग’ नहीं गाए। गीतों का वह वर्ग उनकी बहन आशा भोंसले की ही पहचान बना रहा।

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लता की आवाज़ और हिंदी फ़िल्मों में उसके प्रयोग पर कई आधुनिक समीक्षकों ने समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी विचार किया है। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध समाजशास्त्री संजय श्रीवास्तव को लता की ‘पतली और ऊंची आवाज़’, एक ‘किशोरी या अवयस्क बालिका’ की तरह लगती थी। जिसको एक पुरुष प्रधान फ़िल्म जगत में अभिनेत्रियों की उपस्थिति को दबाने का एक उपयोगी अस्त्र के रूप में देखा है। इस तर्क के साथ ही, वह यह भी सिद्ध करते हैं कि लता की यह असामान्य सी पतली आवाज़ एक कमज़ोर और शोषित भारतीय मध्यवर्गीय स्त्री की छवि को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में सबसे कारगर सिद्ध हुई। एक ऐसी स्त्री की आवाज़ बनाने में लता की यह आवाज़ सबसे ज़्यादा कारगर हुई जिसके अस्तित्व को कभी मुखर ही नहीं होने दिया गया। वहीं, गैर-फ़िल्मी संगीत में, लता के बर-अक्स फरीदा खानुम और बेग़म अख़्तर की आवाज़ उनके व्यक्तित्व की तरह ही ज़्यादा मुखर और खुली हुई थी।

हालांकि, इन आलोचनाओं के विरोध में भी कई आलोचकों ने आवाज़ उठाई। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि लता मंगेशकर के फिल्म जगत पर एकछत्र अधिकार और असीम प्रसिद्धि के पीछे सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों के साथ-साथ, स्वयं उनकी आवाज़ और संगीत से जुड़े कारण भी रहे हैं। इसीलिए उनकी आवाज़ के अनोखेपन को, उसकी तकनीकी/कलात्मक गुणवत्ता को झुठला कर उनकी आवाज़ को सिर्फ स्त्री-पुरुष विमर्श और पुरुष-प्रधान फ़िल्म-जगत के हथकंडों तक सीमित नहीं करना चाहिए।

मसलन, अश्विनी देशपांडे ने संजय श्रीवास्तव की आलोचनाओं के संदर्भ में लिखा है कि लता की ‘अतिशय पतली और ऊंची आवाज़’ को एक कमज़ोर और अस्तित्वहीन स्त्री की आवाज़ के रूप में मान्य कर दिए जाने के पीछे कोई तार्किक आधार नहीं दिखाई पड़ता। हिंदी फ़िल्म की अभिनेत्रियों ने कई तरह के किरदार निभाए हैं, मसलन, जब लता फ़िल्म गाइड का वह सुप्रसिद्ध गीत ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ गाती हैं, तो क्या वह किसी नारीवादी जुमले से कम असर करता है? यहां भी तो लता की ही पतली और ऊंची आवाज़ को वहीदा रहमान पर फ़िल्माया गया है। ऐसे में आवाज़ का व्यक्तित्व के साथ सामान्यीकरण कर देना तो किसी दृष्टि से तार्किक नहीं है।

मेरी दृष्टि में, लता की आवाज़ को स्त्री के एक रूढ़ रूप के साथ निश्चित कर दिये जाने के पीछे कई आलोचकों का उद्देश्य शायद यह साबित करना होता होगा कि कैसे लता की आवाज़ को पितृसत्तात्मक व्यवस्था को, कला के माध्यम से वैधता और समर्थन देने के लिए प्रयोग किया गया था और यहां ये तथाकथित ‘प्रयोगकर्ता’ पुरुष थे। उदाहरण के लिए मुख्यतया ऐसे गानों में, जैसे कि ‘आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’, ‘है इसी में प्यार की आबरू वो जफ़ा करें, मैं वफा करूं’, जहां न केवल गीत के बोल में बल्कि गाने के तरीक़े से भी स्त्री को पुरुष से दोयम दर्ज़े का इंसान माना जा रहा है।

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पर यहां सवाल यह उठता है कि जब हिंदी सिनेमा और खासकर 1990 से पहले के सिनेमा जो मुख्य रूप से पुरुषों के एकाधिकार में ही थी, और जहां फिल्में भी प्रायः एक पुरुष अभिनेता को ही केंद्र में रख कर बनाई जा रही थीं, वहां पर अभिनेत्रियों के चरित्र-चित्रण के लिए कोई विशेष स्कोप नहीं रह जाता था। हालांकि तब भी, मदर इंडिया, रज़िया सुल्तान जैसी फ़िल्में हों या, लता द्वारा गाये गए साहिर लुधियानवी के वे गीत हो (‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को’, फिल्म साधना), स्त्रियों की एक अलग तस्वीर पेश करने की कोशिश अवश्य की गई थी।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में लता मंगेशकर का स्थान अविस्मरणीय इसीलिए माना जाना चाहिए क्योंकि यह वह आवाज़ थी जो न पहले कभी सुनी गई थी, और न आनेवाले समय में ही इस आवाज़ को, इसकी शक्ति को, इसकी सफलता को और इसकी देश-कालातीत लोकप्रियता को दोहराया जा सकेगा। यह वह आवाज़ हैं जिसने लोक और शिष्ट, दोनों ही संस्कृतियों को एक सिरे से जोड़ा है। इसके सुनने वालों में एक ओर एक संभ्रांत और आभिजात्य रुचि के व्यक्ति हैं तो वहीं दूसरी ओर एक सर्वहारा और आम व्यक्ति भी, जो मानव निर्मित सीमाओं में विभाजित थे और जिन्हें लता की गायकी ने एक समान धरातल पर लाकर प्रभावित किया।

देखा जाये तो संगीत की आत्मा से किसी भी प्रकार का समझौता न करते हुए, लता ने अपने गायन की अनूठी और नैसर्गिक शैली से हिंदी फिल्म संगीत के स्तर को महज़ व्यावसायिक सफलता की श्रेणी तक सीमित न रखते हुए उससे ऊपर उठाया। सिर्फ इस एक बात के लिए ही यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि लता मंगेशकर जैसा कोई दूसरा कलाकार भारतीय सिनेमा में नहीं हो सकता। लता की नैसर्गिक आवाज़ और उसकी असीम संभावनाओं ने संगीतकारों के द्वारा ऐसी धुनों को और गीतकारों के द्वारा ऐसी नज्मों को जन्म दिया जिसने हिंदी सिनेमा को ऐसे यादगार गीत दिए हैं जो न केवल एक व्यक्ति विशेष की सफलता है, बल्कि संगीत की हमारी महान और बहुमूल्य विरासत के लिए एक अनमोल धरोहर है और जिस पर लता की आवाज़ एक मुहर की तरह लगी हुई है। लिखने वाले ने सच ही लता के लिए लिखा था, “मेरी आवाज़ ही पहचान है।” 

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यह लेख अदिति भारद्वाज ने लिखा है। अदिति द वायर, सत्य हिंदी जैसी प्रतिष्ठित वेबसाइट्स के लिए लिखती रहती हैं। फिलहाल वह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी पीएचडी कर रही हैं।

तस्वीर साभार : Indian Express

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